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राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस: सुरक्षित भारत का निर्माण
महेन्द्र तिवारी
प्रत्येक वर्ष 4 मार्च को भारत में राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस मनाया जाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस का आयोजन हमें उस उत्तरदायित्व का बोध कराता है जो केवल सीमा पर तैनात प्रहरियों तक सीमित नहीं है, बल्कि जिसका विस्तार देश के प्रत्येक ग्राम, नगर और गलियों तक है। सुरक्षा एक व्यापक संकल्पना है जिसमें न केवल बाह्य शत्रुओं से रक्षा सम्मिलित है, वरन आंतरिक स्थिरता, आर्थिक सुदृढ़ता और प्राकृतिक आपदाओं से बचाव भी इसके अभिन्न अंग हैं। इस दिवस की पृष्ठभूमि अत्यंत गौरवमयी है, जिसकी नींव वर्ष 1999 में तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन द्वारा रखी गई थी। यह दिवस राष्ट्रीय नागरिक सुरक्षा प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना की ३६वीं वर्षगांठ का प्रतीक है। हैदराबाद में स्थित यह गौरवशाली संस्थान दशकों से नागरिकों को आपदा प्रबंधन, आतंकवाद के विरुद्ध प्रतिकार, आभासी प्रहारों और प्राकृतिक आपदाओं के समय धैर्य एवं कौशल से कार्य करने का प्रशिक्षण प्रदान कर रहा है। वर्ष 2026 के परिप्रेक्ष्य में, जब भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में अपनी धाक जमा रहा है, तब इस दिवस की महत्ता और भी बढ़ जाती है क्योंकि एक सशक्त राष्ट्र की आधारशिला उसकी सुरक्षा व्यवस्था की अभेद्यता पर टिकी होती है।
यदि हम भारत की सुरक्षा यात्रा के इतिहास का अवलोकन करें, तो यह संघर्ष और विजय की गाथाओं से परिपूर्ण है। 15 अगस्त 1947 को जब भारत ने पराधीनता की बेड़ियाँ काटीं, तो उसके साथ ही विभाजन की त्रासदी और सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रायोजित घुसपैठ की चुनौतियां भी सामने आईं। 1962 के युद्ध ने हमें यह सिखाया कि सुरक्षा के प्रति शिथिलता घातक हो सकती है, जिसके पश्चात 1963 में नागरिक सुरक्षा को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से प्रशिक्षण संस्थानों की रूपरेखा तैयार की गई। इसके उपरांत 1965 और 1971 के युद्धों ने भारतीय सैन्य बल की अदम्य शक्ति को सिद्ध किया और यह स्पष्ट कर दिया कि सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक नीतियों की आवश्यकता है। इसी दूरदर्शिता के परिणामस्वरूप 1999 में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का गठन हुआ, जो प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्र की रक्षा हेतु रणनीतिक निर्णय लेती है। इतिहास गवाह है कि जब-जब राष्ट्र पर संकट आया, चाहे वह 2004 की विनाशकारी सुनामी हो या 2008 का मुंबई आतंकी हमला, प्रशिक्षित नागरिकों और स्वयंसेवकों ने सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मानवता की रक्षा की। वीरता और समर्पण की इसी परंपरा को सम्मानित करने हेतु केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा प्रतिवर्ष पुरस्कार वितरित किए जाते हैं, जो सुरक्षा को केवल एक सरकारी विभाग की जिम्मेदारी न मानकर इसे लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक कर्तव्य से जोड़ते हैं।
आज के इस आधुनिक युग में सुरक्षा की परिभाषा केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह बहुआयामी और अत्यंत जटिल हो चुकी है। वर्तमान समय में भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती सीमा पार से संचालित आतंकवाद है। कश्मीर की शांत वादियों में अशांति फैलाने के उद्देश्य से विदेशी शक्तियों द्वारा समर्थित आतंकी संगठन निरंतर षड्यंत्र रचते रहते हैं। 2019 का पुलवामा प्रहार भारतीय सुरक्षा इतिहास का एक दुखद अध्याय था, किंतु इसके उत्तर में किए गए नियोजित वायु सेना के प्रहार ने विश्व को यह संदेश दिया कि नवीन भारत अब केवल रक्षात्मक नहीं, बल्कि अपनी सुरक्षा के लिए कठोर निर्णय लेने में भी सक्षम है। आतंकवाद के साथ-साथ आज 'आभासी सुरक्षा' या कंप्यूटर तंत्र की सुरक्षा एक अत्यंत गंभीर विषय बनकर उभरी है। जैसे-जैसे हम अंकीय क्रांति और वित्तीय लेन-देन के लिए अंतरजाल पर निर्भर हो रहे हैं, वैसे-वैसे विदेशी हैकर्स और शत्रु देशों द्वारा हमारे डेटा और महत्वपूर्ण सूचनाओं को चुराने के प्रयास बढ़ गए हैं। रूस और यूक्रेन के मध्य चले संघर्ष के उपरांत आभासी आक्रमणों की तीव्रता में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। भारत जैसे विशाल देश में, जहाँ करोड़ों लोग डिजिटल माध्यमों का प्रयोग कर रहे हैं, वहाँ एक छोटी सी तकनीकी चूक भी राष्ट्र की आर्थिक व्यवस्था को चोट पहुँचा सकती है।
आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर नक्सलवाद और वामपंथी उग्रवाद जैसी समस्याएं राष्ट्र की प्रगति में बाधक रही हैं। छत्तीसगढ़ और झारखंड के वनाच्छादित क्षेत्रों में सक्रिय उग्रवादी तत्व विकास कार्यों को रोकने का प्रयास करते हैं, जिससे निपटने के लिए सरकार निरंतर सामरिक और विकासात्मक रणनीतियों का समन्वय कर रही है। वहीं दूसरी ओर, लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश की सीमाओं पर पड़ोसी देशों की विस्तारवादी नीतियां और आक्रामकता एक सतत चिंता का विषय है। 2020 में गलवान घाटी में हुआ संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि शांति बनाए रखने के लिए भी सैन्य तत्परता अनिवार्य है। थल और नभ के साथ-साथ जलमार्ग की सुरक्षा भी भारत के लिए प्राणवायु के समान है। हिंद महासागर में विदेशी नौसेनाओं की बढ़ती हलचल और समुद्री डाकुओं का आतंक हमारे व्यापारिक हितों के लिए चुनौती है। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए भारत ने चतुर्भुज सुरक्षा संवाद (क्वाड) जैसे अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों के माध्यम से अपनी समुद्री उपस्थिति को सशक्त किया है। इसके अतिरिक्त, जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न होने वाली प्राकृतिक आपदाएं, जैसे हिमालयी क्षेत्रों में आने वाली बाढ़ और समुद्री चक्रवात, भी राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा बन चुके हैं क्योंकि ये जन-धन की अपार हानि करते हैं।
इन सभी चुनौतियों का प्रत्युत्तर देने हेतु भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में क्रांतिकारी कदम उठाए हैं। 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान के अंतर्गत रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में हम स्वावलंबी बन रहे हैं। 2026 तक हमारा लक्ष्य है कि भारतीय सेना द्वारा प्रयोग किए जाने वाले 70 प्रतिशत अस्त्र-शस्त्र स्वदेशी हों। तेजस जैसे युद्धक विमान और अग्नि जैसी शक्तिशाली प्रक्षेपास्त्र प्रणालियां भारत की वैज्ञानिक प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी 'साइबर सुरक्षा संचालन केंद्रों' की स्थापना की गई है जो चौबीसों घंटे हमारे आभासी अंतरिक्ष की निगरानी करते हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने अपनी त्वरित कार्यप्रणाली से आपदाओं के समय होने वाली क्षति को न्यूनतम करने में सफलता प्राप्त की है। सरकार ने शिक्षा के स्तर पर भी सुरक्षा बोध को अनिवार्य बनाने का प्रयास किया है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में राष्ट्रीय कैडेट कोर और राष्ट्रीय सेवा योजना के माध्यम से युवाओं को अनुशासन और राष्ट्र रक्षा का पाठ पढ़ाया जा रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस के अवसर पर आयोजित होने वाली प्रदर्शनियाँ और संगोष्ठियाँ सामान्य नागरिकों को उन खतरों के प्रति सचेत करती हैं जिनसे वे अनभिज्ञ हो सकते हैं।
परंतु, प्रश्न यह उठता है कि एक सामान्य नागरिक इस महायज्ञ में क्या आहुति दे सकता है? सुरक्षा का प्रथम नियम 'सजगता' है। एक जागरूक नागरिक समाज की आँखें और कान होता है। सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी लावारिस वस्तु या संदिग्ध व्यक्ति की सूचना तुरंत सुरक्षा बलों को देना एक अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है। अंकीय जगत में सुरक्षा बरतने के लिए जटिल कूटशब्दों का प्रयोग करना, अपरिचित संदेशों से सावधान रहना और वित्तीय जानकारी को गोपनीय रखना आज के युग की अनिवार्य आवश्यकता है। इसके साथ ही, प्राकृतिक आपदाओं के समय घबराने के स्थान पर पूर्व-तैयारी रखना, जैसे प्राथमिक चिकित्सा किट और आवश्यक वस्तुओं का संचय करना, न केवल व्यक्ति विशेष बल्कि पूरे समाज की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ सामान्य नागरिकों ने अपनी सूझबूझ से बड़े संकटों को टाला है। मुंबई के आतंकी हमलों के दौरान स्थानीय टैक्सी चालकों और होटल कर्मियों ने जिस साहस का परिचय दिया, वह सेना के पराक्रम से कम नहीं था। अतः, सुरक्षा का मार्ग व्यक्तिगत अनुशासन से होकर राष्ट्र के गौरव तक जाता है।
भविष्य की ओर दृष्टि डालें तो आने वाला समय कृत्रिम मेधा, मानवरहित विमानों (ड्रोन) और क्वांटम संगणना का है। ये तकनीकें जहाँ सुरक्षा को अभेद्य बनाएंगी, वहीं नई चुनौतियां भी प्रस्तुत करेंगी। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा विकसित की जा रही कृत्रिम मेधा प्रणालियां सीमाओं पर बिना मानवीय हस्तक्षेप के निगरानी रखने में सक्षम होंगी। अंतरिक्ष की सुरक्षा के क्षेत्र में भी भारत ने 2019 के एंटी-सैटेलाइट परीक्षण के माध्यम से अपनी धाक जमाई है, जिससे यह सुनिश्चित हुआ है कि हमारे संचार उपग्रह अंतरिक्ष में भी सुरक्षित हैं। भविष्य की सुरक्षा केवल शस्त्रों से नहीं, बल्कि श्रेष्ठतम तकनीक और अटूट एकता से सुनिश्चित होगी। आर्थिक विषमता और सामाजिक भेदभाव भी कभी-कभी आंतरिक विद्रोह का कारण बनते हैं, इसलिए वास्तविक सुरक्षा तभी संभव है जब देश के अंतिम व्यक्ति तक विकास के फल पहुँचें और वह स्वयं को राष्ट्र की मुख्यधारा का हिस्सा समझे।
निष्कर्षतः, राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस एक ऐसा अवसर है जो हमें आत्मचिंतन की प्रेरणा देता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हम एक ऐसे देश के निवासी हैं जिसकी सीमाएं हिमालय की चोटियों से लेकर हिंद महासागर की गहराइयों तक फैली हैं। इसकी रक्षा का दायित्व केवल उन वीरों का नहीं है जो शून्य से नीचे के तापमान में सीमाओं पर प्रहरी बने खड़े हैं, बल्कि यह हमारा सामूहिक धर्म है। प्रधानमंत्री के शब्दों में, सुरक्षा एक साझा संकल्प है। जब तक राष्ट्र का प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को देश का प्रथम रक्षक नहीं मानेगा, तब तक पूर्ण सुरक्षा की कल्पना अधूरी है। आइए, इस पावन दिवस पर हम यह प्रतिज्ञा लें कि हम सदैव सजग रहेंगे, विधि-व्यवस्था का सम्मान करेंगे और अपने आचरण से राष्ट्र की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखेंगे। सतर्क भारत ही समर्थ भारत है और समर्थ भारत ही विश्व शांति का अग्रदूत बन सकता है। जय हिंद, जय भारत।

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