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विनियमितिकरण में देरी बनी जानलेवा? मानसिक दबाव में महामंत्री को हृदयाघात, प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल
फाइलों में अटका मामला, जमीनी स्तर पर शून्य प्रगति — कर्मचारियों में आक्रोश, जवाबदेही तय करने की मांग तेज
कानपुर। जनपद में सीजनल संग्रह अमीनों के विनियमितिकरण में लगातार हो रही देरी अब गंभीर और संवेदनशील रूप लेती जा रही है। प्रशासनिक स्तर पर लंबित प्रक्रिया और बढ़ते मानसिक दबाव के बीच सीजनल संग्रह अमीन कर्मचारी वेलफेयर एसोसिएशन के जिला महामंत्री संजय श्रीवास्तव को 8 अप्रैल की देर रात हृदयाघात (Heart Attack) हो गया। उन्हें तत्काल कार्डियोलॉजी संस्थान में भर्ती कराया गया, जहां उनका उपचार जारी है।
जानकारी के अनुसार, 6 अप्रैल को जिलाधिकारी द्वारा आश्वासन दिए जाने के बाद कर्मचारियों ने अपना धरना-प्रदर्शन स्थगित कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद विनियमितिकरण प्रक्रिया में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई। इससे कर्मचारियों में असंतोष और मानसिक दबाव लगातार बढ़ता गया।
संगठन के जिला अध्यक्ष प्रवीण वाजपेई ने बताया कि— “मानसिक एवं आर्थिक तनाव अत्यधिक बढ़ जाने के कारण ही महामंत्री जी को इस स्थिति का सामना करना पड़ा है। यह केवल एक मामला नहीं है, बल्कि ऐसे कई कर्मचारी हैं जो इसी दबाव में या तो दुनिया छोड़ चुके हैं या उस स्थिति की कगार पर हैं।”
वहीं, संगठन मंत्री अरविंद रावत ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि— “एडीएम (वित्त एवं राजस्व) और मुख्य राजस्व लेखाकार कार्यालय स्तर पर विनियमितिकरण की प्रक्रिया को जानबूझकर आगे नहीं बढ़ाया जा रहा। ऐसी स्थिति में मानसिक और आर्थिक तनाव स्वाभाविक है। हम लोग आज उस मोड़ पर खड़े हैं, जहां से कुछ भी संभव है। क्या प्रशासन हमारे बीते हुए समय और संघर्ष को वापस कर सकता है?”
सूत्रों के अनुसार, आर्थिक स्थिति कमजोर होने के चलते महामंत्री के इलाज के लिए विधायक निधि से सहायता लेनी पड़ी, जो इस पूरे प्रकरण की गंभीरता को और उजागर करता है।वर्षों से सेवा दे रहे कर्मचारियों का कहना है कि शासन स्तर से स्पष्ट आदेश और दिशा-निर्देश होने के बावजूद प्रक्रिया केवल कागजों तक सीमित है। जमीनी स्तर पर कोई प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो रहा, जिससे यह मामला प्रशासनिक उदासीनता और लापरवाही का उदाहरण बनता जा रहा है।
कई कर्मचारी सेवा के अंतिम चरण में पहुंच चुके हैं, जबकि कुछ इस अधिकार की प्रतीक्षा में ही दुनिया छोड़ चुके हैं। इसके बावजूद संबंधित कार्यालयों में फाइलें आगे नहीं बढ़ पा रही हैं।अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या विनियमितिकरण में यह देरी कर्मचारियों के जीवन पर भारी पड़ रही है? और यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी तय होगी?यह मामला अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और कर्मचारियों के अस्तित्व से जुड़ा गंभीर विषय बन चुका है।
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