चुनावी मंथन : यूपी में आरक्षण  पर घमासान 

चुनावी मंथन : यूपी में आरक्षण  पर घमासान 

कल 25 मई को लोकसभा के छठे चरण के लिए मतदान होगा। कल के बाद अंतिम सातवां चरण मतदान के लिए रह जाएगा और सातवें चरण के बाद 4 जून को वोटों की गिनती शुरू होगी। सभी राजनैतिक दल अपने अपने तरीके से वायदे कर रहे हैं। इस बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का एक बयान आया है कि चुनाव बाद उत्तर प्रदेश में ओबीसी को मिलने वाले 27 फीसदी आरक्षण पर एक जांच बैठाई जाएगी। जिसमें यह जानने की कोशिश की जाएगी कि ओबीसी के इस 27 फीसदी आरक्षण में मुस्लिम समुदाय की जिन 24 जातियों को ओबीसी कोटे के तहत आरक्षण दिया जा रहा है वह किस प्रावधान के तहत दिया जा रहा है।
 
इतना कहकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने राजनैतिक माहौल को एक और मुद्दा दे दिया है। हालांकि विपक्षी दलों द्वारा अभी तक मुख्यमंत्री के इस बयान पर कोई टिप्पणी नहीं हुई है लेकिन बात अलग उठी है तो यह दूर तक जाएगी। दरअसल आरक्षण का मुद्दा एक बहुत बड़ा मुद्दा है। एक समय यह भी था कि इस आरक्षण के मुद्दे ने पूरे देश को झुलसा दिया था और हर पार्टी इस पर बहुत ही सोच समझकर बोलना चाहती है। अभी तक भारतीय जनता पार्टी के जो वक्तव्य थे वो यह दर्शाते थे कि वह जातिगत आरक्षण के विरोध में है। यह अपर कास्ट को लुभाने की भी एक प्रक्रिया हो सकती है। लेकिन जब समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने पीडीए का नया नारा दिया तो उत्तर प्रदेश की राजनीति का माहौल कुछ अलग ही हो गया। पिछड़ी जातियों का वोट देश में सर्वाधिक है और कोई भी राजनैतिक दल पिछड़ी जातियों के विरोध में नहीं जा सकता है।
 
भारतीय जनता पार्टी ने पूरी तरह से हिंदुत्व कार्ड खेल दिया है। और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसीलिए यह बात उठाई कि ओबीसी के आरक्षण में मुस्लिम को आरक्षण कैसे। आरक्षण को लेकर बहसबाजी काफी समय से चल रही है। जातिगत जनगणना की बात चल रही है। बिहार में जातिगत जनगणना हो चुकी है। वह बात अलग है कि बिहार में जातिगत जनगणना कराने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहले विपक्ष में थे लेकिन अब एनडीए का हिस्सा हैं। एनडीए के जितने भी घटक दल हैं उनमें भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर सभी जातिगत आधार पर जनगणना के पक्षधर हैं।
 
यहां तक की उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी जातिगत आधार पर जनगणना पर अपनी सहमति व्यक्त कर दी थी। समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में पिछड़ी जातियों और मुस्लिम समाज को लेकर आगे चल रही है। वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह कहकर पिछड़ी जातियों में डोरे डालने की कोशिश की है कि पिछड़ी जातियों को मिलने वाली 27 फीसदी आरक्षण में किस प्रावधान के तहत मुस्लिम जातियों को आरक्षण दिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार का यह दूसरा कार्यकाल चल रहा है। यदि मुख्यमंत्री चाहते तो इतने समय में यह जांच करा सकते थे। लेकिन चुनाव के बीच में उन्होंने यह मुद्दा उठाया है। तो कहीं न कहीं यह भारतीय जनता पार्टी की राजनीति का ही एक हिस्सा है।
 
यदि प्रशांत किशोर की बात को मानें तो भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश में 20 सीटों का नुक़सान हो रहा है। बीस सीटें कम नहीं हैं। यदि उत्तर प्रदेश में 20 सीटों का नुक़सान हो रहा है तो भारतीय जनता पार्टी के अबकी बार 400 पार के नारे का क्या होगा। क्यों कि उन्होंने इस बार उत्तर प्रदेश की सम्पूर्ण 80 सीटें जीतने का दावा किया था लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि यह दावा केवल दावा ही बनकर रहेगा जो हकीकत से दूर है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार तो बनती दिख रही है लेकिन इतने बड़े मार्जिन से नहीं। हालांकि इस तरह के दावे एक मनोवैज्ञानिक दबाव के लिए ही किये जाते हैं। वास्तविकता से इनका दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं होता है। चुनाव में हालातों को देखते हुए नेताओं की बयानबाजी बदलती रहती है। देश के सभी राजनैतिक विश्लेषक यह तो मान रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी यानी की एनडीए की सरकार तो बन सकती है लेकिन वह बहुमत के आस पास ही जाकर रुकेगी। ओबीसी इस चुनाव का बहुत बड़ा फैक्टर है। दलित वोट यदि बहुजन समाज पार्टी से छिटका तो वह भारतीय जनता पार्टी में ही जाएगा। लेकिन समाजवादी पार्टी ने भी अपने कई दलित नेताओं के दम पर इसको अपने पाले में लाने की कोशिश की है। आज बहुजन समाज पार्टी की वय स्थिति नहीं है जो एक समय हुआ करती थी। बसपा के अधिकांश बड़े चेहरे समाजवादी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में शिफ्ट हो चुके हैं। बहुजन समाज पार्टी का ग्राफ भी पहले की अपेक्षा काफी नीचे आया है। अब देखना यह है कि इसका छिटका हुआ वोट किस तरफ शिफ्ट होता है।
 
ओबीसी में अधिकांश जातियां हैं ओबीसी में भी जो अपर कास्ट की जातियां हैं वह भारतीय जनता पार्टी के सपोर्ट में हैं वकी की जातियां यादव सहित समाजवादी पार्टी को सपोर्ट करतीं हैं। इसके साथ जब मुस्लिम समीकरण बन जाता है तो वहां एक अच्छे चांस समाजवादी पार्टी के लिए बन जाते हैं। लेकिन बहुजन समाज पार्टी यदि सपा का वोट काटने में कामयाब होती है तो ऐसे में भारतीय जनता पार्टी को बढ़त मिल सकती है। पिछले विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का अब तक का सबसे लचर प्रदर्शन था जब उसका केवल एक विधायक जीतकर ही विधानसभा में पहुंच सका। लेकिन उसने समाजवादी पार्टी का काफी कुछ नुकसान किया और समाजवादी पार्टी केवल 110 सीटों पर सिमट कर रह गई। भारतीय जनता पार्टी को जो उछाल मिला है वह एक तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा सशक्त चेहरा और हिंदुत्व की लहर। हालांकि इस चुनाव में लहर जैसी कोई बात दिखाई नहीं दे रही है। चुनाव पूर्व अयोध्या में राममंदिर का उद्घाटन हुआ है। लेकिन हिंदुत्व का मामला इस बार कमजोर नजर आ रहा है। राम मंदिर का कितना फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिला है वह तो चार जून को ही पता चलेगा। लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने अपने सारे हिंदुत्व के कार्ड इस चुनाव में खेल दिये हैं। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व के एक बड़े चेहरे हैं लेकिन इससे भारतीय जनता पार्टी कितना लाभ हासिल कर सकी है यह मतगणना के दौरान ही पता चलेगा।
 
जितेन्द्र सिंह पत्रकार 

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