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दायित्व बोध से ही श्रेष्ठ राष्ट्र का निर्माण
अधिकार और उत्तरदायित्व एक ही सिक्के के दो पहलु
प्रख्यात चिंतक वाल्टेयर ने कहा था जितने अधिक अधिकार, उतनी अधिक जिम्मेदारी। यह कथन आज के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है। स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब वह संयम और जिम्मेदारी से संचालित हो अन्यथा वह स्वच्छंदता बनकर अराजकता को जन्म देती है। मानव सभ्यता के विकास की समूची यात्रा यदि किसी सूक्ष्म सूत्र में पिरोई जा सकती है, तो वह है,अधिकार और उत्तरदायित्व का संतुलन।
यह संतुलन ही वह धुरी है, जिस पर व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की संरचना और आधारशिला टिकती है। प्रख्यात चिंतक वाल्टेयर का यह कथन जितने अधिक अधिकार, उतनी अधिक जिम्मेदारी,केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जीवन का शाश्वत सिद्धांत है। आज जब आधुनिकता के प्रवाह में मनुष्य अधिकारों की नई-नई परिभाषाएँ गढ़ रहा है, तब यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या हम अपने उत्तरदायित्वों के प्रति उतने ही सजग हैं जितने अपने अधिकारों के प्रति?
स्वतंत्रता का अर्थ केवल बंधनों से मुक्ति नहीं है, बल्कि वह एक अनुशासित चेतना का नाम है। जब स्वतंत्रता संयम और उत्तरदायित्व से संचालित होती है, तभी वह समाज में समरसता और प्रगति का मार्ग प्रशस्त करती है; अन्यथा वही स्वतंत्रता स्वच्छंदता बनकर अराजकता को जन्म देती है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने भी स्पष्ट कहा था कि कर्तव्यों के हिमालय से अधिकारों की गंगा बहती है, यह कथन इस मूल को इंगित करता है कि अधिकारों की प्राप्ति का मूल स्रोत हमारे कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन ही है।
भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला भारतीय संविधान में निहित है, जिसने नागरिकों को व्यापक मूल अधिकार प्रदान किए। यह व्यवस्था उन ऐतिहासिक विषमताओं को दूर करने के लिए थी, जिनसे समाज का एक बड़ा वर्ग पीड़ित रहा था। परंतु इसी संविधान ने मौलिक कर्तव्यों का भी उल्लेख किया, ताकि अधिकारों का उपयोग संतुलित, मर्यादित और राष्ट्रहितकारी बना रहे। यह द्वंद्व नहीं, बल्कि द्वैत में एकता का अद्भुत उदाहरण है।
हाल के वर्षों में माननीय सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया द्वारा निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देना नागरिक स्वतंत्रता की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर सिद्ध हुआ। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि इस अधिकार के साथ यह दायित्व भी जुड़ता है कि हम अपनी स्वतंत्रता का उपयोग इस प्रकार करें कि वह दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण न करे। अधिकारों की सीमा वहीं समाप्त हो जाती है, जहाँ दूसरे के अधिकारों का क्षेत्र आरंभ होता है।
आधुनिक युग में जागरूकता का विस्तार हुआ है, किंतु नैतिक अनुशासन और कर्तव्य-बोध अपेक्षित गति से विकसित नहीं हो पाए हैं। परिणामस्वरूप समाज में एक विचित्र असंतुलन दिखाई देता है।अधिकारों की माँग प्रबल है, किंतु उत्तरदायित्व के निर्वहन में शिथिलता स्पष्ट है। यही असंतुलन लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करता है। संविधान के निर्माता डॉक्टर बी आर अंबेडकर जी ने चेताया था कि संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे चलाने वाले लोग अच्छे नहीं होंगे, तो वह भी असफल हो जाएगा। यह कथन इस बात की पुष्टि करता है कि किसी भी व्यवस्था की सफलता उसके नागरिकों के चरित्र और जिम्मेदारी पर निर्भर करती है।
लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को इस विश्वास के साथ चुनती है कि वे लोककल्याण की भावना से शासन करेंगे। किंतु जब जनप्रतिनिधि अधिकारों के मद में अपने उत्तरदायित्वों को विस्मृत कर देते हैं, तब शासन व्यवस्था में भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और निरंकुशता का प्रवेश हो जाता है। इस संदर्भ में अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का यह कथन स्मरणीय है जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन तभी संभव है, जब जनता स्वयं अपने कर्तव्यों के प्रति सजग हो।
प्राचीन भारतीय चिंतन में भी अधिकार और कर्तव्य के इस संतुलन को अत्यंत महत्व दिया गया है। ऐतिहासिक चिंतक कौटिल्य ने अपने ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में स्पष्ट कहा है कि जिस राज्य की प्रजा कष्ट में हो, वहाँ शासक का वैभव नैतिक रूप से अनुचित है। यह विचार शासन और समाज के बीच उत्तरदायित्व की गहरी कड़ी को उजागर करता है।सार्वजनिक जीवन में भी यह सिद्धांत समान रूप से लागू होता है। स्वच्छ सड़कें, शुद्ध जल, सुरक्षित वातावरणये सभी हमारे अधिकार हैं, किंतु इन्हें बनाए रखना हमारा दायित्व भी है। पर्यावरण संकट इसका ज्वलंत उदाहरण है।
दलाई लामा जी ने कहा है कि यह पृथ्वी हमें हमारे पूर्वजों से विरासत में नहीं मिली, बल्कि हमने इसे अपने बच्चों से उधार लिया है। यदि हम इस उधार को संजोकर नहीं रखेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी। आज मूल जरूरत इस बात की है कि हम अधिकार और उत्तरदायित्व के बीच कृत्रिम विभाजन को समाप्त करें और उन्हें एक समग्र दृष्टि से देखें। ये दोनों विरोधी नहीं, बल्कि सहयात्री हैं,एक के बिना दूसरा अधूरा है। जब व्यक्ति अपने अधिकारों के प्रति जितना सजग होता है, उतना ही अपने कर्तव्यों के प्रति भी हो जाता है, तभी समाज में संतुलन और समरसता स्थापित होती है।
राष्ट्रनिर्माण केवल सरकारों या नीतियों का परिणाम नहीं होता, बल्कि यह प्रत्येक नागरिक के छोटे-छोटे प्रयासों से निर्मित होता है। एक ईमानदार करदाता, एक सजग मतदाता, एक जिम्मेदार नागरिक,ये सभी राष्ट्र की नींव को मजबूत करते हैं। स्वामी विवेकानंद जी का यह आह्वान आज भी उतना ही प्रासंगिक है उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए। यह लक्ष्य केवल व्यक्तिगत सफलता का नहीं, बल्कि एक सशक्त, समृद्ध और नैतिक राष्ट्र के निर्माण का है।
अतः यह स्पष्ट है कि अधिकार और उत्तरदायित्व एक ही सिक्के के दो पहलू हैं,अविभाज्य, अपरिहार्य और परस्पर पूरक। यदि हम केवल अधिकारों की माँग करेंगे और कर्तव्यों की उपेक्षा करेंगे, तो लोकतंत्र का स्वरूप विकृत हो जाएगा। किंतु यदि हम इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित कर पाए, तो न केवल लोकतंत्र सुदृढ़ होगा, बल्कि राष्ट्र भी उन्नति के शिखर पर पहुँचेगा।
समय की पुकार यही है कि हम अपने भीतर उत्तरदायित्व की उस ज्योति को प्रज्वलित करें, जो अधिकारों को प्रकाशमान करती है। यही सच्चा राष्ट्र-चिंतन है, यही लोकतंत्र की आत्मा है और यही भविष्य का पथ भी।
संजीव ठाकुर


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