जिनके हाथों में आतंक की चिंगारी, वही अब शांति की मशाल लिए नाच रहे हैं

इस बाजारवादी युग में मानवता और प्रकृति दोनों ही ‘कोलेटरल डैमेज’ बनकर रह गए हैं

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प्रो. (डा.) मनमोहन प्रकाश
 
पिछले कुछ वर्षों का वैश्विक परिदृश्य किसी जीवंत त्रासदी से कम नहीं रहा। दुनिया ने युद्धों को केवल इतिहास की पुस्तकों में नहीं, बल्कि ‘लाइव प्रसारण’ के रूप में देखा और उसके दंश को प्रत्यक्ष रूप से भोगा। विडंबना यह है कि जिन राष्ट्रों का इन संघर्षों से प्रत्यक्ष सरोकार नहीं था, वे भी महँगाई, ऊर्जा-संकट और पर्यावरणीय क्षति के रूप में इस वैश्विक ‘युद्ध-कर’ को चुकाने के लिए विवश हैं।
 
इन युद्धों के पीछे विस्तारवाद, वैश्विक वर्चस्व की होड़, परमाणु शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा और नाटो जैसे संगठनों में शामिल होने की प्रतिस्पर्धा स्पष्ट दिखाई देती है। कुछ विश्लेषक इन्हें ‘ग्लोबल वेपन एक्सपो’ तक कहने लगे हैं, जहाँ महाशक्तियाँ अपने हथियारों का प्रदर्शन करते हुए कमजोर देशों को ‘टेस्टिंग ग्राउंड’ में बदल रही हैं। इस बाजारवादी युग में मानवता और प्रकृति दोनों ही ‘कोलेटरल डैमेज’ बनकर रह गए हैं।
 
वर्तमान में ईरान, अमेरिका और इजराइल का त्रिकोण वैश्विक चिंता का केंद्र बना हुआ है। अमेरिका और इजराइल लंबे समय से ईरान पर हिज्बुल्लाह, हमास और हूती जैसे संगठनों को समर्थन देने का आरोप लगाते रहे हैं। यह भी कहा जाता है कि ईरान इन संगठनों के माध्यम से पश्चिम एशिया में अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है। यूरेनियम संवर्धन के सहारे क्षेत्रीय महाशक्ति बनने की उसकी आकांक्षा है।
 
हालिया सैन्य कार्रवाइयों में अमेरिका और इजराइल ने ईरान की सैन्य ताकत को बहुत ज्यादा क्षति पहुँचाई है, फिर भी ईरान  पीछे हटने को तैयार नहीं है,हार मानने के लिए राजी नहीं। अपितु ‘हॉर्मुज जलडमरूमध्य’ के माध्यम से वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर उसने अपनी सामरिक ताकत का प्रदर्शन किया है। इस नई व्यवस्था का प्रभाव अब लगभग पूरे विश्व पर दिखाई दे रहा है-आर्थिक दबाव, जन असंतोष और युद्ध-विरोधी स्वर तेजी से उभर रहे हैं। यही कारण है कि आक्रामक शक्तियाँ अब ‘सम्मानजनक शांति’ की राह तलाश रही हैं।
 
इस परिदृश्य का सबसे विडंबनापूर्ण पक्ष तब सामने आता है, जब आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई का दावा करने वाला अमेरिका, ईरान से संवाद के लिए पाकिस्तान को मध्यस्थ बनाता है। वही पाकिस्तान, जो लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों की पनाहगाह रहा है। ओसामा बिन लादेन को शरण देने वाले देश के माध्यम से शांति की पहल, अंतरराष्ट्रीय राजनीति के नैतिक द्वंद्व को उजागर करती है।
 
यह स्थिति कई प्रश्न खड़े करती है,क्या आतंकवाद की परिभाषा देश,काल,परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है? क्या वैश्विक शक्तियाँ अब सिद्धांतों के बजाय स्वार्थों से संचालित हो रही हैं? यदि आतंक की फैक्ट्री ही शांति का शोरूम खोलने लगे, तो यह मान लेना चाहिए कि आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष कहीं न कहीं केवल दिखावा बनकर रह गया है।
 
पाकिस्तान में आयोजित  शांति वार्ता का विश्लेषण बताता है कि अमेरिका ‘प्रतिबंधों की तलवार’ और ‘शांति के प्रस्ताव’ दोनों के साथ इस वार्ता में उपस्थित हुआ, जबकि ईरान ऐस तरह से शर्तें रखी, मानो वह पराजित नहीं, बल्कि निर्णायक स्थिति में हो। यह पूरी प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की जटिलता और अवसरवादिता को दर्शाती है। वहीं इजराइल ने इस प्रक्रिया से स्वयं को अलग रखते हुए संकेत दिया है कि बारूद की गंध के बीच शांति संभव नहीं। वहीं चीन और रूस जैसे महाशक्तियां इस पूरे घटनाक्रम में ऊपर से मौन दर्शक बने रहकर रणनीतिक लाभ लेने की स्थिति में हैं,अपना उल्लू सीधा करते हुए दिखाई देते हैं।
 
सही मायने में देखा जाए तो आज विश्व एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ ‘आतंकवाद’ की परिभाषा सुविधानुसार बदल दी जाती है। जब तक हिंसा पड़ोसी के घर तक सीमित रहती है, वह स्वतंत्रता के लिए ‘संघर्ष’ कहलाती है; लेकिन जब वही अपने घर तक पहुँचती है, तो ‘आतंकवाद’ बन जाती है। यही दोहरा मापदंड वैश्विक शांति और विश्व से आतंकवाद की समाप्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।
 
जिस पाकिस्तान को कल तक ‘आर्थिक रूप से जर्जर’ और आतंकवाद का आश्रयदाता कहकर विश्व समुदाय कठघरे में खड़ा करता था, आज वही शांति की मशाल थामे मध्यस्थ बनने का दावा कर रहा है। यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति का वह विचित्र रंगमंच है, जहाँ पात्र नहीं, भूमिकाएँ बदलती हैं और सत्य अक्सर पर्दे के पीछे छूट जाता है।जब कातिल ही न्यायाधीश की कुर्सी पर आसीन हो जाए, तो यह केवल विडंबना नहीं, बल्कि व्यवस्था की गहरी विकृति का संकेत है। यह वह दौर है जहाँ सिद्धांतों की नहीं, अवसरों की बोली लगती है; जहाँ नैतिकता नहीं, बल्कि रणनीतिक सुविधा ही निर्णयों का आधार बनती है।
ऐसे में प्रश्न केवल पाकिस्तान का नहीं, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था का है, जो समय-समय पर अपने ही घोषित मूल्यों से समझौता कर लेती है। शायद यही कूटनीति का सबसे कटु सत्य है।

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