ट्रंप और मोदी की विदेश यात्राओं के दूरगामी मायने
वास्तव में ये यात्राएँ आने वाले समय की वैश्विक राजनीति, व्यापार और आर्थिक संतुलन की नई दिशा तय कर सकती हैं।
दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की तीन दिवसीय चीन यात्रा और दुनिया की सर्वाधिक आबादी वाले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूएई तथा यूरोप के पाँच देशों की विदेश यात्राओं पर इस समय पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं। वैश्विक अस्थिरता, ऊर्जा संकट और बदलते आर्थिक समीकरणों के इस दौर में इन यात्राओं को केवल औपचारिक कूटनीतिक कार्यक्रम मानना भूल होगी। वास्तव में ये यात्राएँ आने वाले समय की वैश्विक राजनीति, व्यापार और आर्थिक संतुलन की नई दिशा तय कर सकती हैं।
ईरान युद्ध के बाद अमेरिका की वैश्विक साख को जो धक्का लगा है, उसके बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पिछले कई वर्षों से व्यापारिक वर्चस्व को लेकर अमेरिका और चीन के बीच चली आ रही तनातनी ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। ऐसे में यदि दोनों देशों के बीच किसी बड़े व्यापारिक समझौते की शुरुआत होती है, तो उसका असर वैश्विक बाजारों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर निश्चित रूप से दिखाई देगा। दुनिया की दो सबसे बड़ी आर्थिक और सामरिक शक्तियाँ यदि अपने संबंधों में नरमी लाती हैं, तो इससे वैश्विक आर्थिक स्थिरता को बल मिल सकता है।
दूसरी ओर, ईरान-अमेरिका संघर्ष के कारण पैदा हुए तेल और गैस संकट तथा उससे बढ़ती महंगाई के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यूएई और यूरोपीय देशों की यात्रा भारत सहित दुनिया के लिए नई उम्मीद बनकर उभरी है। भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार बन चुका है और यही कारण है कि सभी बड़े देश भारत के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंध मजबूत करना चाहते हैं। प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा ऊर्जा सुरक्षा, निवेश और वैकल्पिक संसाधनों की दिशा में महत्वपूर्ण परिणाम दे सकती है।
संभावना जताई जा रही है कि अमेरिका और चीन तेल तथा गैस व्यापार को लेकर नए समझौते कर वैश्विक ऊर्जा बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। वहीं प्रधानमंत्री मोदी ओमान से भारत तक संभावित तेल गैस पाइपलाइन, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों तथा यूरोपीय देशों के साथ तकनीकी और आर्थिक साझेदारी को लेकर ठोस पहल कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो भारत को ऊर्जा संकट से राहत मिलने के साथ-साथ वैश्विक बाजार में भी स्थिरता आएगी।
राजनीतिक दृष्टि से भले ही अमेरिका और चीन एक-दूसरे के विरोधी दिखाई देते हों, लेकिन व्यापारिक दृष्टि से दोनों देशों ने हमेशा अपने हितों को सर्वोपरि रखा है। विश्व राजनीति का यह कठोर सत्य है कि बड़ी शक्तियाँ अपने आर्थिक हितों की पूर्ति के लिए छोटे देशों का उपयोग करने से भी नहीं हिचकतीं। पाकिस्तान, श्रीलंका और नेपाल जैसे देशों की आर्थिक चुनौतियों तथा राजनीतिक अस्थिरता में बाहरी हस्तक्षेप की भूमिका समय-समय पर चर्चा का विषय रही है।
एशिया में लगातार हो रहे राजनीतिक बदलावों और सत्ता विरोधी आंदोलनों के बीच भारत अपेक्षाकृत स्थिर बना हुआ है। इसका सबसे बड़ा कारण केंद्र में मजबूत नेतृत्व, स्थिर शासन और आर्थिक सुधारों की निरंतरता है। वैश्विक अस्थिरता के इस दौर में, जहाँ कई बड़ी महाशक्तियाँ कमजोर पड़ती दिखाई दे रही हैं, वहीं भारत तेजी से आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्पष्टवादिता, निर्णायक नेतृत्व और वैश्विक मंचों पर सक्रिय भूमिका ने भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को नई मजबूती प्रदान की है। यही कारण है कि आज दुनिया जितनी उम्मीद अमेरिका और चीन से रखती है, उतनी ही अपेक्षाएँ भारत और उसके नेतृत्व से भी जुड़ने लगी हैं। इसलिए अमेरिका, चीन और भारत के शीर्ष नेताओं की ये विदेश यात्राएँ केवल राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक दिशा तय करने वाली महत्वपूर्ण घटनाएँ बन गई हैं।
अरविद रावल


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