आपदा में मुनाफा कमाने वालों पर राष्ट्रद्रोह का मामला दर्ज हो

आपदा के समय संयम, सजगता और कठोर प्रशासनिक कार्रवाई ही देश को संकट से उबार सकती है।

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मध्य-पूर्व एशिया के देशों से दुनिया में 40% कच्चे तेल की आपूर्ति होती है और एशिया महाद्वीप के चीन, भारत, जापान, कोरिया सहित कई देशों की ऊर्जा जरूरतों के लिए कच्चे तेल की 60–70% निर्भरता मध्य-पूर्व के प्रमुख तेल उत्पादक देशों पर ही है। ईरान की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि उसकी सीमा से एक महत्वपूर्ण समुद्री शॉर्टकट मार्ग निकलता है, जो महासागरीय व्यापार की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। पिछले चार सप्ताह से अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के साथ चल रहा युद्ध, जिसमें अभी तक कोई ठोस परिणाम नहीं निकले हैं, ने भारत सहित समूचे विश्व के अधिकांश देशों में तेल और गैस संकट की आशंका को बढ़ा दिया है। ईरान अपनी सीमा से अमेरिका समर्थित देशों को कच्चे तेल के परिवहन की अनुमति नहीं दे रहा है, जिससे यह संघर्ष अब अमेरिका की वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। वहीं, इजराइल के लिए इस प्रकार के युद्ध कोई नई बात नहीं है।

   ईरान-अमेरिका के इस लंबे संघर्ष ने भारत सहित दुनिया के कई देशों में कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति को प्रभावित किया है। भारत, जो विश्व का सर्वाधिक आबादी वाला देश है, अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का 60% से अधिक हिस्सा मध्य-पूर्व से आयात करता है, और इसका एक बड़ा भाग हॉर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग से आता है। भीषण युद्ध और बाधित मार्गों के बावजूद, भारत सरकार की सशक्त विदेश नीति के कारण भारतीय तिरंगे वाले जहाज कच्चा तेल और गैस लेकर देश तक पहुँच रहे हैं। ऐसे वैश्विक संकट के समय प्रत्येक भारतीय को अपनी सरकार पर विश्वास और गर्व होना चाहिए। कोरोना महामारी के दौरान भी भारत ने न केवल स्वयं को संभाला, बल्कि विश्व को संकट प्रबंधन का उदाहरण प्रस्तुत किया।

   वर्तमान युद्ध परिस्थितियों को देखते हुए एक बार फिर कच्चे तेल और गैस की कमी की आशंका है। ऐसे में केंद्र सरकार को सक्रिय होकर देश के नागरिकों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए आपूर्ति व्यवस्था को सुदृढ़ करने के साथ-साथ आवश्यक कठोर कदम उठाने होंगे। कोविड काल में कुछ असामाजिक तत्वों ने खाद्य वस्तुओं की कृत्रिम कमी की अफवाह फैलाकर गरीब और मध्यम वर्ग का शोषण किया था। अब पुनः इस युद्ध की आड़ में कुछ लोग आपदा को अवसर बनाकर मुनाफाखोरी की तैयारी में हैं। पेट्रोल पंपों और गैस एजेंसियों पर बढ़ती भीड़ इसी ओर संकेत करती है। अतः केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे जिला, ब्लॉक और ग्राम स्तर तक सख्ती से निगरानी रखें और आपदा के समय आम जनता का शोषण करने वाले लोगों के विरुद्ध राष्ट्रद्रोह जैसे कठोर प्रावधानों के तहत कार्रवाई करें, ताकि ऐसे तत्वों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सके।

साथ ही, यदि सरकार कच्चे तेल और गैस की खपत को नियंत्रित करना चाहती है, तो अप्रैल-मई की भीषण गर्मी को ध्यान में रखते हुए स्कूल, कॉलेज और छात्रावासों को अस्थायी रूप से बंद करने, तथा अनावश्यक रूप से चलने वाले वाहनों की आवाजाही पर नियंत्रण रखने तथा आवश्यकता अनुसार सीमित लॉकडाउन जैसे कदम भी राष्ट्रहित, जनहित और पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। आपदा के समय संयम, सजगता और कठोर प्रशासनिक कार्रवाई ही देश को संकट से उबार सकती है।

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अरविंद रावल

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