राजनीति
सोनभद्र की बड़ी खबर IGRS शिकायत के बाद भी नहीं मिला न्याय
करोड़ों के खेल का आरोप हिस्सेदारी हड़पी, वेतन रोका, पुलिस पर लीपापोती के आरोप
स्वतंत्र प्रभात संवाददाता
सोनभद्र/ उत्तर प्रदेश -
जनपद के ओबरा थाना क्षेत्र से एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहां एक पीड़ित ने अपने ही सहयोगियों पर गंभीर धोखाधड़ी, आर्थिक शोषण और उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं। मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है, क्योंकि शिकायत के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।

Read More जनपद में मिशन शक्ति 5.0 के दूसरे चरण के अंतर्गत महिला सुरक्षा, सम्मान एवं सशक्तिकरण की ओर सशक्त पहलपीड़ित दिनेश यादव, निवासी सेक्टर-9, ओबरा, ने पुलिस अधीक्षक को दिए गए शिकायती पत्र में बताया कि वह वर्ष 2008 से फ्लाई ऐश पैकेजिंग मशीनों में कार्यरत हैं। इस दौरान उन्होंने न केवल पूरी जिम्मेदारी से काम किया, बल्कि अपनी निजी पूंजी भी इस कार्य में निवेश की।
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हिस्सेदारी के बावजूद हक से वंचित
पीड़ित के अनुसार, वर्ष 2008 में उन्हें 25% हिस्सेदारी और वर्ष 2009 में दूसरी मशीन में 20% हिस्सेदारी दी गई थी। लेकिन वर्ष 2018 और 2022 में दोनों मशीनों को बिना सूचना और सहमति के बेच दिया गया। आरोप है कि न तो बिक्री का हिस्सा दिया गया और न ही उनकी मेहनत की कमाई यानी वेतन का भुगतान किया गया।
IGRS और समाधान दिवस भी बेअसर
पीड़ित ने इस मामले की शिकायत IGRS पोर्टल (शिकायत संख्या 20020026000382) और संपूर्ण समाधान दिवस में भी दर्ज कराई। इसके अलावा थाना ओबरा में भी लिखित प्रार्थना पत्र दिया गया। लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिकता निभाई गई और मामले को “आपसी विवाद” बताकर टाल दिया गया।
मानसिक उत्पीड़न और दबाव का आरोप
जब पीड़ित ने अपने हक की मांग की, तो उनके साथ अभद्र व्यवहार किया गया और उन्हें मानसिक व सामाजिक रूप से प्रताड़ित किया गया। पीड़ित का कहना है कि वह लगातार न्याय के लिए भटक रहे हैं, लेकिन प्रभावशाली लोगों के कारण उन्हें न्याय नहीं मिल पा रहा है।
प्रशासन की निष्क्रियता पर उठे सवाल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल प्रशासन की भूमिका को लेकर उठ रहा है। बार-बार शिकायत के बावजूद अगर कार्रवाई नहीं होती, तो आम जनता का भरोसा व्यवस्था से उठना स्वाभाविक है।
निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग
पीड़ित ने पुलिस अधीक्षक से मांग की है कि मामले की निष्पक्ष और गहन जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए, ताकि उन्हें उनका हक मिल सके।
बड़ा सवाल
क्या प्रभावशाली लोगों के आगे सिस्टम बेबस है?क्या पीड़ित को मिलेगा न्याय या यूं ही फाइलों में दब जाएगा मामला?यह मामला अब केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और न्याय व्यवस्था की परीक्षा बन चुका है।


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