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बरेली क्षेत्र में तितलियों की घटती प्रजातियाँ: जैव विविधता संरक्षण की आवश्यकता चंचल श्रीवास्तव
जिनकी विश्वभर में लगभग 1.8 लाख प्रजातियां पाई जाती हैं
बरेली/डॉ. चंचल श्रीवास्तव सहा. प्रवक्ता, जंतु विज्ञान विभाग के द्वारा शोध पत्र के अनुसार, प्रकृति की सुंदरता का प्रतीक मानी जाने वाली तितलियाँ अपनी रंग-बिरंगी पंखों और आकर्षक बनावट के कारण फूलों की रानी कहलाती हैं। वैज्ञानिक वर्गीकरण में तितलियां लेपिडोप्टेरा क्रम से संबंधित होती हैं, जिनकी विश्वभर में लगभग 1.8 लाख प्रजातियां पाई जाती हैं। इनकी पहचान उनके पंखों पर मौजूद सूक्ष्म स्केल्स और विशेष पैटर्न से होती है।
वैज्ञानिक ,वैदिक और प्राचीन मान्यताओं में तितलियों को ईश्वर का संदेशवाहक माना गया है, जो आशा और सकारात्मकता का प्रतीक हैं। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि तितलियां अत्यंत संवेदनशील जीव होती हैं और उनका अस्तित्व पेड़-पौधों तथा फूलों पर निर्भर करता है। इनके पंखों में मौजूद रसायन फेरोमोन के रूप में कार्य करते हैं, जो संचार और प्रजनन में सहायक होते हैं।
जीवन चक्र और अनुकूल मौसम विशेषताएं तितलियों के लिए अनुकूल समय सितंबर-अक्टूबर तथा वसंत ऋतु फरवरी-मार्च माना जाता है। इस समय वातावरण अपेक्षाकृत गर्म होता है और फल-फूल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहते हैं, जिससे तितलियां अपने जैविक चक्र को आसानी से पूरा कर पाती हैं।अंडा , लार्वा , प्यूपा और वयस्क इनके पंखों के रंग और पैटर्न न केवल आकर्षण का केंद्र होते हैं बल्कि पर्यावरणीय संतुलन और परागण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सामान्यत, तितलियों का जीवनकाल चार सप्ताह से लेकर लगभग नौ माह तक माना जाता है।
उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों, विशेषकर बरेली जिले में लगभग 20 प्रजातियां दर्ज हैं। इनमें से 13–15 प्रजातियां सामान्य रूप से देखने को मिलती हैं, जबकि 2-3 प्रजातियां विशेष रूप से बागानों, फल-फूलों और फसल चक्र वाले क्षेत्रों में दिखाई देती हैं।
हालांकि कुछ प्रजातियां जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय बदलावों के कारण धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं।भारत में तितलियों की स्थिति लगभग 1500 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से लगभग 35 प्रजातियां गंभीर रूप से संकटग्रस्त और 43 प्रजातियां संकटग्रस्त श्रेणी में आती हैं।
35 गंम्भीर संकटग्रस्त प्रजाति यों में से दो प्रजातियां बरेली की न्यूनतम चिंता ग्रस्त कैसर-ए-हिंद-Teinopalpus imperialis, भूटान गौरव:(Bhutanitis ludlowi) श्रेणी के अंतर्गत रखी गई है।जो?बरेली की एक अपनी पहचान और विस्तार को नष्ट कर सकती है।
वन्यजीव संरक्षण के अंतर्गत वन्यजीव संरक्षण अधिनियम1972 के तहत कई तितली प्रजातियों को संरक्षण प्रदान किया गया है। इस अधिनियम की विभिन्न अनुसूचियों में अनेक प्रजातियों को शामिल किया गया है।स्थानीय संरक्षण गतिविधियां बरेली के इज्जतनगर क्षेत्र में स्थित आईबीआरआई परिसर में तितलियों की कई प्रजातियां, जो यहां की जैव विविधता और संरक्षण प्रयासों को दर्शाती हैं।विशेषज्ञों के अनुसार तितलियों की घटती संख्या के पीछे कई कारण हैं,पेड़-पौधों और फूलों की प्रजातियों में कमी फसल चक्र में लगातार परिवर्तन जलवायु परिवर्तन, बढ़ता प्रदूषण शहरीकरण, मानव हस्तक्षेप और आवासीय क्षेत्रों का विस्तार पर्यावरण के प्रति जागरूकता का अभावनई पीढ़ी में जागरूकता की कमी आज के समय में बच्चों और युवाओं में तितलियों के प्रति आकर्षण कम होता जा रहा है।
मोबाइल फोन, इंटरनेट और आधुनिक तकनीक के अत्यधिक उपयोग के कारण प्राकृतिक जीवों के प्रति उनकी पहचान और रुचि घटती जा रही है।संरक्षण की आवश्यकता डॉ. चंचल श्रीवास्तव सहा. प्रवक्ता, जंतु विज्ञान विभाग के द्वारा शोध पत्र, में यह पाया गया है , यदि समय रहते तितलियों के संरक्षण के लिए कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में कई प्रजातियां विलुप्त हो सकती हैं। पर्यावरण, फसल चक्र, जैविक चक्र, फूड चेन, जीव जंतुओं की खाद्य श्रृंखला के साथ-साथ पोलिनेशन और फसल चक्र के क्रम प्रभावित होंगे। जो बायोलॉजिकल और इकोसिस्टम के साथ-साथ बायोडायवर्सिटी के लिए नुकसानदायक है
इसके लिए आवश्यक है जन- जागरूकता और जीव संरक्षण के तहत इनके रखरखाव और उनकी संरक्षण के लिए आगे आकर गवर्नमेंट के तकनीकी आयाम के साथ समाजसेवी संस्थाओं को युवा शक्ति के साथ जोड़कर उनके बचाव की पहल करना आवश्यक है शैक्षिक कार्यक्रमों, शोध, गीत-कविताओं, पर्यावरण अभियानों और जन-जागरूकता के माध्यम से लोगों को प्रकृति संरक्षण के लिए प्रेरित किया जाए।
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