राजनीति
भारत
सस्ती शिक्षा की महंगी कीमत: भारतीय छात्रों की त्रासदी
रक्तरंजित डिग्री: विदेश में पढ़ाई का भयावह चेहरा, विदेश भेजे बच्चे, लौटा डर: शिक्षा नीति पर कठोर सवाल
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
अचानक गूंजती चीखों और भागते कदमों के बीच वह भयावह दृश्य सामने आया, जिसे प्रत्यक्षदर्शी शायद जीवन भर नहीं भुला पाएंगे। हमला पूरी तरह अप्रत्याशित और निर्दय था। कुछ छात्र खेल में मग्न थे, कोई घर बात कर रहा था, तो कोई परीक्षा की चर्चा में जुटा था। तभी किशोर ने चाकू निकालकर बिना चेतावनी हमला शुरू कर दिया। पलभर में अफरा-तफरी मच गई—कोई गिर पड़ा, कोई दीवार से टकराया, तो कोई घायल मित्र को संभालने में जुट गया। फर्श पर खून बहने लगा और हवा में दहशत घुल गई। चार भारतीय छात्र गंभीर रूप से घायल हुए। प्रारंभिक रिपोर्टों ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी—गार्ड देर से पहुंचे और आपात इंतजाम नाकाम रहे। इस लापरवाही ने छात्रों के मन में गहरा भय भर दिया। अब वही छात्रावास, जो कभी घर जैसा लगता था, उन्हें असुरक्षित पिंजरा प्रतीत होता है।
हजारों किलोमीटर दूर भारत में बैठे माता पिता के लिए यह खबर किसी वज्रपात से कम नहीं थी। जिन हाथों ने बच्चों को आशीर्वाद देकर विदा किया था, वे अब हर पल प्रार्थना में जुड़े रहते हैं। कई परिवारों ने खेत बेचे, गहने गिरवी रखे और कर्ज लेकर बच्चों की फीस भरी थी। उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि रूस में शिक्षा सुरक्षित, सस्ती और भविष्य निर्माण का मजबूत रास्ता है। लेकिन इस हमले ने उनके विश्वास को चकनाचूर कर दिया। अब हर फोन कॉल डर पैदा करता है और हर सुबह नई चिंता लेकर आती है। माता पिता यह सोचकर कांप उठते हैं कि कहीं अगली खबर और भी दर्दनाक न हो। विदेश में पढ़ाई का सपना अब उनके लिए आशा नहीं, बल्कि अनिश्चितता और भय का प्रतीक बन गया है।
यूक्रेन युद्ध के बाद रूस भारतीय मेडिकल छात्रों का बड़ा ठिकाना बन गया। कम फीस, आसान दाखिला और एनएमसी मान्यता ने हजारों युवाओं को आकर्षित किया। नीट की ऊंची कटऑफ और सरकारी सीटों की कमी ने उन्हें मजबूरी में विदेश भेजा। हर साल बड़ी संख्या में छात्र यहां एमबीबीएस करने पहुंचते हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक सहयोग पर कभी गंभीर ध्यान नहीं दिया गया। नस्लीय टिप्पणियां, रैगिंग, मारपीट और संदिग्ध मौतें पहले ही चेतावनी दे रही थीं। यह चाकू हमला उसी उपेक्षा का सबसे भयावह रूप बन गया। आज कई छात्र कहते हैं कि वे पढ़ाई से ज्यादा अपनी जान की चिंता करते हैं। एफएमजीई का कम पास प्रतिशत पहले ही दबाव बढ़ा रहा था, और अब भय ने उनके मनोबल को और कमजोर कर दिया है।
इस घटना ने विश्वविद्यालय प्रशासन की लापरवाही और संवेदनहीनता की परतें एक-एक कर खोल दी हैं। छात्रावासों में सुरक्षा गार्डों की कमी, कमजोर सीसीटीवी और ढीली आपात व्यवस्था लंबे समय से खतरे की चेतावनी दे रही थीं, लेकिन उन्हें लगातार नजरअंदाज किया गया। डॉर्मिट्री जैसे व्यस्त और संवेदनशील स्थानों पर भी ठोस सुरक्षा इंतजाम नहीं थे। यदि समय रहते निगरानी मजबूत की जाती और व्यवस्था को सख्त बनाया जाता, तो शायद यह त्रासदी टाली जा सकती थी। लेकिन लापरवाही ने हालात को भयावह बना दिया। अब साफ दिखता है कि विदेशी छात्रों को अक्सर केवल फीस का स्रोत माना जाता है। सवाल यह है—क्या इन संस्थानों के लिए छात्रों की जान की कोई अहमियत है, या वे सिर्फ रजिस्टर के आंकड़े बनकर रह गए हैं?
सरकारी स्तर पर भी अब तक की प्रतिक्रिया अधिकतर औपचारिकता तक ही सीमित रही है। दूतावास ने एक्स पर बयान जारी किया, अधिकारियों को मौके पर भेजा और सहायता का भरोसा दिलाया, लेकिन इससे छात्रों के मन का डर कम नहीं हुआ। अब समय आ गया है कि कड़े और ठोस कदम उठाए जाएं। रूसी सरकार से स्पष्ट मांग होनी चाहिए कि सभी विदेशी छात्रावासों में 24x7 सुरक्षा, अतिरिक्त पुलिस बल, आधुनिक निगरानी प्रणाली और मानसिक परामर्श केंद्र अनिवार्य किए जाएं। हमले की निष्पक्ष जांच और दोषियों को कठोर सजा मिलनी चाहिए। भारत सरकार को भी मजबूत हेल्पलाइन, नियमित सुरक्षा समीक्षा और व्यापक जागरूकता कार्यक्रम शुरू करने होंगे। केवल आश्वासन और बयान अब भरोसा पैदा नहीं कर सकते।
यह दर्दनाक घटना भारत–रूस के शैक्षणिक संबंधों पर गहरे सवाल खड़े करती है। क्या छात्र केवल आंकड़े हैं, या उनकी सुरक्षा और सम्मान की भी कोई कीमत है? हर साल हजारों युवाओं का विदेश जाना तब तक उपलब्धि नहीं कहा जा सकता, जब वे डर और असुरक्षा में जीने को मजबूर हों। शिक्षा का उद्देश्य आत्मविश्वास और स्थिरता देना है, न कि भय और अकेलापन। आज रूस में पढ़ रहे हजारों भारतीय छात्र मानसिक तनाव और अवसाद से जूझ रहे हैं। वे लौटना चाहते हैं, लेकिन आर्थिक और शैक्षणिक मजबूरियां उन्हें रोक लेती हैं। यह स्थिति हमारी शिक्षा और विदेश नीति—दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
ऊफा की घटना हमें चेतावनी देती है कि विदेश में पढ़ाई अब सिर्फ अवसर नहीं, बल्कि बड़ा जोखिम बन चुकी है। सस्ती डिग्री के पीछे छिपा खतरा अब उजागर हो चुका है। सरकार, विश्वविद्यालय, एजेंट और अभिभावकों को मिलकर व्यवस्था बदलनी होगी। छात्रों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बननी चाहिए। यदि अब भी चुप्पी रही, तो अगली खबर किसी और घर का उजाला बुझा देगी। शिक्षा तभी सार्थक है, जब वह जीवन की रक्षा करे, सपनों को संवार दे और भविष्य को सुरक्षित बनाए। सुरक्षित शिक्षा ही सच्ची शिक्षा है—और यह हर छात्र का अधिकार है।

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