भारत का गणतंत्र दिवस: लोकतंत्र की अमर परंपरा

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- महेन्द्र तिवारी

भारत में 26 जनवरी केवल एक तारीख नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक संकल्प की स्मृति है, जब औपनिवेशिक शासन से मुक्त होकर देश ने स्वयं को एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित किया। गणतंत्र दिवस उस क्षण का उत्सव है, जब सत्ता किसी राजा, साम्राज्य या उपनिवेश के हाथ में नहीं, बल्कि संविधान के माध्यम से जनता के हाथों में सौंपी गई। यह दिन हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक मुक्ति नहीं, बल्कि समानता, न्याय और गरिमा के साथ जीने का अधिकार है।

भारत का स्वतंत्रता संग्राम जितना गौरवशाली था, उतना ही जटिल और लंबा भी। 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ, पर उस स्वतंत्रता को सार्थक रूप देने के लिए एक ऐसे संविधान की आवश्यकता थी, जो भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज को एक सूत्र में बांध सके। 26 जनवरी 1930 को लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में घोषित पूर्ण स्वराज का संकल्प केवल ब्रिटिश सत्ता से मुक्ति की मांग नहीं था, बल्कि आत्मनिर्णय और आत्मसम्मान की घोषणा भी था। यही कारण है कि स्वतंत्र भारत के संविधान को लागू करने के लिए इसी तिथि को चुना गया। 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ संविधान भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की आधारशिला बना।

डॉ. भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में निर्मित भारतीय संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि सामाजिक क्रांति का घोषणापत्र है। यह उस समाज के लिए लिखा गया था, जो सदियों से जाति, वर्ग, लिंग और धर्म के आधार पर विभाजित रहा। समानता का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक आज़ादी, और न्याय तक पहुंच—ये सभी प्रावधान उस भारत की कल्पना करते हैं, जहां नागरिक की पहचान उसकी जन्मगत स्थिति से नहीं, बल्कि उसके अधिकारों और कर्तव्यों से तय होती है। संविधान ने भारत को संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर यह स्पष्ट कर दिया कि सत्ता का अंतिम स्रोत जनता है।

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गणतंत्र दिवस के भव्य आयोजन इस लोकतांत्रिक चेतना को दृश्य रूप देते हैं। दिल्ली के कर्तव्य पथ पर होने वाली परेड केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता का मंच है। विभिन्न राज्यों की झांकियां देश की सांस्कृतिक विविधता को प्रस्तुत करती हैं और यह संदेश देती हैं कि भारत की ताकत उसकी बहुलता में निहित है। सेना, नौसेना और वायुसेना का अनुशासित मार्च देश की सुरक्षा और संप्रभुता का प्रतीक है, जबकि बच्चों की भागीदारी भविष्य की आशाओं को स्वर देती है। यह आयोजन राष्ट्र को स्वयं से संवाद करने का अवसर देता है।

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हालांकि गणतंत्र दिवस का महत्व केवल औपचारिक समारोहों तक सीमित नहीं है। यह दिन आत्मचिंतन का भी है। पिछले सात दशकों में भारत ने लोकतंत्र की लंबी यात्रा तय की है। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण, स्वतंत्र न्यायपालिका और जीवंत मीडिया ने भारत को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में स्थापित किया है। वैज्ञानिक उपलब्धियां, अंतरिक्ष मिशन, डिजिटल क्रांति और वैश्विक मंचों पर बढ़ती भूमिका भारत की प्रगति के प्रमाण हैं। फिर भी, यह प्रश्न बार-बार सामने आता है कि क्या लोकतंत्र का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा है।

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आज भारत गंभीर सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। बढ़ती असमानता, बेरोजगारी, किसानों की आय का संकट, महिलाओं की सुरक्षा, और पर्यावरणीय क्षरण जैसे मुद्दे लोकतांत्रिक व्यवस्था की परीक्षा ले रहे हैं। संविधान ने समान अवसर का वादा किया था, लेकिन जमीनी सच्चाई अक्सर इस वादे से पीछे रह जाती है। लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित न होकर जवाबदेही और सहभागिता की मांग करता है। जब नागरिकों की आवाज़ को दबाया जाता है या असहमति को राष्ट्रविरोध के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होती है।

गणतंत्र दिवस हमें यह भी याद दिलाता है कि संविधान एक स्थिर दस्तावेज नहीं, बल्कि समय के साथ विकसित होने वाली जीवंत व्यवस्था है। अब तक हुए संशोधन सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों के अनुरूप हैं, लेकिन किसी भी संशोधन की कसौटी यही होनी चाहिए कि वह संविधान की मूल भावना—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता—को मजबूत करे, न कि कमजोर। लोकतंत्र में सत्ता पक्ष के साथ-साथ एक सशक्त विपक्ष, स्वतंत्र न्यायपालिका और निष्पक्ष संस्थाएं अनिवार्य हैं। इनके बिना गणतंत्र केवल नाममात्र का रह जाएगा।

आज जब भारत ‘आज़ादी के अमृत काल’ की बात करता है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि विकास के मॉडल पर पुनर्विचार किया जाए। आर्थिक वृद्धि तब तक सार्थक नहीं हो सकती, जब तक वह समावेशी न हो। शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश, ग्रामीण भारत का सशक्तिकरण, और हाशिए पर खड़े समुदायों को मुख्यधारा में लाना लोकतांत्रिक दायित्व हैं। डॉ. अंबेडकर ने चेताया था कि राजनीतिक समानता के साथ सामाजिक और आर्थिक समानता नहीं आई, तो लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है। यह चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

गणतंत्र दिवस का सबसे बड़ा संदेश सामाजिक एकता है। यह दिन याद दिलाता है कि भारत की पहचान किसी एक भाषा, धर्म या संस्कृति से नहीं, बल्कि उसके बहुरंगी ताने-बाने से है। जब पूर्वोत्तर से लेकर दक्षिण और कश्मीर से लेकर कच्छ तक की झलकियां एक मंच पर आती हैं, तो संघीय ढांचे की शक्ति स्पष्ट होती है। यह विविधता किसी कमजोरी का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की परिपक्वता का संकेत है।

अंततः गणतंत्र दिवस उत्सव से अधिक एक जिम्मेदारी है। यह दिन हमें संविधान के प्रति निष्ठा और लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण का संकल्प लेने का अवसर देता है। नागरिकों के अधिकारों के साथ-साथ उनके कर्तव्यों की भी याद दिलाता है। स्वतंत्रता की रक्षा केवल संस्थानों का काम नहीं, बल्कि हर जागरूक नागरिक की भूमिका इसमें निर्णायक है। जब तक लोकतंत्र में संवाद, सहिष्णुता और न्याय जीवित हैं, तब तक गणतंत्र जीवित रहेगा।

गणतंत्र दिवस हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम किस भारत की ओर बढ़ रहे हैं। क्या वह भारत होगा, जहां विकास के साथ करुणा और समावेशिता चले, या ऐसा भारत जहां उपलब्धियां केवल आंकड़ों तक सीमित रह जाएं? इस प्रश्न का उत्तर हमारे सामूहिक आचरण में निहित है। संविधान ने मार्ग दिखाया है; अब उस पर चलने की जिम्मेदारी हम सबकी है। यही गणतंत्र दिवस का वास्तविक अर्थ है—लोकतंत्र का उत्सव और भविष्य के प्रति संकल्प।

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