गंडक पुल : स्थिति बिल्कुल साफ़ और गंभीर है—यह नीति, नियत और प्रतिनिधित्व तीनों पर खड़ा है सवाल 

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ब्यूरो प्रमुख प्रमोद रौनियार।

कुशीनगर। विकास की किसी भी परियोजना की असली कसौटी उसकी नियत और जनोपयोगिता होती है, लेकिन जटहाँ–बगहा पुल का मामला आज इससे कहीं आगे निकल चुका है। यह अब केवल एक पुल नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र की कार्यशैली, NHAI की मंशा और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही का सवाल बन गया है।

जब VTR विभाग ने NHAI को स्पष्ट नोटिस दिया कि आपकी शर्तों की अवधि समाप्त हो चुकी है और अब आप अपना वैकल्पिक मार्ग तलाशें, तब NHAI और संबंधित मंत्रालय अचानक सक्रिय हुए। इसके बाद जटहाँ–बगहा पुल निर्माण की मांग जटहाँ और बगहा क्षेत्र से ज़ोर पकड़ने लगी। जनता ने आवाज़ उठाई, प्रतिनिधियों से उम्मीद की गई, लेकिन NHAI पर न तो जनदबाव का असर पड़ा और न ही राजनीतिक पहल का।

जनप्रतिनिधियों ने सदन में मुद्दा उठाया, केंद्रीय मंत्रियों तक बात पहुँची, फिर भी परिणाम शून्य रहा। इसके उलट NHAI ने अपनी योजना के अनुसार 8 किलोमीटर की आवश्यकता को 20 किलोमीटर की लम्बी रेखा में बदलकर ऐसा भ्रम पैदा किया मानो समाधान मिल गया हो। यह कदम वस्तुतः जनता को “ठंडा” करने की रणनीति प्रतीत होता है।

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अब जो जानकारी सामने आ रही है, वह और भी चिंताजनक है। बताया जा रहा है कि NHAI द्वारा स्वीकृत बगहा–बेलवनिया परियोजना को जानबूझकर कम उपयोगी दिखाया गया, केवल बाइक-कार मार्ग बताकर एक महंगी और अव्यवहारिक योजना का स्वरूप दिया गया, ताकि उसे चुपचाप ठंडे बस्ते में डाला जा सके। यदि यह सच है, तो यह न केवल क्षेत्र के साथ अन्याय है, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों और जनभावनाओं के साथ छल भी है।

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इसी संभावित निरस्तीकरण से आहत होकर अब समिति द्वारा धरना प्रदर्शन मशाल जुलूस आदि रूपों में आंदोलन का रास्ता अपनाया गया है। यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि विकास के अधिकार के लिए है।

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सबसे बड़ा और अहम सवाल यहाँ राजनीतिक चुप्पी को लेकर है।

आज उत्तर प्रदेश के कुशीनगर से एक राज्यसभा सांसद और एक लोकसभा सांसद हैं, लेकिन दोनों की चुप्पी खटकती है। वहीं चंपारण से माननीय जदयू सांसद श्री सुनील कुमार जी अकेले इस मुद्दे पर संघर्ष करते दिख रहे हैं, जबकि उन्हें अपनी ही गठबंधन की भाजपा नेतृत्व से कोई ठोस समर्थन मिलता नहीं दिख रहा। तो फिर जनता क्या माने?क्या यह परियोजना वास्तव में तकनीकी कारणों से रुकी है, या फिर राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव और प्रशासनिक टालमटोल की भेंट चढ़ रही है?

अब निर्णय जनता के विवेक पर है। विकास मांगने वाली जनता को यह सोचना होगा कि उनकी आवाज़ कौन सुन रहा है, कौन चुप है, और कौन केवल रेखाएँ खींचकर समय काट रहा है। क्योंकि पुल केवल नदी नहीं जोड़ता— वह नियत और नेतृत्व को भी जोड़ता या तोड़ता है।

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