परमाणु प्रतिष्ठानों पर आक्रमण: मानवता के अस्तित्व पर मँडराता गहरा संकट
युद्ध की इस बदलती नीति के साथ ही मानवरहित हथियारों और ड्रोन तकनीक के बढ़ते उपयोग ने जन-धन की हानि के साथ-साथ पर्यावरण प्रदूषण के एक नए संकट को जन्म दिया है
(डा.) मनमोहन प्रकाश
विश्व राजनीति के वर्तमान दौर में युद्ध का स्वरूप जिस तेजी से परिवर्तित हो रहा है, वह समूची मानवता के अस्तित्व के लिए एक गंभीर खतरे का संकेत है। परंपरागत रूप से युद्ध सीमाओं पर सेनाओं के मध्य लड़े जाते थे, जहाँ रणनीतिक मर्यादाओं का पालन करते हुए नागरिक क्षेत्रों, चिकित्सा संस्थानों और अनिवार्य बुनियादी ढांचों को संघर्ष से पृथक रखा जाता था। किंतु समकालीन युद्धों में यह लक्ष्मण रेखा पूरी तरह ध्वस्त होती दिखाई दे रही है। आज के संघर्षों में न केवल नागरिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जा रहा है, बल्कि परमाणु ठिकानों पर बढ़ते हमलों के खतरे ने वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य को और भी भयावह बना दिया है। युद्ध की इस बदलती नीति के साथ ही मानवरहित हथियारों और ड्रोन तकनीक के बढ़ते उपयोग ने जन-धन की हानि के साथ-साथ पर्यावरण प्रदूषण के एक नए संकट को जन्म दिया है।
वर्तमान में जारी रूस-यूक्रेन संघर्ष और मध्य पूर्व में इजरायल-हमास युद्ध ने न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था को महंगाई की आग में झोंका है, बल्कि राष्ट्रों के बीच असुरक्षा की भावना को भी चरम पर पहुँचा दिया है। इस अस्थिरता के बीच अमेरिका और इजरायल की ईरान के प्रति सख्त नीतियों और ईरान के परमाणु अनुसंधान स्थलों को लक्षित करने की संभावित कोशिशों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गहरे तनाव में डाल दिया है। जवाबी कार्रवाई के रूप में ईरान द्वारा इजरायल के परमाणु ठिकानों को नष्ट करने की चेतावनी इस संकट को एक ऐसी परमाणु आपदा की ओर धकेल रही है, जिसका प्रभाव किसी एक राष्ट्र तक सीमित नहीं रहेगा। आधुनिक युद्ध का यह स्वरूप, जो अब बुनियादी ढांचों और ऊर्जा एवं परमाणु संयंत्रों के इर्द-गिर्द सिमट गया है, पूरी मानव सभ्यता के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता है।
परमाणु प्रतिष्ठानों पर किसी भी प्रकार का सैन्य हमला केवल सामरिक कार्रवाई नहीं, बल्कि जीव-जगत के विरुद्ध एक अक्षम्य अपराध है। यदि किसी परमाणु संयंत्र में रेडियोधर्मी रिसाव होता है, तो उसका प्रभाव दूर दूर तक तक फैल सकता है, राष्ट्र की सीमाओं को लांघ सकता है और और मित्र एवं दुश्मन देश को पहचानने से भी मना कर सकता है। द्वितीय विश्व युद्ध में परमाणु हमला के साथ पूर्व में चेर्नोबिल और फुकुशिमा जैसी त्रासदियों में दुनिया ने रेडिएशन खतरे के प्रभाव को देखा है। रेडिएशन रिसाव आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य, कृषि भूमि की उर्वरता और जल स्रोतों को दशकों तक के लिए विषाक्त कर देता है। अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और जिनेवा कन्वेंशन के अतिरिक्त प्रोटोकॉल स्पष्ट रूप से परमाणु बिजली घरों को युद्ध में निशाना बनाने से प्रतिबंधित करते हैं, क्योंकि इनसे होने वाली क्षति की भरपाई असंभव है। इसके बावजूद, परमाणु ठिकानों को रणनीतिक दबाव और शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनाना अंतरराष्ट्रीय कानूनों की खुली अवहेलना है।यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि यद्यपि परमाणु ठिकानों पर हमला तकनीकी रूप से प्रत्यक्ष 'परमाणु युद्ध' की श्रेणी में नहीं आता, किंतु इसके परिणाम किसी परमाणु हमले से कम विनाशकारी नहीं होते।
इन युद्धों को देखते हुए आज लगभग सभी देशों ने गरीबी,शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी क्षेत्रों की उपेक्षा करते हुए घातक हथियारों के संग्रहण की दौड़ तेज कर दी है। भारत ने सदैव परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग और वैश्विक सुरक्षा की नीति का समर्थन किया है, किंतु वर्तमान वैश्विक परिस्थितियाँ इस संयम को चुनौती दे रही हैं। यदि समय रहते संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसियों ने इन हमलों पर कठोर वैश्विक प्रतिबंध नहीं लगाए और महाशक्तियों ने अपनी हठधर्मिता का परित्याग नहीं किया, तो भविष्य के युद्ध "बिना परमाणु बम विस्फोट के परमाणु युद्ध" का रूप ले लेंगे, जिससे संपूर्ण पृथ्वी का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा।
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