परमाणु युद्ध की धमकी और शांत विश्व: क्यों चुप हैं महाशक्तियां?

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लेखक: डॉ. मनमोहन प्रकाश, स्वतंत्र पत्रकार
 
हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में तीर्थयात्रियों पर हुआ आतंकी हमला न केवल भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए, बल्कि वैश्विक शांति के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है। यह कायरतापूर्ण हमला उन आतंकियों द्वारा किया गया, जिन्हें वर्षों से पाकिस्तान में पनाह और समर्थन मिलता रहा है। भारत सरकार, समस्त राजनीतिक दलों और समाज के सभी वर्गों ने इसकी कठोर भर्त्सना की। विश्व के अनेक देशों ने भी दुःख प्रकट किया, परंतु उसके बाद एक चुप्पी छा गई — विशेषकर उन महाशक्तियों की, जिनके कंधों पर वैश्विक शांति की जिम्मेदारी है।
 
भारत सरकार ने इस बार कड़ा रुख अपनाया है, परंतु जैसे ही पाकिस्तान को संभावित जवाबी कार्रवाई का भय हुआ, उसकी ओर से परमाणु हमले की धमकियाँ सामने आने लगीं — और वह भी वहाँ के मंत्रियों, सैन्य अधिकारियों तथा पूर्व राजनयिकों की ओर से। क्या यह स्वीकार्य है कि कोई देश आतंकवादियों को संरक्षण दे और फिर जब उसकी आलोचना हो, तो वह परमाणु हथियारों का डर दिखाने लगे?
 
यहाँ मूल प्रश्न उठता है — क्यों चुप हैं महाशक्तियाँ?
क्या उन्हें यह नहीं दिखाई देता कि पाकिस्तान ने आतंकवाद को एक राज्य-नीति का रूप दे दिया है? क्या यह संभव है कि हाफिज सईद, मसूद अजहर, दाऊद इब्राहीम और सलाउद्दीन जैसे आतंकी केवल जनता के समर्थन से वहाँ खुलेआम घूमते हैं? नहीं। यह सब सेना और आईएसआई के संरक्षण में हो रहा है, और दुनिया यह सब जानते हुए भी चुप क्यों है?
 
पाकिस्तान की बार-बार दी जाने वाली परमाणु धमकियाँ एक खतरनाक मिसाल पेश करती हैं — क्या अब कोई भी देश आतंकवादियों को पाल-पोसकर उन्हें ‘रणनीतिक साधन’ बना सकता है, और फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर परमाणु ताकत की आड़ लेकर आलोचना से बच सकता है? यदि रूस-यूक्रेन युद्ध में रूस ने बार-बार परमाणु धमकी दी होती, तो क्या पश्चिमी देश उतने ही शांत रहते? यदि इज़रायल-हमास संघर्ष में इज़रायल ने ऐसे बयान दिए होते, तो क्या संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रिया इतनी शिथिल होती?
 
आज अमेरिका पाकिस्तान को एफ-16 विमानों के रखरखाव के लिए धन देता है, यह जानते हुए भी कि भारत यदि आतंकवाद के विरुद्ध कोई कदम उठाता है, तो यही विमान भारत के विरुद्ध प्रयुक्त हो सकते हैं। यह विरोधाभास अंतरराष्ट्रीय नीति को नैतिकता से दूर और रणनीतिक स्वार्थ के अधिक निकट ले जाता है। दुनिया यह भी नहीं भूल सकती कि ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकी को भी पाकिस्तान ने वर्षों तक छिपा रखा था। और कितने प्रमाण चाहिए यह सिद्ध करने के लिए कि पाकिस्तान वैश्विक आतंकवाद का केंद्र बन चुका है?
 
अगर आज भी संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, चीन, रूस और यूरोपीय शक्तियाँ पाकिस्तान की परमाणु धमकियों और आतंकवाद के प्रति उसके दोहरे रवैये पर चुप रहीं, तो यह चुप्पी भविष्य में वैश्विक विनाश का कारण बन सकती है। आज आतंकवाद की आग भारत को झुलसा रही है, कल यह आग वैश्विक घरों तक पहुँच सकती है। और तब शायद यह सवाल उठाने का अवसर ही न बचे — कि क्यों चुप थीं महाशक्तियाँ?
 
 
 

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