नारी की उदारता का दिव्य स्वरूप मानवता के मूल में नारी का करुणामय हृदय

अपने अस्तित्व को दूसरों के लिए समर्पित कर देना है और यही गुण नारी के स्वभाव में स्वाभाविक रूप से विद्यमान है।

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नारी सृष्टि की सबसे कोमल किन्तु सबसे शक्तिशाली कृति है। वह केवल एक शरीर या एक सामाजिक भूमिका नहीं बल्कि जीवन का आधार है। उसके बिना संसार की कल्पना भी अधूरी है। नारी के व्यक्तित्व का सबसे उज्ज्वल पक्ष उसकी उदारता है जो उसे महान बनाती है। उदारता का अर्थ केवल दान देना नहीं बल्कि अपने अस्तित्व को दूसरों के लिए समर्पित कर देना है और यही गुण नारी के स्वभाव में स्वाभाविक रूप से विद्यमान है।
 
नारी की उदारता का सबसे श्रेष्ठ उदाहरण उसके मातृत्व में देखने को मिलता है। एक माता अपने बच्चे को गर्भ में धारण करने से लेकर उसके पालन पोषण तक हर कठिनाई को सहज भाव से स्वीकार करती है। वह अपनी भूख प्यास नींद सब कुछ त्याग कर अपने शिशु की देखभाल करती है। वह अपने सुखों का त्याग कर अपने बच्चे के भविष्य को संवारने में लग जाती है। उसकी ममता में कोई भेदभाव नहीं होता चाहे संतान कैसी भी हो वह उसे समान प्रेम देती है। यही नारी की उदारता की पराकाष्ठा है।
 
नारी केवल माता के रूप में ही नहीं बल्कि एक गृहिणी के रूप में भी अपनी उदारता का परिचय देती है। विवाह के बाद वह एक नए परिवार में प्रवेश करती है और उस परिवार को अपना मानकर पूरे मन से उसकी सेवा करती है। वह अपने माता पिता और अपने पुराने परिवेश को छोड़कर एक नए वातावरण में ढल जाती है। वह घर के प्रत्येक सदस्य की आवश्यकताओं का ध्यान रखती है और परिवार को एक सूत्र में बांधे रखती है। उसकी यह सेवा भावना और समर्पण उसकी उदारता का जीवंत उदाहरण है।
 
पत्नी के रूप में भी नारी का स्वरूप अत्यंत प्रेरणादायक होता है। वह अपने पति के सुख दुख में सहभागी बनती है और हर परिस्थिति में उसका साथ निभाती है। वह केवल एक जीवनसाथी ही नहीं बल्कि मार्गदर्शक भी होती है। अनेक उदाहरण मिलते हैं जहां पत्नी ने अपने पति को सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी और उसे जीवन में सफल बनाया। वह अपने परिवार के लिए त्याग करती है और अपने कर्तव्यों का निर्वाह पूरी निष्ठा से करती है। उसकी यह निष्ठा और त्याग उसकी उदारता का ही परिणाम है।
 
नारी की उदारता केवल परिवार तक सीमित नहीं है बल्कि समाज और राष्ट्र तक विस्तृत है। इतिहास में अनेक ऐसी नारियों का वर्णन मिलता है जिन्होंने अपने त्याग और बलिदान से समाज को नई दिशा दी। पन्ना धाय का उदाहरण इस संदर्भ में अत्यंत प्रेरणादायक है जिन्होंने अपने पुत्र का बलिदान देकर राज्य के उत्तराधिकारी की रक्षा की। यह त्याग केवल कर्तव्य नहीं बल्कि उदारता की चरम सीमा है।
 
नारी के हृदय में करुणा और दया का अथाह सागर होता है। वह दूसरों के दुख को अपना दुख मानती है और उनकी सहायता के लिए सदैव तत्पर रहती है। उसकी संवेदनशीलता उसे एक श्रेष्ठ मानव बनाती है। यही कारण है कि नारी को करुणा और प्रेम की मूर्ति कहा गया है। वह जहां भी होती है वहां स्नेह और शांति का वातावरण बनाती है।
 
धार्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में भी नारी की उदारता के अनेक उदाहरण मिलते हैं। वह केवल अपने आत्म कल्याण तक सीमित नहीं रहती बल्कि दूसरों को भी सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। वह अपने उपदेश और आचरण से समाज को दिशा प्रदान करती है। उसकी यह प्रवृत्ति उसके उदार हृदय का परिचायक है।
 
नारी को कभी कमजोर समझा गया है किन्तु वास्तव में वह अत्यंत सबल है। उसकी शक्ति उसकी सहनशीलता में है। वह विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखती है और अपने कर्तव्यों का निर्वाह करती रहती है। उसकी उदारता ही उसे यह शक्ति प्रदान करती है। वह अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के हित के बारे में सोचती है और यही उसे महान बनाता है।
नारी के बिना समाज का संतुलन संभव नहीं है। वह केवल जीवन देने वाली नहीं बल्कि जीवन को संवारने वाली भी है। उसकी भूमिका हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण है चाहे वह परिवार हो समाज हो या राष्ट्र। उसकी उदारता ही उसे सभी के लिए पूजनीय बनाती है।
 
आज के समय में आवश्यकता है कि नारी के इस उदार स्वरूप को समझा जाए और उसका सम्मान किया जाए। नारी को केवल अधिकार देने की बात ही नहीं बल्कि उसके योगदान को स्वीकार करने की भी आवश्यकता है। जब तक समाज में नारी का सम्मान नहीं होगा तब तक वास्तविक प्रगति संभव नहीं है।
 
अंततः यह कहा जा सकता है कि नारी की उदारता मानवता की सबसे बड़ी धरोहर है। उसका त्याग उसका प्रेम और उसकी करुणा इस संसार को सुंदर बनाते हैं। यदि नारी का यह गुण समाप्त हो जाए तो समाज में संतुलन और संवेदनशीलता का अभाव हो जाएगा। इसलिए हमें नारी के इस महान गुण का आदर करना चाहिए और उसके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए।
 
कांतिलाल मांडोत

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