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तेरह साल का इंतज़ार और एक कठिन विदाई
यह चिकित्सा, कानून, नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं के जटिल प्रश्नों को सामने लाने वाली घटना है
महेन्द्र तिवारी
मानव जीवन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह है कि कभी-कभी जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा बहुत धुंधली हो जाती है। सामान्यतः हम जीवन को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं, क्योंकि जीवन को ईश्वर का सबसे बड़ा उपहार माना जाता है। लेकिन कुछ परिस्थितियाँ ऐसी भी होती हैं जब जीवन केवल सांसों का चलना भर रह जाता है और उसमें चेतना, संवाद और मानवीय गरिमा लगभग समाप्त हो जाती है। हाल के दिनों में चर्चा में आए हरीश राणा का मामला इसी विडंबना का एक अत्यंत मार्मिक उदाहरण बनकर सामने आया है। यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह चिकित्सा, कानून, नैतिकता और मानवीय संवेदनाओं के जटिल प्रश्नों को सामने लाने वाली घटना है।
हरीश राणा उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले एक युवा थे। वर्ष 2013 में एक दुर्घटना ने उनका जीवन पूरी तरह बदल दिया। बताया जाता है कि वह पढ़ाई के दौरान एक इमारत की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिसके कारण उनके सिर में गंभीर चोट आई और वह स्थायी कोमा जैसी अवस्था में चले गए। इस स्थिति को चिकित्सा भाषा में “पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट” कहा जाता है, जिसमें व्यक्ति जीवित तो रहता है, लेकिन उसके मस्तिष्क की चेतन क्रियाएँ लगभग समाप्त हो जाती हैं। वह न बोल सकता है, न चल सकता है, न अपने आसपास की दुनिया को समझ सकता है। हरीश पिछले तेरह वर्षों तक इसी अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूलते रहे।
इन वर्षों में उनका जीवन केवल चिकित्सा उपकरणों, दवाइयों और कृत्रिम पोषण के सहारे चल रहा था। परिवार ने उनकी देखभाल में कोई कमी नहीं छोड़ी। माता-पिता ने अपने बेटे को जीवित रखने के लिए हर संभव प्रयास किया। कई अस्पतालों में इलाज कराया गया, विशेषज्ञ डॉक्टरों से सलाह ली गई, लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं आया। समय बीतने के साथ-साथ यह स्पष्ट होता गया कि अब उनके ठीक होने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी है। डॉक्टरों ने भी यही राय दी कि मस्तिष्क को हुई गंभीर क्षति के कारण उनका सामान्य जीवन में लौटना लगभग असंभव है।
किसी भी माता-पिता के लिए यह स्थिति अत्यंत पीड़ादायक होती है। एक ओर उनके सामने अपने बच्चे को खो देने का भय होता है, तो दूसरी ओर उसे इस तरह निर्जीव अवस्था में वर्षों तक देखना भी कम कष्टदायक नहीं होता। हरीश राणा के परिवार ने लगभग तेरह वर्षों तक इस पीड़ा को सहा। उन्होंने अपने बेटे की सेवा में दिन-रात बिताए, लेकिन अंततः यह प्रश्न उनके सामने खड़ा हो गया कि क्या केवल सांस चलना ही जीवन कहलाता है। जब किसी व्यक्ति की चेतना समाप्त हो जाए, जब वह अपने अस्तित्व का अनुभव भी न कर सके, तब क्या उसे कृत्रिम साधनों के सहारे जीवित रखना मानवीय है या अमानवीय?
इन्हीं सवालों के साथ हरीश के परिवार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने न्यायालय से अनुरोध किया कि उनके बेटे को “इच्छा मृत्यु” अर्थात् पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी जाए। यह एक अत्यंत संवेदनशील और जटिल कानूनी विषय है। भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु यानी किसी व्यक्ति को जानबूझकर दवा देकर मृत्यु देना कानूनन अवैध है। लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में “पैसिव यूथेनेशिया” की अनुमति दी जा सकती है, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपचार या उपकरणों को हटाया जाता है और मरीज को प्राकृतिक रूप से मृत्यु आने दी जाती है।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए हरीश राणा के जीवन-रक्षक उपचार को हटाने की अनुमति दे दी। न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने यह निर्णय सुनाया। अदालत ने कहा कि व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने का अधिकार है, और उसी प्रकार गरिमा के साथ मरने का अधिकार भी मानवीय अधिकारों का हिस्सा है। अदालत ने निर्देश दिया कि उन्हें दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती किया जाए और चिकित्सा विशेषज्ञों की देखरेख में पैसिव यूथेनेशिया की प्रक्रिया अपनाई जाए।
इस निर्णय के बाद जब हरीश राणा को एम्स ले जाया जा रहा था, तब परिवार के बीच अत्यंत भावुक दृश्य देखने को मिला। परिवार के लोग उनके पास खड़े होकर उन्हें विदा दे रहे थे। एक आध्यात्मिक कार्यकर्ता ने उनके पास खड़े होकर कहा, “सबको माफ करते हुए, सबसे माफी मांगते हुए अब जाओ।” यह शब्द केवल एक व्यक्ति के लिए विदाई नहीं थे, बल्कि जीवन की गहरी सच्चाइयों को व्यक्त करने वाले शब्द थे। उस क्षण में वर्षों की पीड़ा, संघर्ष, आशा और निराशा सब एक साथ दिखाई दे रहे थे।
यह घटना केवल एक परिवार की निजी त्रासदी नहीं है। इसने पूरे देश में एक नई बहस को जन्म दिया है। सवाल यह है कि क्या जीवन को हर कीमत पर बनाए रखना आवश्यक है, या फिर कभी-कभी व्यक्ति की गरिमा और पीड़ा को देखते हुए उसे प्राकृतिक मृत्यु की अनुमति देना अधिक मानवीय हो सकता है। चिकित्सा विज्ञान का उद्देश्य जीवन को बचाना है, लेकिन जब जीवन केवल कृत्रिम उपकरणों पर निर्भर रह जाए और उसमें चेतना का कोई संकेत न हो, तब डॉक्टरों और परिवार के सामने नैतिक दुविधा खड़ी हो जाती है।
इस मामले ने यह भी दिखाया कि चिकित्सा निर्णय केवल वैज्ञानिक नहीं होते, बल्कि उनमें गहरी मानवीय संवेदनाएँ भी शामिल होती हैं। डॉक्टरों के लिए भी यह आसान निर्णय नहीं होता कि किसी मरीज के जीवन-रक्षक उपकरण हटाए जाएँ। इसलिए ऐसी स्थितियों में कई स्तरों पर चिकित्सकीय और कानूनी समीक्षा की जाती है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि निर्णय पूरी तरह मानवीय, नैतिक और कानूनी आधार पर लिया गया है।
हरीश राणा का मामला भारत में इच्छामृत्यु से जुड़ी बहस के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। इससे पहले भी “अरुणा शानबाग” जैसे मामलों ने इस विषय पर चर्चा को जन्म दिया था। लेकिन हरीश राणा का मामला इसलिए अलग है क्योंकि इसमें अदालत ने पहली बार स्पष्ट रूप से जीवन-रक्षक उपचार हटाने की अनुमति दी और इसे “गरिमा के साथ मृत्यु” के अधिकार से जोड़ा।
इस घटना का सबसे मार्मिक पक्ष यह है कि इसमें किसी प्रकार की सनसनी नहीं है, बल्कि केवल मानवीय पीड़ा और करुणा है। एक परिवार ने अपने बेटे को तेरह वर्षों तक संभालकर रखा, उम्मीद की कि शायद कोई चमत्कार हो जाए। लेकिन जब यह स्पष्ट हो गया कि वह कभी सामान्य जीवन में वापस नहीं लौट पाएगा, तब उन्होंने भारी मन से उसे मुक्त करने का निर्णय लिया। यह निर्णय लेना किसी भी माता-पिता के लिए शायद दुनिया का सबसे कठिन निर्णय होता है।
जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि वह अनिश्चित है। कभी-कभी जीवन हमें ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करता है जहाँ कोई भी विकल्प आसान नहीं होता। हरीश राणा की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जीवन केवल सांसों का नाम नहीं है, बल्कि चेतना, अनुभव और सम्मान के साथ जीने का नाम है। जब ये सब समाप्त हो जाएँ, तब शायद मृत्यु भी एक प्रकार की मुक्ति बन जाती है।
इस घटना ने समाज को एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। यह संदेश करुणा, संवेदना और मानवीय गरिमा का है। यह हमें याद दिलाता है कि कानून और चिकित्सा के निर्णय केवल नियमों से नहीं, बल्कि मनुष्यता की गहराई से भी जुड़े होते हैं। हरीश राणा की कहानी अंततः हमें यही सिखाती है कि जीवन की सबसे बड़ी शक्ति प्रेम है और कभी-कभी प्रेम का सबसे कठिन रूप किसी प्रिय व्यक्ति को शांति से विदा कर देना भी होता है।

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