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समृद्ध और सुरक्षित राष्ट्र के लिए घुसपैठियों से मुक्ति आवश्यक
एक विकसित और खुशहाल समाज की अनिवार्य शर्त है
(डा.) मनमोहन प्रकाश
भारत एक प्राचीन सभ्यता और मजबूत लोकतंत्र है, जिसकी सीमाएं केवल भौगोलिक रेखाएं नहीं बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता और संप्रभुता की सुरक्षा दीवार हैं। इन सीमाओं को पार कर होने वाली अवैध घुसपैठ का सीधा असर देश के सामाजिक संतुलन, आर्थिक संसाधनों और आंतरिक सुरक्षा पर पड़ता है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में कोई भी राष्ट्र अवैध प्रवासन को स्वीकार नहीं करता, जिसका उदाहरण हाल के वर्षों में अमेरिका जैसे देशों द्वारा उठाए गए सख्त कदमों में देखा जा सकता है। भारत के लिए 'घुसपैठ मुक्त राष्ट्र' का संकल्प केवल सुरक्षात्मक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक विकसित और खुशहाल समाज की अनिवार्य शर्त है।
भौगोलिक दृष्टि से भारत की सीमाएं अत्यंत संवेदनशील हैं, क्योंकि पड़ोस में स्थित कुछ देशों का रुख सदैव मित्रवत नहीं रहा है। घुसपैठ के साथ जुड़ा तस्करी, जाली मुद्रा और आतंकवादी गतिविधियों का नेटवर्क यह स्पष्ट करता है कि सीमा प्रबंधन केवल सैन्य चुनौती नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नीति का अभिन्न हिस्सा है। जब अवैध रूप से आए लोग बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के भारत में बस जाते हैं, तो वे न केवल कानून-व्यवस्था को चुनौती देते हैं बल्कि देश के सीमित संसाधनों पर भी बोझ बढ़ाते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ, जो वैध नागरिकों के लिए है, उन तक पहुँचने लगता है, जो अंततः भारतीय नागरिकों के अधिकारों का हनन है।
राष्ट्र के प्रति समर्पण का अर्थ केवल भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि उसकी सुरक्षा और भविष्य के प्रति जिम्मेदारी है। एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में भारत की केन्द्र सरकार देश की सीमाओं पर आधुनिक तकनीक, जैसे ड्रोन निगरानी, स्मार्ट सर्विलांस और सख्त पहचान प्रणाली को अंतिम रूप देने के लिए संकल्पित और प्रयासरत है।किंतु सीमाओं की लंबाई और जटिल भौगोलिक स्थितियां अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। अवैध प्रवासन न केवल सुरक्षा बल्कि सामाजिक असंतोष का कारण भी बनता है, जिससे स्थानीय डेमोग्राफी में बदलाव आता है तथा वहां की आबादी की सांस्कृतिक पहचान और आजीविका पर संकट खड़ा हो जाता है।
यद्यपि भारत 'वसुधैव कुटुंबकम्' की भावना के साथ शरणार्थियों को आश्रय देने का पक्षधर रहा है, परंतु 'मानवीय आधार पर दी गई शरण' और 'अवैध घुसपैठ' के बीच स्पष्ट अंतर करना आवश्यक है। शरणार्थियों को अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत संरक्षण दिया जा सकता है, लेकिन अवैध घुसपैठ को किसी भी स्थिति में वैधता नहीं दी जा सकती। इस समस्या के समाधान के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि जागरूक नागरिक और स्थानीय प्रशासन का सहयोग भी अनिवार्य है। राष्ट्र की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल सैनिकों की नहीं, बल्कि हर नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य है।
आज जब भारत वैश्विक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है, तब आंतरिक और बाहरी सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना समय की मांग है। सुरक्षित सीमाएं और स्पष्ट राष्ट्रीय नीति ही आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित कर सकती हैं। यह संकल्प किसी समुदाय विशेष के विरुद्ध नहीं बल्कि कानून के शासन को सुदृढ़ करने के लिए है। सीमावर्ती राज्यों को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर इस समस्या पर ध्यान देना होगा तथा केन्द्र के साथ सहयोग करना होगा। क्योंकि जब राष्ट्र सुरक्षित होगा तभी विकास स्थायी होगा और भारत विश्व में एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित हो सकेगा। सुरक्षित सीमाएं ही विकसित भारत का मार्ग प्रशस्त करेंगी।
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