इजराइल-अमेरिका-ईरान संघर्ष और भारत के सामने नई चुनौतियाँ
महेन्द्र तिवारी
इजराइल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव आज की विश्व राजनीति की सबसे जटिल और चिंताजनक घटनाओं में से एक बन गया है। दशकों से चले आ रहे वैचारिक मतभेद, क्षेत्रीय प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा और परमाणु कार्यक्रम को लेकर गहराता अविश्वास इस संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार करते रहे हैं। हाल के वर्षों में यह टकराव केवल कूटनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई और प्रॉक्सी युद्धों के रूप में सामने आने लगा है। फरवरी 2026 में अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के कुछ सैन्य और परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों की खबरों ने इस तनाव को और अधिक गंभीर बना दिया। इस स्थिति ने न केवल मध्य-पूर्व को अस्थिर किया है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर भी गहरा असर डालने की आशंका पैदा कर दी है। विशेष रूप से भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए यह संकट कई नई चुनौतियाँ लेकर आया है।
इस त्रिकोणीय संघर्ष की जड़ें काफी गहरी हैं। ईरान का परमाणु कार्यक्रम लंबे समय से पश्चिमी देशों और इजराइल के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उसका लक्ष्य ऊर्जा उत्पादन तथा वैज्ञानिक विकास है। इसके विपरीत अमेरिका और इजराइल का आरोप है कि ईरान नागरिक परमाणु कार्यक्रम की आड़ में परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इजराइल विशेष रूप से इस संभावना को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है, क्योंकि ईरान के कई नेताओं ने अतीत में इजराइल के खिलाफ तीखे बयान दिए हैं। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की कुछ रिपोर्टों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े ऐसे संकेत मिले हैं जिनसे पश्चिमी देशों की आशंकाएँ और बढ़ गई हैं। यही कारण है कि इस मुद्दे पर लगातार प्रतिबंध, वार्ताएँ और कभी-कभी सैन्य कार्रवाई की संभावना बनी रहती है।
इसके अलावा ईरान द्वारा समर्थित कई सशस्त्र समूह भी इस तनाव को बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं। लेबनान में हिजबुल्ला, गाज़ा में हमास और यमन में हूत विद्रोही जैसे संगठनों को लेकर अमेरिका और इजराइल का आरोप है कि ये समूह ईरान के समर्थन से उनके हितों पर हमले करते रहते हैं। इन प्रॉक्सी संघर्षों ने मध्य-पूर्व को लंबे समय से अस्थिर बनाए रखा है। जब भी इजराइल और इन संगठनों के बीच टकराव बढ़ता है, तो उसके पीछे ईरान की भूमिका पर बहस छिड़ जाती है। अमेरिका इस पूरे परिदृश्य में अपने प्रमुख सहयोगी इजराइल की सुरक्षा को महत्वपूर्ण मानता है और साथ ही मध्य-पूर्व में अपने रणनीतिक प्रभाव को बनाए रखना चाहता है। यही कारण है कि ईरान को रोकने की अमेरिकी नीति कई बार कड़े प्रतिबंधों और सैन्य दबाव के रूप में सामने आती है।
इस बढ़ते तनाव का सबसे बड़ा प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। मध्य-पूर्व दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक है और यहाँ किसी भी प्रकार का युद्ध या अस्थिरता तुरंत अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को प्रभावित करती है। इस संदर्भ में होर्मुज जलडमरूमध्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला यह संकीर्ण समुद्री मार्ग विश्व ऊर्जा व्यापार का एक प्रमुख केंद्र है। अनुमान है कि दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग पाँचवां हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। यदि इस क्षेत्र में सैन्य टकराव बढ़ता है या ईरान इस मार्ग को अवरुद्ध करने की कोशिश करता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है।
भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है। भारत अपनी कुल तेल आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है और इस आयात का बड़ा हिस्सा मध्य-पूर्व से आता है। सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत जैसे देश लंबे समय से भारत के प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता रहे हैं। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती है, तो इन देशों से आने वाली तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे न केवल भारत में ऊर्जा की उपलब्धता पर असर पड़ेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने के कारण पेट्रोल-डीजल और अन्य ईंधनों की कीमतें भी तेजी से बढ़ सकती हैं। ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर परिवहन, उद्योग और कृषि जैसे क्षेत्रों पर पड़ता है, जिससे महंगाई बढ़ने और आर्थिक विकास की गति धीमी होने की आशंका रहती है।
भारत ने इस तरह की संभावित आपात स्थितियों से निपटने के लिए कुछ रणनीतिक कदम पहले से उठाए हैं। देश में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार की व्यवस्था की गई है ताकि आपूर्ति में अचानक बाधा आने पर कुछ समय तक ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सके। विशाखापत्तनम, मैंगलोर और पाडुर जैसे स्थानों पर बनाए गए भूमिगत भंडार भारत को सीमित अवधि तक राहत दे सकते हैं। इसके अतिरिक्त तेल विपणन कंपनियों और रिफाइनरियों के पास भी कुछ मात्रा में भंडार मौजूद रहता है, जिससे कुल मिलाकर कुछ महीनों तक स्थिति को संभाला जा सकता है। हालांकि यह समाधान केवल अस्थायी है और लंबे समय तक चलने वाले संकट के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
ऐसी स्थिति में भारत को अपनी ऊर्जा नीति को और अधिक विविधतापूर्ण बनाना होगा। मध्य-पूर्व पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए अन्य क्षेत्रों से तेल आयात बढ़ाने की आवश्यकता हो सकती है। पश्चिम अफ्रीका के नाइजीरिया और अंगोला जैसे देश, लैटिन अमेरिका के ब्राजील और वेनेजुएला जैसे उत्पादक तथा अमेरिका से होने वाला ऊर्जा व्यापार भारत के लिए संभावित विकल्प बन सकते हैं। इन क्षेत्रों से तेल आयात करने में परिवहन दूरी और लागत जैसी चुनौतियाँ अवश्य हैं, लेकिन आपूर्ति के स्रोतों में विविधता भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर सकती है।
रूस भी इस संदर्भ में भारत के लिए एक महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार के रूप में उभरा है। पिछले कुछ वर्षों में रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल की आपूर्ति ने भारत की ऊर्जा जरूरतों को काफी हद तक पूरा किया है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस नए बाजारों की तलाश में था और भारत ने इस अवसर का उपयोग करते हुए बड़ी मात्रा में रूसी तेल आयात किया। यदि मध्य-पूर्व से आपूर्ति में बाधा आती है, तो रूस से आयात बढ़ाना एक व्यावहारिक विकल्प हो सकता है। हालांकि इसके साथ भुगतान व्यवस्था, बीमा और परिवहन से जुड़ी कुछ कूटनीतिक तथा तकनीकी चुनौतियाँ भी सामने आ सकती हैं।
दीर्घकालिक दृष्टि से भारत के लिए ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों पर अधिक ध्यान देना भी आवश्यक है। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और जैव ईंधन जैसे विकल्प न केवल ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम कर सकते हैं, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी अधिक टिकाऊ समाधान प्रदान करते हैं। भारत पहले ही एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम और नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता बढ़ाने की दिशा में कई कदम उठा चुका है, लेकिन वैश्विक ऊर्जा संकट की संभावनाएँ यह संकेत देती हैं कि इन प्रयासों को और तेज करना होगा।
कूटनीतिक स्तर पर भी भारत को संतुलित और सक्रिय भूमिका निभाने की आवश्यकता है। भारत के इजराइल, अमेरिका और ईरान तीनों के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं। इजराइल भारत का एक प्रमुख रक्षा और प्रौद्योगिकी साझेदार है, अमेरिका के साथ रणनीतिक सहयोग लगातार बढ़ रहा है, जबकि ईरान भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति और चाबहार बंदरगाह परियोजना के कारण महत्वपूर्ण है। इसलिए भारत के लिए किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करने के बजाय संतुलित कूटनीति अपनाना अधिक व्यावहारिक माना जाता है। भारत परंपरागत रूप से संवाद और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थक रहा है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तनाव कम करने की अपील करता रहा है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि इजराइल-अमेरिका-ईरान तनाव केवल क्षेत्रीय राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। भारत जैसे विकासशील और ऊर्जा-आयात पर निर्भर देश के लिए यह स्थिति एक गंभीर चेतावनी भी है कि ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों को सुरक्षित और विविधतापूर्ण बनाना कितना आवश्यक है। रणनीतिक भंडार, नए आयात स्रोत, रूस जैसे साझेदारों के साथ सहयोग और नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार जैसे उपाय भारत को इस अनिश्चित वैश्विक परिदृश्य में अधिक सुरक्षित बना सकते हैं। साथ ही, कूटनीतिक संतुलन और शांति के प्रयास भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि अंततः वैश्विक ऊर्जा स्थिरता का आधार अंतरराष्ट्रीय शांति और सहयोग ही है।

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