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तीसरे विश्वयुद्ध का रिहर्सल साबित हो सकता है मौजूदा घटनाचक्र
मनोज कुमार अग्रवाल
पश्चिम एशिया एक बार फिर इतिहास के सबसे खतरनाक मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत और इजरायल-अमेरिका के संयुक्त सैन्य हमलों ने पूरे क्षेत्र को युद्ध की खुली आग में झोंक दिया है। तेहरान पर सीधे हमले, सर्वोच्च नेतृत्व को निशाना बनाने की कार्रवाई और 1,200 से अधिक बम गिराए जाने पश्चिम एशिया में हालात विस्फोटक हो चुके हैं। एक ओर तेहरान अमेरिकी अग्नें और इजरायल पर अभूतपूर्व जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दे रहा है, तो दूसरी ओर वॉशिंगटन ने साफ कर दिया है कि किसी भी हमले का उत्तर विनाशकारी होगा।
दुबई समेत खाड़ी क्षेत्र में तनाव, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और बहरीन पर हमलों की खबरें, और क्षेत्रीय शक्तियों की सक्रियता ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध की ओर बढ़ रही है? अमेरिका के कथित 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' और इजरायल के 'ऑपरेशन लायन्स रोअर' ने ईरान के भीतर सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया। इन हमलों का घोषित उद्देश्य ईरान की परमाणु और बैलिस्टिक क्षमताओं को सीमित करना बताया जा रहा है, लेकिन असली सवाल सिर्फ सैन्य क्षमता का नहीं, बल्कि क्षेत्रीय वर्चस्व का है।
मिडिल ईस्ट दशकों से भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र रहा है ऊर्जा संसाधन, समुद्री मार्ग, धार्मिक राजनीतिक प्रभाव और सुरक्षा गठबंधन यहां की राजनीति को आकार देते रहे हैं। इस बीच वर्तमान संकट ने दुनिया को एक बार फिर दो खेमों में बांटने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। अली खामेनेई 1989 से ईरान की सर्वोच्च सत्ता पर काबिज थे। तीन दशक से अधिक समय तक उन्होंने ईरान की विदेश नीति, परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय रणनीति को दिशा दी। उनके नेतृत्व में ईरान ने अमेरिका और इजरायल के साथ टकराव की नीति अपनाई, साथ ही लेबनान, सीरिया, इराक और यमन में अपने प्रभाव का विस्तार किया।
ऐसे नेता की अचानक हिंसक मौत सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन में बड़ा झटका है। यही कारण है कि दुनिया में गुटबंदी के दुनिया में गुटबंदी शुरू हो गयी है। अमेरिका-इजरायल के साथ पश्चिमी देशों का खुफिया और लॉजिस्टिक समर्थन खड़ा दिखाई देता है। अमेरिका और उसके सहयोगियों का तर्क है कि ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षा वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या सैन्य हमले किसी परमाणु कार्यक्रम का स्थायी समाधान हो सकते हैं? इतिहास चताता है कि बमबारी से विचारधाराएं खत्म नहीं होतीं; वे और कठोर हो जाती हैं। यूरोप की प्रतिनिऽया संतुलित लेकिन चिंतित रही है।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कौर स्टार्मर, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने बातचीत बहाल करने की अपील की है। उन्होंने स्प्ष्ट किया कि वे इस हमले में शामिल नहीं थे, लेकिन वे अमेरिका और क्षेत्रीय सहयोगियों के संपर्क में हैं। यूरोप जानता है कि यदि पश्चिम एशिया में बड़ा युद्ध भड़कता है तो शरणार्थी संकट, ऊर्जा अस्थिरता और आतंकवाद की नई लहर सीधे उसके दरवाजे पर दस्तक देगी। दूसरी ओर, रूस और चीन ने हमलों की निंदा तो की है, पर सीधे हस्तक्षेप के संकेत नहीं दिए।
रूस ने इसे सत्ता परिवर्तन की साजिश बताया है, जबकि चीन ने ईरान की संप्रभुता के सम्मान की बात कही। लेकिन दोनों देशों की रणनीति व्यावहारिक है कि वे अमेरिका को एक और लंबे युद्ध में उलझा देखना चाहते हैं। यूक्रेन युद्ध में व्यस्त रूस और आर्थिक हितों में उलझा चीन फिलहाल प्रत्यक्ष सैन्य टकराव से बचना चाहेंगे। अगर देखा जाए तो ईरान की ताकत केवल उसकी सेना नहीं, बल्कि उसका 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' नेटवर्क है, लेबनान का हिज्बुवाह, यमन के हुत्ती, और इराक सीरिया की शिया मिलिशिया इसमें शामिल है।
यदि यह नेटवर्क पूरी तरह सक्रिय होता है, तो संघर्ष कई मोचौं पर फैल सकता है। खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डे, इजरायल के शहर और लाल सागर की शिपिंग लाइनें निशाने पर आ सकती हैं। यही वह बिंदु है जहां क्षेत्रीय युद्ध वैश्विक संकट में बदल सकता है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन जैसे देश पहले से अमेरिकी सुरक्षा छाते पर निर्भर हैं। यदि ईरान इनके खिलाफ हमले तेज करता है, तो अमेरिका की प्रत्यक्ष भागीदारी और गहरी हो सकती है। यह वही परिदृश्य है जिसने 1991 के खाड़ी युद्ध और 2003 के इराक युद्ध को जन्म दिया था। फर्क इतना है कि इस बार ईरान कहीं अधिक संगठित, तकनीकी रूप से सक्षम और वैचारिक रूप से आक्रामक है।
दक्षिण एशिया की भूमिका भी दिलवस्प है। पाकिस्तान ने ईरान के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन किया है, लेकिन वह खुलकर अमेरिका के खिलाफ नहीं जाएगा। भारत ने पारंपरिक संतुलन की नीति अपनाई है और शांति और कूटनीति पर जोर दिया है। भारत के लिए, यह संकट ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़ा है। नई दिल्ली किसी खेमे में शामिल होने से बचेगी, क्योंकि उसका हित बहुध्रुवीय संतुलन में है। जिस प्रकार से दुनिया के देशों का रुख देख दिया है, उससे स्थिति काफी भयावह दिख रही है।
ईरान की असली ताकत उसका 'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस' नेटवर्क है, लेबनान का हिज्बुवाह, यमन के हुती विद्रोही, और इराक-सिरिया की शिया मिलिशिया। यह नेटवर्क असममित युद्ध का साधन है। सीधे टकराव के बजाय प्रॉक्सी हमलों के जरिए दवाव बनाना ईरान की रणनीति का हिस्सा रहा है। हालांकि हिन्कुबह पहले से कमजोर है और हृती विद्रोहियों पर भी अमेरिका ने कई हमले किए हैं। ऐसे में यह नेटवर्क कितना प्रभावी रहेगा, यह बड़ा प्रश्न है। सऊदी अरब, यूएई और बहरीन जैसे देश वर्षों से अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर निर्भर रहे हैं। ईरान के साथ उनकी प्रतिद्वंद्विता नई नहीं है। यदि इन देशों पर हमले बढ़ते हैं तो वे स्वाभाविक रूप से अमेरिका के और करीब जाएंगे।
रिपोटों के अनुसार सऊदी नेतृत्व ने पहले भी वॉशिंगटन पर ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाने का दबाव डाला था। अब जब जवाबी कार्रवाई का खतरा सामने है, तो ये देश सुरक्षा और स्थिरता के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं। खाड़ी क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का केंद्र है। यहां अस्थिरता का अर्थ है तेल कीमतों में उछाल, आपूर्ति श्रृंखलाओं में बाधा और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर। यदि होरमुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक मार्ग बाधित होते हैं, तो इसका प्रभाव एशिया, यूरोप और अमेरिका तक महसूस होगा। परमाणु हथियारों का सीधा उपयोग भले दूर की बात हो, लेकिन परमाणु ठिकानों पर हमले रेडियोधर्मी जोखिम और वैश्विक दहशत पैदा कर सकते हैं।
हालांकि इस समय आवश्यकता है संयम और संवाद की। इतिहास गवाह है कि क्यूचा मिसाइल संकट से लेकर ईरान परमाणु समझौते तक, कूटनीति ने ही परमाणु टकराबों को टाला है। यदि बार्ता के दरवाजे पूरी तरह बंद हो गए, तो युद्ध की लपटें सीमाओं को नहीं पहचानेंगी। अली खामेनेई की मौत ने एक युग का अंत किया है, लेकिन यह एक नए और अनिश्चित अध्याय की शुरुआत भी है। ईरान के भीतर सत्ता हस्तांतरण, जनता की प्रतिक्रिया और सैन्य नेतृत्व की रणनीति आने वाले दिनों में तय करेगी कि यह संकट किस दिशा में जाएगा। दुनिया के लिए यह क्षण चेतावनी का है कि एक ऐसा समय जब शक्ति प्रदर्शन से ज्यादा विवेक की जरूरत है। आज आवश्यकता है संयम, संवाद और यथार्थवादी आकलन की। युद्ध में विजेता कोई नहीं होता, क्योंकि हार हमेशा मानवता की होती है। दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध की नहीं, तीसरे दशक की स्थिरता की जरूरत है।
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