डिजिटल क्रांति के दौर में सार्वजनिक पुस्तकालयों की अनिवार्यता

ई-कंटेंट से दिशा पाते युवा और ज्ञान-संस्कृति की नई धारा

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वर्तमान समय को यदि ज्ञान और तकनीक का युग कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इंटरनेट, स्मार्टफोन और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने जानकारी को सहज, सुलभ और त्वरित बना दिया है। आज का युवा वर्ग ई-कंटेंट, ऑनलाइन पाठ्यसामग्री, ई-बुक्स और ऑडियो बुक्स की ओर तीव्र गति से आकर्षित हो रहा है। इसके बावजूद यह सत्य उतना ही प्रबल है कि सार्वजनिक पुस्तकालयों की आवश्यकता आज पहले से अधिक बढ़ गई है। पुस्तकालय केवल पुस्तकों का भंडार नहीं, बल्कि समाज की बौद्धिक चेतना, सांस्कृतिक परंपरा और नैतिक मूल्यों के संरक्षक हैं। यदि इनकी उपेक्षा की गई तो ज्ञान-संस्कृति की जड़ें कमजोर पड़ सकती हैं।
 
सार्वजनिक पुस्तकालयों ने सदैव पढ़ने-लिखने की आदत को विकसित किया है। अकादमिक शिक्षा हो या स्वाध्याय के माध्यम से आत्मविकास की आकांक्षा, पुस्तकालय हर वर्ग के लिए समान रूप से उपयोगी रहे हैं। शांत वातावरण, अनुशासित परिवेश और विविध विषयों पर उपलब्ध साहित्य व्यक्ति को गहन अध्ययन की ओर प्रेरित करता है। डिजिटल माध्यमों की तात्कालिकता के बीच पुस्तकालय मन को स्थिरता प्रदान करते हैं। यह स्थिरता ही गहन चिंतन और मौलिक विचारों को जन्म देती है।
 
देश में सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थिति पर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट होता है कि विभिन्न राज्यों में इनकी संख्या और गुणवत्ता में व्यापक अंतर है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2018-19 तक देश में 46,746 सार्वजनिक पुस्तकालय थे, जिसका उल्लेख राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन ने किया था। यह संख्या आशाजनक प्रतीत होती है, परंतु देश की विशाल जनसंख्या और युवाओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए यह पर्याप्त नहीं कही जा सकती। महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में हजारों पुस्तकालय हैं, जबकि कुछ समृद्ध राज्यों में इनकी संख्या अत्यंत सीमित है। इससे यह सिद्ध होता है कि पुस्तकालयों का विकास केवल आर्थिक स्थिति पर निर्भर नहीं करता, बल्कि पढ़ने की संस्कृति और शासन की प्राथमिकताओं पर आधारित होता है।
 
विशेष रूप से केरल का उदाहरण उल्लेखनीय है, जहां सीमित संसाधनों के बावजूद पढ़ने की परंपरा सशक्त है। इसके विपरीत कुछ धनी राज्यों में पुस्तकालयों की संख्या अत्यल्प है। अनेक राज्यों में पुस्तकालय भवन जर्जर अवस्था में हैं, स्टाफ की कमी है और नई पुस्तकों की उपलब्धता सीमित है। ग्रामीण और छोटे कस्बों में तो डिजिटल संसाधनों का अभाव और भी स्पष्ट दिखाई देता है। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि पुस्तकालय सामाजिक समानता और ज्ञान के लोकतंत्रीकरण का माध्यम हैं।
 
डिजिटल युग ने अध्ययन के स्वरूप को परिवर्तित कर दिया है। ई-कंटेंट ने युवाओं के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं। ऑनलाइन कोर्स, डिजिटल जर्नल, शैक्षणिक वीडियो और ऑडियो सामग्री ने सीखने की प्रक्रिया को अधिक लचीला बना दिया है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले लाखों विद्यार्थी इंटरनेट के माध्यम से अद्यतन जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। कई सार्वजनिक पुस्तकालयों ने भी डिजिटल सेवाएं आरंभ की हैं, जिससे वे युवाओं के लिए अधिक आकर्षक बन रहे हैं।
 
ई-कंटेंट का महत्व इस बात में है कि यह समय और स्थान की सीमाओं को समाप्त करता है। विद्यार्थी घर बैठे विश्वस्तरीय सामग्री तक पहुंच सकते हैं। दृष्टिबाधित या विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थियों के लिए ऑडियो बुक्स और सहायक तकनीक अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रही हैं। इस प्रकार डिजिटल संसाधन शिक्षा को अधिक समावेशी और व्यापक बनाते हैं। परंतु यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि डिजिटल संसाधनों तक समान पहुंच सभी को प्राप्त नहीं है। इंटरनेट और उपकरणों की कमी डिजिटल विभाजन को जन्म देती है। ऐसे में सार्वजनिक पुस्तकालय इस खाई को पाटने का माध्यम बन सकते हैं। यदि पुस्तकालयों में कंप्यूटर, इंटरनेट और ई-लाइब्रेरी की सुविधा उपलब्ध हो, तो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के विद्यार्थी भी डिजिटल युग से जुड़ सकते हैं।
 
प्रतियोगी परीक्षार्थियों के लिए सार्वजनिक पुस्तकालय आज भी प्रेरणास्थल हैं। कोटा और अजमेर जैसे शहरों में हजारों विद्यार्थी नियमित रूप से पुस्तकालयों में अध्ययन करते हैं। शांत वातावरण और संदर्भ पुस्तकों की उपलब्धता उन्हें एकाग्रता प्रदान करती है। बेंगलूरु में सैकड़ों पुस्तकालय हैं, जिनमें बड़ी संख्या में पंजीकृत सदस्य हैं और उनमें अधिकांश विद्यार्थी हैं। यह तथ्य दर्शाता है कि यदि पुस्तकालय आधुनिक सुविधाओं से युक्त हों तो युवा वर्ग उनसे जुड़ने में रुचि रखता है।
 
पुस्तकालयों की प्रासंगिकता केवल शैक्षणिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये हमारी साहित्यिक धरोहर, ऐतिहासिक दस्तावेज और वैचारिक परंपराओं को सुरक्षित रखते हैं। डिजिटल माध्यमों की त्वरित और क्षणभंगुर प्रकृति के बीच पुस्तकालय स्थायित्व का प्रतीक हैं। यहां उपलब्ध सामग्री सत्यापन योग्य और विश्वसनीय होती है, जो युवाओं को भ्रामक सूचनाओं से बचाती है। आज जब सोशल मीडिया पर अप्रमाणित जानकारी का प्रसार तीव्र गति से होता है, तब पुस्तकालय प्रमाणिक ज्ञान के स्रोत के रूप में और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
 
केंद्र सरकार द्वारा पुस्तकालयों के सुदृढ़ीकरण हेतु राष्ट्रीय स्तर पर पहल की गई है। राष्ट्रीय लाइब्रेरी मिशन के अंतर्गत राज्यों में केंद्रीय और जिला पुस्तकालयों को वित्तीय सहायता प्रदान करने का प्रावधान है। यह प्रयास स्वागतयोग्य है, परंतु इसकी सफलता राज्य सरकारों की सक्रियता और समाज की सहभागिता पर निर्भर करती है। यदि पुस्तकालय कानून, बुनियादी ढांचा और फंडिंग की व्यवस्था होने के बावजूद अपेक्षित ध्यान न मिले, तो उनका विकास बाधित हो जाता है।
 
आज आवश्यकता इस बात की है कि पुस्तकालयों को केवल परंपरा के प्रतीक के रूप में न देखा जाए, बल्कि उन्हें डिजिटल युग के अनुरूप विकसित किया जाए। पारंपरिक पुस्तकों के साथ-साथ ई-कंटेंट, डिजिटल डेटाबेस और ऑनलाइन संसाधनों को समाहित कर पुस्तकालयों को ज्ञान के समग्र केंद्र के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए। विद्यालयों और महाविद्यालयों के विद्यार्थियों को पुस्तकालय से जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाए जाने चाहिए। डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को सही और गलत जानकारी में अंतर करने की क्षमता प्रदान की जानी चाहिए।
 
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि डिजिटल युग में सार्वजनिक पुस्तकालयों की आवश्यकता समाप्त नहीं हुई है, बल्कि उनका स्वरूप परिवर्तित हुआ है। ई-कंटेंट युवाओं को नई दिशा दे रहा है, परंतु उस दिशा को संतुलित और सार्थक बनाने के लिए पुस्तकालयों का शांत, अनुशासित और ज्ञानपूर्ण वातावरण अनिवार्य है। यदि हम चाहते हैं कि हमारी युवा पीढ़ी विवेकशील, संस्कारित और जिम्मेदार नागरिक बने, तो हमें पुस्तकालयों को सशक्त बनाना होगा। पुस्तकालय और ई-कंटेंट का समन्वय ही भविष्य की ज्ञान-संस्कृति को सुदृढ़ और समृद्ध बना सकता है।
 
कांतिलाल मांडोत

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