एनटीपीसी परियोजना में सुरक्षा व्यवस्था ध्वस्त, डग्गामार वाहनों में भूसे की तरह ढोए जा रहे श्रमिक

करोड़ो का मुनाफा पर मजदूरों की दुर्दशा

राजेश तिवारी Picture
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संतोष कुमार गुप्ता

बीजपुर / सोनभद्र -

स्थानीय एनटीपीसी परियोजना में कार्यरत मजदूरों की सुरक्षा के साथ खुलेआम खिलवाड़ का मामला लगातार सामने आ रहा है। एक ओर जहां एनटीपीसी प्रबंधन और उससे जुड़ी दर्जनों कंपनियां मजदूरों के दम पर करोड़ों का मुनाफा कमा रही हैं, वहीं दूसरी ओर इन्हीं मजदूरों की जान को रोज दांव पर लगाकर उन्हें अमानवीय परिस्थितियों में काम करने को मजबूर किया जा रहा है।

परियोजना में कार्यरत मजदूरों की दुर्दशा का आलम यह है कि उन्हें प्रतिदिन मैजिक, पिकअप और अन्य डग्गामार वाहनों में भूसे की तरह ठूंस-ठूंसकर कार्यस्थल तक पहुंचाया जाता है। इन वाहनों में न तो सुरक्षा के कोई पुख्ता इंतजाम हैं और न ही अधिकांश के पास वैध कागजात। बावजूद इसके, ये वाहन बेखौफ होकर सड़कों पर दौड़ रहे हैं, जिससे साफ जाहिर होता है कि कहीं न कहीं जिम्मेदारों की मिलीभगत या लापरवाही इस पूरे खेल को संरक्षण दे रही है।

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सबसे चिंताजनक बात यह है कि इतनी बड़ी और प्रतिष्ठित परियोजना होने के बावजूद मजदूरों की सुरक्षा को लेकर एनटीपीसी प्रबंधन की संवेदनहीनता साफ नजर आ रही है। सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे करने वाला प्रबंधन इन जमीनी हकीकतों से या तो अनजान बना हुआ है या जानबूझकर आंखें मूंदे बैठा है। सवाल उठता है कि आखिर इन अवैध और असुरक्षित वाहनों के संचालन पर रोक क्यों नहीं लगाई जा रही?

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यदि इसी तरह लापरवाही का सिलसिला जारी रहा, तो किसी दिन बड़ा हादसा होना तय है। और जब ऐसा होगा, तो इसकी कीमत उन गरीब मजदूरों और उनके परिवारों को अपनी जिंदगी से चुकानी पड़ेगी, जो केवल दो वक्त की रोटी के लिए हर दिन मौत के साये में सफर करने को मजबूर हैं। ऐसे मामलों में पूर्व में भी यह देखा गया है कि हादसे के बाद जिम्मेदार संस्थाएं अपना पल्ला झाड़ लेती हैं और पीड़ित परिवारों को न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ता है।

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यह कहना गलत नहीं होगा कि इन मजदूरों की कोई गलती नहीं है। वे मजबूरी में अपने परिवार का पेट पालने के लिए हर जोखिम उठाने को तैयार हैं। लेकिन एनटीपीसी जैसे बड़े सार्वजनिक उपक्रम से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने अधीन कार्यरत मजदूरों की सुरक्षा के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाए।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या एनटीपीसी प्रबंधन इस गंभीर मुद्दे को लेकर जागेगा, या फिर किसी बड़े हादसे का इंतजार किया जाएगा? क्या जिम्मेदार अधिकारी बंद कमरों से बाहर निकलकर इन मजदूरों की जमीनी हकीकत को समझेंगे? फिलहाल, मजदूरों की जिंदगी भगवान भरोसे चल रही है और जिम्मेदार मौन साधे बैठे हैं।

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