देश की अखंडता और संप्रभुता पर सवाल उठाने वाले: धर्म और संप्रदाय में बंटता व्यक्ति विशेष
कबीर ने हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया।
भारत का गौरव उसकी अखंडता और संप्रभुता है। यह वह धरोहर है जिसने सदियों से हमें एकजुट रखा। लेकिन आज जब व्यक्ति विशेष अपने स्वार्थ, धर्म और संप्रदाय की सीमाओं में बँधकर राष्ट्रहित से ऊपर उठने से इंकार करता है, तब यह न केवल देश की एकता के लिए खतरा है बल्कि इतिहास की उन गलतियों को दोहराने जैसा है जिनसे हमें पहले भी कष्ट सहना पड़ा है।
अखंडता और संप्रभुता का अर्थ
अखंडता केवल भौगोलिक सीमाओं की बात नहीं करती, बल्कि यह हमारे विचार, संस्कृति और सामाजिक ताने-बाने की भी एकजुटता है। संप्रभुता का अर्थ है—किसी बाहरी दबाव के बिना स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था—
“हमारे राजनीतिक लोकतंत्र की सफलता तभी संभव है जब हम सामाजिक और आर्थिक जीवन में भी समानता और एकता बनाए रखें।”
धर्म-संप्रदाय की आड़ में विभाजन
आज धर्म और संप्रदाय के नाम पर विभाजन की राजनीति और सामाजिक दरारें सबसे बड़ी चुनौती हैं।कभी मंदिर-मस्जिद के विवाद को हवा दी जाती है।कभी जातीय पहचान को चुनावी हथियार बनाया जाता है।कभी क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर विद्वेष फैलाया जाता है।यह सब केवल राष्ट्र की एकता को कमजोर करता है। महात्मा गांधी ने चेताया था—“धर्मों के बीच नफ़रत फैलाना इंसानियत के खिलाफ सबसे बड़ा अपराध है।”
व्यक्ति विशेष का संकट
व्यक्ति विशेष आज संकीर्ण पहचान में इतना उलझा है कि राष्ट्र की व्यापक पहचान को भूलने लगा है।
धर्म के नाम पर श्रेष्ठता की होड़,संप्रदाय की दीवारें,और जाति का बंधन—ये सब मिलकर इंसान को उसकी असली भूमिका से भटका देते हैं। इतिहास गवाह है कि जब व्यक्ति विशेष अपने समुदाय को राष्ट्र से ऊपर रखने लगा, तभी देश कमजोर हुआ।
इतिहास से सबक
1. प्राचीन काल – महाभारत का युद्ध केवल ईर्ष्या और अहंकार का परिणाम था, जिसने समूचे आर्यावर्त को हिला दिया।
2. मध्यकाल – जब-जब राजाओं और रजवाड़ों ने आपसी झगड़े किए, तभी विदेशी आक्रमणकारियों को भारत में पाँव जमाने का मौका मिला।
3. औपनिवेशिक काल – अंग्रेजों ने “फूट डालो और राज करो” की नीति अपनाई, और हम गुलामी के लंबे दौर में फँस गए।
कबीर ने लिखा था—
“माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका छोड़ दे, मन का मनका फेर।”
अर्थात असली बदलाव मन में होना चाहिए, वरना बाहरी कर्मकांड व्यर्थ है। यही संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
आज के युग की चुनौतियाँ
21वीं सदी में वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच भारत एक उभरती शक्ति है।
आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति हमें नई ऊँचाइयों पर ले जा रही है।लेकिन आंतरिक विघटन और धर्म-संप्रदाय आधारित राजनीति इस यात्रा को कमजोर कर सकती है।यदि व्यक्ति विशेष अपने संप्रदाय को राष्ट्र से ऊपर रखेगा, तो भारत की अखंडता और संप्रभुता पर सीधा प्रहार होगा।
राष्ट्रवाद की सच्ची परिभाषा
सच्चा राष्ट्रवाद वह है जिसमें हर नागरिक अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए भी राष्ट्र की एकता को सर्वोपरि मानता है।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था—
“धर्म का उद्देश्य विभाजन नहीं, बल्कि समन्वय है। अगर कोई धर्म लोगों को तोड़ता है तो वह धर्म नहीं, अज्ञान है।”
साहित्य और संस्कृति की भूमिका
भारतीय साहित्य हमेशा से अखंडता का प्रहरी रहा है। तुलसीदास, रहीम, कबीर, प्रेमचंद और निराला तक—सभी ने अपने लेखन में इंसानियत और एकता का संदेश दिया।
कबीर ने हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया।
रहीम ने दान और उदारता का आदर्श प्रस्तुत किया।
प्रेमचंद ने जातिवाद और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई।
यह साहित्य आज भी हमें याद दिलाता है कि व्यक्ति विशेष की पहचान धर्म या संप्रदाय में नहीं, बल्कि इंसानियत और राष्ट्रभक्ति में है।
निष्कर्ष
देश की अखंडता और संप्रभुता पर सवाल उठाना राष्ट्र की आत्मा पर सवाल उठाने जैसा है। धर्म और संप्रदाय में बँटा व्यक्ति विशेष राष्ट्र को कभी मजबूत नहीं बना सकता। आज की आवश्यकता यही है कि हम संकीर्णताओं से ऊपर उठें और “भारत” को सर्वोपरि मानें।
क्योंकि अंततः –
“न तो हिंदू, न मुसलमान,
न ही कोई ईसाई है,
भारत की संतानों के लिए
राष्ट्र ही सबसे बड़ी पहचान है।”

लेखक – बृजभूषण तिवारी


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