भारत की बेटियां : आज मैं आगे जमाना है पीछे
डिबिया में है धूप का टूकड़ा, वक्त पड़ा तो खोलूंगी ।आसमान जब घर आयेगा, मैं अपने पर तौलूंगी ।
कुछ दशक पहले तक पिछड़े राज्यों एवं विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियों के सपने घर की चहारदीवारी से बाहर नहीं आते थे । यदि वे घर से बाहर कोई सपना देखती भीं थीं, तो उसकी उड़ान ‘‘अच्छे वर व अच्छे घर‘‘ से आगे नहीं बढ़ पाती थीं । घर के कार्यों से फुर्सत मिलने के बाद जब ये लड़कियां घर की खिड़की के पास बैठकर खुले आसमान की ओर देखतीं तब उनके भीतर इस आसमान की ऊॅंचाई का सपना आकार लेता दिखाई नहीं पड़ता था । हालांकि पाशर्व में उनकी शिक्षा को आयाम देने के तमाम प्रयास भी चल रहे थे, पर ये प्रयास भी महज उन्हें साक्षर बनाने तक हीं सीमित थे ।
महिला शिक्षा से विकास पर निर्णयात्मक प्रभाव पड़ता है। शास्त्रों में भी कहा गया है- ‘‘संस्कृताः स्त्रीः पराशक्ति‘‘। 1991-2000 के दशक में संचालित जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम, 2001-2010 के दशक में संचालित सर्व शिक्षा अभियान, 1 अप्रैल 2010 को सम्पूर्ण भारत में लागू बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009, वर्ष 2018-2019 से संचालित समग्र शिक्षा कार्यक्रमों तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में बालिकाओं की शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया ।
इसका प्रत्यक्ष प्रभाव दृष्टिगोचर हो रहा है कि जनगणना 1951 में भारतवर्ष में महिला साक्षरता दर जहां मात्र 8.86 प्रतिशत थी, वह जनगणना 2011 में बढ़कर 65.46 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है । शिक्षा क्रान्ति के इस युग में उच्च शिक्षा ग्रहण कर हर क्षेत्र में नित्य नये कीर्तिमान रचती ये लड़कियां आज किसी पर बोझ नहीं हैं वरन् परिवार, समाज और देश के प्रति अपने दायित्व का निर्वहन कर पुरातन विचारधाराओं को तोड़ रहीं है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बेटियों के मामले में मां-बाप तथा समाज की सोच में काफी बदलाव आया है । विज्ञान के विकास एवं श्रव्य-दृश्य माध्यमों के गांव-घर में प्रवेश तथा सरकार की सकारात्मक लैगिंक नीतियों ने भी इसमें निर्णायक भूमिका अदा की है।
बालिका शिक्षा की उतरोत्तर वृद्धि में राज्य एवं केन्द्र दोनों हीं स्तर पर क्रियान्वित योजनाओं की समान महती भूमिका रही है

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