संजीव-नी| देख कर भी नही देख पाया ।

संजीव-नी| देख कर भी नही देख पाया ।

देख कर भी नही देख पाया ।

फिर उस बात का जिक्
लौटकर भुला नहीं पाया
उस पल की याद है उसे
जिया नहीं जिसे कभी,
भोगा भी नहीं,
जीने की जरूर कोशिश की
गहरे नहीं पैठ पाया,
फिर भूल गया उसे,
हर अनचाहे चिन्ह की तरह,
कुछ भी याद नहीं,
पुरानी बातें याद करने की
फिजूल कोशिश भी की,
कोशिश न करने की भी फिर कोशिश,
बीच में कसमसाया,
पर भूल नहीं पाया,
क्या वह चाहता नहीं
या इस इच्छा के पीछे
कई प्रश्न चिन्ह थे,
जो उसे जीने नहीं दे रहे थे
पर चाह कर भी नहीं जी पाया,
उसकी यह इच्छा भी अतीक्षा ही थी
उसकी अतीक्षा पर ही सब निर्भर था,
पर उसने देखा वहां कुछ नहीं था,
इसीलिए अगर वहां नहीं भी देखता
तो वहां कुछ नहीं होता,
कुछ होना और कुछ का ना होना,
सब उस पल पर निर्भर थे
जो वह जी नहीं पाया,
जो चाहते थे कुछ पल हों
जिसे कभी जिया नहीं गया या
जिनका कभी जिक्र ना किया हो,
उन पलों को फर्लांग के आगे बढ़ गया वह,
और वह सब कुछ देखकर भी
नहीं देख पाया था वह |

संजीव ठाकुर

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