RTI से बड़ा खुलासा: उत्तर प्रदेश में ट्रैफिक पुलिस के 4,700 से अधिक पद खाली, अव्यवस्था की कीमत चुका रही है जनता

सीमित संख्या में तैनात ट्रैफिक पुलिस कर्मियों पर अत्यधिक कार्यभार है। एक ही कर्मी को कई-कई चौराहों और इलाकों की जिम्मेदारी संभालनी पड़ रही है।

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लखनऊ-सचिन बाजपाई की खास रिपोर्ट 


उत्तर प्रदेश में लगातार बढ़ते ट्रैफिक जाम, सड़क दुर्घटनाएं और ट्रैफिक नियमों की खुलेआम अनदेखी अब केवल अनुशासन की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह गंभीर प्रशासनिक संकट का रूप ले चुकी है। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत प्राप्त प्रमाणित सरकारी रिकॉर्ड से यह खुलासा हुआ है कि प्रदेश में ट्रैफिक पुलिस के 4,723 पद लंबे समय से रिक्त हैं। यह जानकारी सक्षम अधिकारी द्वारा RTI आवेदन के जवाब में दी गई है, जिसमें ज़िलेवार वैकेंसी का पूरा ब्योरा शामिल है।

RTI के अनुसार, ट्रैफिक पुलिस में

ट्रैफिक इंस्पेक्टर के 7 पद,

ट्रैफिक सब-इंस्पेक्टर के 1,200 पद,

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हेड कांस्टेबल (ट्रैफिक) के 131 पद,

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और कांस्टेबल (ट्रैफिक पुलिस) के 3,385 पद

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खाली हैं। इनमें सबसे चिंताजनक स्थिति ट्रैफिक सब-इंस्पेक्टर और कांस्टेबल स्तर पर है, जो रोज़ाना सड़कों पर ट्रैफिक कंट्रोल और कानून लागू करने की मुख्य जिम्मेदारी निभाते हैं।

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हर ज़िले की कहानी, एक जैसी परेशानी

RTI में दिए गए ज़िलेवार आंकड़े यह बताते हैं कि ट्रैफिक पुलिस की कमी किसी एक शहर या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। महानगरों से लेकर छोटे जिलों तक, लगभग हर जगह ट्रैफिक कर्मियों की संख्या आवश्यकता से काफी कम है। कई जिलों में स्थिति यह है कि एक-एक चौराहे की जिम्मेदारी सीमित स्टाफ पर डाल दी गई है, जिससे न तो नियमित निगरानी संभव हो पा रही है और न ही नियमों का सख्ती से पालन कराया जा रहा है।

ट्रैफिक से जुड़ी समस्याएं गहराईं

स्टाफ की कमी का सीधा असर सड़क पर दिख रहा है। व्यस्त चौराहों और बाजार क्षेत्रों में अक्सर ट्रैफिक सिग्नल के बिना ही वाहन चलते नजर आते हैं। कई जगहों पर ट्रैफिक पुलिस की अनुपस्थिति में लोग अपनी सुविधा के अनुसार वाहन मोड़ते, गलत दिशा में चलते और नियम तोड़ते देखे जा सकते हैं।

इसका नतीजा यह है कि:

लंबे-लंबे ट्रैफिक जाम आम बात हो गए हैं,

स्कूल, कॉलेज और दफ्तर जाने वाले लोगों को रोज़ाना देरी का सामना करना पड़ता है,

एम्बुलेंस और फायर ब्रिगेड जैसी आपात सेवाएं जाम में फंस जाती हैं,

और छोटे हादसे बड़े दुर्घटनाओं में बदल जाते हैं।


दुर्घटनाओं पर नियंत्रण मुश्किल

सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रैफिक पुलिस की मौजूदगी दुर्घटनाओं को रोकने में अहम भूमिका निभाती है। जहां नियमित चेकिंग, हेलमेट और सीट बेल्ट की सख्ती होती है, वहां हादसों में कमी देखी जाती है। लेकिन उत्तर प्रदेश में स्टाफ की भारी कमी के चलते स्पीड कंट्रोल, ड्रिंक एंड ड्राइव जांच और ओवरलोडिंग पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पा रही है, जिससे सड़क दुर्घटनाओं का जोखिम लगातार बढ़ रहा है।

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कर्मियों पर बढ़ता दबाव

सीमित संख्या में तैनात ट्रैफिक पुलिस कर्मियों पर अत्यधिक कार्यभार है। एक ही कर्मी को कई-कई चौराहों और इलाकों की जिम्मेदारी संभालनी पड़ रही है। इससे न सिर्फ व्यवस्था प्रभावित होती है, बल्कि कर्मियों की कार्यक्षमता और स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो ट्रैफिक पुलिस व्यवस्था और कमजोर हो सकती है।

वाहनों की संख्या बढ़ी, व्यवस्था नहीं

पिछले कुछ वर्षों में प्रदेश में निजी वाहनों की संख्या में तेज़ी से इजाफा हुआ है। नई सड़कें और फ्लाईओवर बनने के बावजूद ट्रैफिक मैनेजमेंट के लिए जरूरी मानव संसाधन नहीं बढ़ सका। नतीजतन, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर भी स्टाफ की कमी के कारण अपेक्षित राहत नहीं दे पा रहा है।

जनहित का बड़ा सवाल

गौरतलब है कि यह पूरा मामला किसी अनुमान या आरोप पर आधारित नहीं है, बल्कि RTI के तहत मिले सर्टिफाइड सरकारी रिकॉर्ड से सामने आया है। यह स्थिति सरकार और पुलिस प्रशासन के लिए गंभीर चेतावनी है। जानकारों का कहना है कि यदि जल्द से जल्द ट्रैफिक पुलिस के खाली पद नहीं भरे गए, तो आम नागरिकों की सुरक्षा और शहरी जीवन की रफ्तार दोनों पर इसका नकारात्मक असर और बढ़ेगा।

ट्रैफिक व्यवस्था केवल जाम या चालान तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि यह लाखों लोगों की जान, समय और सुरक्षा से जुड़ा जनहित का मुद्दा है, जिस पर त्वरित और ठोस कदम उठाना अब अनिवार्य हो गया है।

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