क्या वाकई इंटरनेट को युद्ध से खतरा है ?
यह खतरा किसी काल्पनिक साइबर फिल्म से कहीं अधिक वास्तविक और भयावह है।
महेन्द्र तिवारी
आज के डिजिटल युग में जब हम अपने स्मार्टफोन की स्क्रीन पर एक स्पर्श करते हैं और दुनिया के किसी भी कोने की जानकारी क्षण भर में हमारे सामने आ जाती है, तो हमारे मन में यह धारणा प्रबल होने लगती है कि इंटरनेट एक अदृश्य और वायरलेस शक्ति है जो हवा या बादलों के माध्यम से तैर रही है। 'क्लाउड' शब्द के बढ़ते प्रयोग ने इस भ्रम को और गहरा कर दिया है, जिससे हमें लगता है कि हमारा डेटा कहीं अंतरिक्ष में सुरक्षित तरीके से तैर रहा है। लेकिन जब भू-राजनीतिक तनाव बढ़ते हैं और युद्ध की बातें सामने आती हैं, तो एक सवाल बार-बार उठता है कि क्या वाकई इस अदृश्य और व्यापक नेटवर्क को युद्ध से खतरा है? इसका सीधा और स्पष्ट उत्तर है- हाँ, इंटरनेट को युद्ध से सबसे अधिक और संगीन खतरा है, और यह खतरा किसी काल्पनिक साइबर फिल्म से कहीं अधिक वास्तविक और भयावह है।
वास्तविकता इस आभासी धारणा के बिल्कुल विपरीत और आश्चर्यजनक रूप से भौतिक है। हमारी संपूर्ण वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था, संचार तंत्र और यहां तक कि हमारी सामाजिक और सैन्य सुरक्षा भी समुद्र की अगाध गहराइयों में बिछे उन फाइबर ऑप्टिक केबल्स के एक जटिल जाल पर टिकी है, जिन्हें 'अंडर-सी केबल्स' कहा जाता है। दुनिया भर में फैले लगभग पांच सौ से अधिक ऐसे केबल्स का नेटवर्क ही वह अदृश्य जीवन रेखा है जो महाद्वीपों को एक दूसरे से जोड़ती है और वैश्विक इंटरनेट डेटा ट्रैफिक के नब्बे प्रतिशत से अधिक हिस्से का वहन करती है। आम धारणा के विपरीत, उपग्रह वैश्विक डेटा का केवल एक से तीन प्रतिशत हिस्सा ही संभाल पाते हैं, क्योंकि वे धीमी गति और अधिक लेटेंसी के साथ काम करते हैं। फाइबर ऑप्टिक केबल्स प्रकाश की गति से डेटा स्थानांतरित करती हैं, जो उन्हें आधुनिक सभ्यता के लिए अपरिहार्य बनाती हैं। लेकिन यही तकनीकी उपलब्धि आज एक बहुत बड़ी रणनीतिक चुनौती और कमजोरी बनकर उभरी है।
इन केबल्स की महत्ता और उनके द्वारा नियंत्रित होने वाले डेटा की मात्रा का विश्लेषण करें, तो हम पाएंगे कि आधुनिक सभ्यता का कोई भी कोना इनसे अछूता नहीं है। बैंकों के लेन-देन से लेकर शेयर बाजार की हलचल तक, और रक्षा प्रणालियों के गुप्त संचार से लेकर आम नागरिकों के वीडियो कॉल तक, सब कुछ इन्हीं गहरे समुद्री मार्गों से होकर गुजरता है। एशिया, यूरोप और अमेरिका जैसे बड़े महाद्वीपों के बीच होने वाला व्यापार और कूटनीतिक विनिमय पूरी तरह से इन केबल्स की अखंडता पर निर्भर है। जब कोई युद्ध छिड़ता है, तो सबसे पहले शत्रु देश की अर्थव्यवस्था और संचार तंत्र को चकनाचूर करने की कोशिश की जाती है। इसी निर्भरता ने एक ऐसा 'एकल बिंदु विफलता' उत्पन्न कर दिया है, जिसे नष्ट करना किसी भी शत्रु देश के लिए पूरी दुनिया को घुटनों पर लाने का सबसे आसान और सस्ता तरीका हो सकता है।
वर्तमान में जिस तरह से वैश्विक तनाव बढ़ रहा है, उसने इन केबल्स की सुरक्षा पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि समुद्र के तल पर भी लड़े जाएंगे। इन केबल्स को नुकसान पहुंचाना आज किसी भी आधुनिक सेना के लिए 'हाइब्रिड वॉरफेयर' का एक प्रमुख हिस्सा बन चुका है। कल्पना कीजिए कि यदि किसी संघर्ष के दौरान इन केबल्स को सुनियोजित तरीके से समुद्री बम या माइन ब्लास्ट के जरिए उड़ा दिया जाए या विशेष पनडुब्बियों के माध्यम से काट दिया जाए, तो परिणाम कितने विनाशकारी होंगे। इंटरनेट के बंद होने का मतलब केवल सोशल मीडिया का रुकना नहीं है, बल्कि इसका सीधा अर्थ है कि वैश्विक बैंकिंग प्रणाली ठप हो जाएगी, जिससे खरबों डॉलर का नुकसान मिनटों में हो सकता है। एटीएम काम करना बंद कर देंगे, क्रेडिट कार्ड ट्रांजैक्शन रुक जाएंगे और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए किए जाने वाले संचार के सभी माध्यम मृत हो जाएंगे। इससे भी भयावह यह है कि किसी देश की सैन्य और सुरक्षा एजेंसियां, जो गुप्त सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए इन सुरक्षित नेटवर्कों का उपयोग करती हैं, वे एक पल में अंधी और बहरी हो सकती हैं। यह स्थिति न केवल आर्थिक अराजकता पैदा करेगी, बल्कि किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता को गंभीर खतरे में डाल देगी।
इस खतरे की गंभीरता को समझने के लिए हमें इतिहास और हालिया घटनाओं की ओर देखना होगा। वर्ष 2024 में लाल सागर में हुई घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था। वहां समुद्र के नीचे बिछी चार प्रमुख केबल्स को नुकसान पहुंचा, जिसका सीधा असर वैश्विक इंटरनेट कनेक्टिविटी और स्पीड पर पड़ा। उस समय इंटरनेट सेवाओं को पूरी तरह सामान्य करने में लगभग अस्सी दिन का समय लगा। यह घटना इस बात का जीवंत प्रमाण है कि समुद्र के नीचे स्थित ये ढांचे कितने असुरक्षित हैं। भले ही ये केबल्स स्टील की परतों और प्लास्टिक के आवरण से सुरक्षित की जाती हैं, लेकिन समुद्र की विशालता और वहां तक पहुंचने की मानवीय सीमाओं के कारण इनकी निगरानी करना लगभग असंभव है। केवल मानवीय हमले ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक आपदाएं जैसे समुद्री भूकंप, सुनामी या जहाज के लंगर के टकराने से भी ये केबल्स अक्सर क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। लेकिन जब कोई क्षति युद्ध के दौरान जानबूझकर, किसी रणनीतिक लाभ के लिए पहुंचाई जाती है, तो वह पूरे विश्व के लिए एक सुरक्षा संकट बन जाती है।
अंडर-सी केबल्स की मरम्मत करना अपने आप में एक अत्यंत कठिन, खर्चीला और समय लेने वाला कार्य है। ये केबल्स समुद्र के तल में हजारों मीटर की गहराई पर स्थित होती हैं, जहां दबाव इतना अधिक होता है कि कोई भी सामान्य गोताखोर वहां तक नहीं पहुंच सकता। जब कोई केबल खराब होती है, तो उसे ठीक करने के लिए विशेष केबल-रिपेयर जहाजों की आवश्यकता होती है, जिनकी संख्या दुनिया भर में बहुत सीमित है। इन जहाजों को पहले खराबी के सटीक स्थान का पता लगाना होता है, जो कि मीलों लंबी केबल में सुई खोजने जैसा कठिन कार्य है। एक बार स्थान मिल जाने के बाद, रोबोटिक उपकरणों या विशेष हुक के जरिए केबल को समुद्र की सतह पर लाया जाता है। वहां तकनीशियन फाइबर के उन सूक्ष्म रेशों को जोड़ते हैं, जो बाल से भी पतले होते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में हफ्तों या कभी-कभी महीनों लग जाते हैं। यदि यह क्षेत्र किसी युद्धग्रस्त समुद्री सीमा में आता है, तो मरम्मत का कार्य लगभग नामुमकिन हो जाता है। यही कारण है कि यदि किसी बड़े पैमाने पर ऐसा हमला किसी युद्ध के दौरान हो, तो दुनिया का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय के लिए डिजिटल अंधेरे में चला जाएगा।
इस भौतिक नुकसान के साथ-साथ, युद्ध का एक और बहुत खतरनाक पहलू है जो सीधे इंटरनेट को निशाना बनाता है, जिसे हम 'साइबर वॉरफेयर' कहते हैं। आधुनिक युद्धों में साइबर हमले पारंपरिक हथियारों के साथ-साथ उतनी ही ताकत से इस्तेमाल होते हैं। इसमें डीडॉस (DDoS) अटैक, मैलवेयर, रैंसमवेयर और डेटा चोरी के जरिए इंटरनेट, नेटवर्क और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर को अंदर से तबाह किया जाता है। हाल के वर्षों में रूस-यूक्रेन युद्ध में हजारों साइबर हमले हुए, जिसमें मैलवेयर का इस्तेमाल करके बिजली ग्रिड, बैंकिंग प्रणाली और संचार नेटवर्क को ध्वस्त करने की कोशिश की गई। इसी तरह, मध्य पूर्व और एशिया में हालिया भू-राजनीतिक तनावों के दौरान लाखों साइबर अटैक दर्ज किए गए, जिनका लक्ष्य रेलवे, बैंकिंग और सरकारी साइट्स को ठप करना था। जब किसी देश का इंटरनेट कनेक्टिविटी चार प्रतिशत तक गिर जाता है, तो उसका असर आम नागरिकों से लेकर सेना तक पर पड़ता है। यह एक ऐसा हथियार है जिसे चलाने के लिए किसी सीमा पर सैनिकों को तैनात करने की जरूरत नहीं होती; एक कुशल हैकर कमरे में बैठकर भी किसी देश की अर्थव्यवस्था को पैरालाइज कर सकता है।
आजकल 'डेटा संप्रभुता' और 'डिजिटल राष्ट्रवाद' की बातें खूब होती हैं, लेकिन जब तक हमारे डेटा का भौतिक और आभासी मार्ग असुरक्षित है, ये बातें अधूरी ही रहेंगी। दुनिया के अधिकांश अंडर-सी केबल्स का स्वामित्व कुछ बड़ी टेक कंपनियों या फिर अंतरराष्ट्रीय टेलीकॉम कंसोर्टियम के पास है। यह निजी स्वामित्व सुरक्षा की एक और परत को जटिल बना देता है, क्योंकि इन निजी कंपनियों के पास किसी राष्ट्र-राज्य द्वारा समर्थित सैन्य हमले से इन केबल्स की रक्षा करने की क्षमता नहीं है। वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति ऐसी है कि बड़ी शक्तियां अपनी समुद्री क्षमताओं को बढ़ा रही हैं ताकि वे समुद्र के नीचे की गतिविधियों पर नजर रख सकें। ऐसी पनडुब्बियों का विकास किया जा रहा है जो केबल्स से डेटा को चोरी-छिपे टैप कर सकें या उन्हें नुकसान पहुंचा सकें। वैश्विक तनाव बढ़ने के साथ-साथ यह डर भी सच हो रहा है कि कोई भी बड़ी शक्ति इन केबल्स को ब्लैकमेल के हथियार के रूप में उपयोग कर सकती है। यदि कोई देश यह धमकी देता है कि वह किसी विशेष क्षेत्र की इंटरनेट केबल्स को काट देगा, तो वह बिना एक भी गोली चलाए उस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को तबाह कर सकता है।
इस खतरे से निपटने के लिए दुनिया भर में वैकल्पिक रास्तों पर विचार किया जा रहा है। सैटेलाइट इंटरनेट, जैसे कि स्टारलिंक या अन्य प्रोजेक्ट, एक उम्मीद की किरण के रूप में देखे जा रहे हैं। ये उपग्रह सीधे अंतरिक्ष से डेटा प्रदान करते हैं, जिससे समुद्री केबल्स की आवश्यकता कम हो सकती है। लेकिन फिलहाल, इनकी क्षमता और लागत फाइबर केबल्स के मुकाबले बहुत कम और महंगी है। उपग्रह इंटरनेट अभी नब्बे प्रतिशत वैश्विक ट्रैफिक का बोझ उठाने के लिए तैयार नहीं है। इसके अलावा, अंतरिक्ष में मौजूद इन उपग्रहों को भी नष्ट किया जा सकता है, जो सुरक्षा की एक नई चुनौती पेश करता है। इसलिए, वर्तमान में समुद्र के नीचे बिछा यह जाल ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति और सबसे बड़ी कमजोरी बना हुआ है।
निष्कर्षतः, समुद्र के नीचे बिछी ये फाइबर ऑप्टिक केबल्स और उन पर आधारित डिजिटल नेटवर्क आधुनिक विश्व की वह अदृश्य रीढ़ हैं, जिस पर पूरी मानवता की प्रगति टिकी है। युद्ध इंटरनेट के लिए सबसे बड़ा खतरा इसलिए है क्योंकि यह न केवल इसके भौतिक आधार को नष्ट कर सकता है, बल्कि साइबर हमलों के माध्यम से इसके आभासी अस्तित्व को भी ध्वस्त कर सकता है। इनकी सुरक्षा केवल एक तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक कूटनीतिक और सामरिक अनिवार्यता है। यदि हम अपने डिजिटल भविष्य को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसी संधियों और सुरक्षा प्रोटोकॉल की आवश्यकता है जो इन केबल्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को युद्ध के लक्ष्यों से बाहर रख सकें। भविष्य में किसी भी देश की वास्तविक ताकत इस बात से नहीं मापी जाएगी कि उसके पास कितनी परमाणु मिसाइलें हैं, बल्कि इस बात से मापी जाएगी कि वह अपने डेटा के भौतिक और आभासी मार्गों की रक्षा करने में कितना सक्षम है। जब तक हम समुद्र की गहराई और साइबर स्पेस में छिपे इस खतरे को नहीं समझेंगे, तब तक हमारा 'वायरलेस' होने का सपना एक ऐसे कमजोर धागे से बंधा रहेगा जो किसी भी युद्ध की एक चिंगारी से जलकर राख हो सकता है और आधुनिक सभ्यता को सदियों पीछे धकेल सकता है। इसलिए, यह समय है कि हम बादलों की ओर देखना बंद करें और समुद्र के तल की ओर ध्यान दें, जहां हमारी वास्तविक और सबसे असुरक्षित दुनिया बिछी हुई है।


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