सत्ता की चाह में हिंदी का विरोध कब तक सहेगा भारत देश ?

हिंदी हमारी राजभाषा है और यह हमारे राष्ट्रीय गौरव और स्वाभिमान की भाषा है।

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हमारे देश भारत में जब पूरब से पश्चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक एक देशएक विधान और एक निशान लागू हैतो फिर देश में एक भाषा क्यों नहीं लागू हो सकती है ? भाषा के नाम पर आखिर कब तक देश के कुछ क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के नेता देश के आम जन को बाँटकर सत्ता स्वार्थ की रोटियाँ सेंकते रहेंगे अभी हाल ही में भारत के दक्षिणी राज्य तमिलनाडु में विधानसभा के चुनावों के आते ही फिर से हिंदी भाषा के विरोध का अपना पुराना राग सत्ताधारी डीएमके के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने छेड़ दिया है। पिछले साल महाराष्ट्र में विधानसभा के चुनावों के पूर्व भी हिंदी भाषा को लेकर ठाकरे बंधुओं ने धमकियाँ देकर विरोध किया थालेकिन महाराष्ट्र की जनता ने विधानसभा के चुनावों में ठाकरे बंधुओं को मत से ऐसा सबक सिखाया कि अब वे कभी अपने बूते राज्य की सियासत के सिरमौर कभी नहीं बन सकते हैं।

देश के क्षेत्रीय राजनीतिक दलों द्वारा स्कूली पाठ्यक्रम में तीसरी भाषा के रूप में हिंदी भाषा का विरोध करना औचित्यहीन है। महाराष्ट्र की तरह ही दक्षिण भारत की जनता को भी हिंदी भाषा से कोई परहेज नहीं है। क्षेत्रीयता के आधार पर हिंदी भाषा और हिंदी भाषी लोगों का विरोध कर वोट हासिल कर सत्ता स्वार्थ भोगना कुछ क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का पुराना शगल जरूर रहा हैलेकिन आज देश की जनता को भाषा से ज्यादा अपने विकास और सुरक्षा की जरूरत है। ऐसे में यदि कोई दल यह सोचे कि वह भाषा का वैमनस्य फैलाकर लंबे समय तक सत्ता का सुख भोग सकेगातो यह वर्तमान भारत में अब संभव नहीं है।

हिंदी हमारी राजभाषा है और यह हमारे राष्ट्रीय गौरव और स्वाभिमान की भाषा है। इसका विरोध करने का अधिकार किसी भी व्यक्ति या राजनीतिक दल को नहीं होना चाहिए। राष्ट्रभाषा का विरोध करने वाले लोगों और भाषा के आधार पर देश को बांटने वाले राजनीतिक दलों के खिलाफ केंद्र सरकार को कड़ा रुख अपनाना चाहिए। माननीय सर्वोच्च न्यायालय से भी निवेदन है कि भाषा और जाति के आधार पर देश को बाँटने वाले नेताओं को कड़ी फटकार लगाते हुए उनकी राजनीतिक मान्यता समाप्त की जाए।

यदि देश में एक विधान और एक निशान लागू हैतो फिर देश में एक भाषा भी लागू होना ही  चाहिए। भारत सरकार को भी चाहिए कि वह राजभाषा हिंदी को राष्ट्रभाषा का कानूनी दर्जा देकर देश में एक विधान और एक निशान के साथ देश की एक भाषा के रूप में हिंदी भाषा  को देश की पहचान के रूप में लागू करे अन्यथा सत्ता की चाह में क्षेत्रीय नेताओं का हिंदी भाषा का आंतरिक विरोध कब तक यह देश सहता रहेगा ?

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अरविंद रावल

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