लोकतंत्र नहीं, जनसत्ता का उत्सव है गणतंत्र
सिंहासन खाली है, क्योंकि जनता बैठी है गण नहीं तो तंत्र नहीं: नागरिक चेतना से चलता भारत
कृति आरके जैन
गणतंत्र का अर्थ केवल व्यवस्था नहीं, बल्कि चेतना है। यह वह विचार है जो कहता है कि जन्म से कोई ऊँचा या नीचा नहीं, सब समान हैं। यहाँ मुकुट किसी के सिर पर स्थायी नहीं रहता, बल्कि जिम्मेदारी के रूप में हर हाथ में बँट जाता है। जब हम कहते हैं कि अब हर कोई राजा है, तो उसका मतलब अधिकारों का उन्माद नहीं, बल्कि कर्तव्यों की साझेदारी है। गणतंत्र हमें सिखाता है कि सच्चा राजा वही है जो अपने निर्णयों से समाज को मजबूत बनाए, न कि केवल स्वयं को।
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति वह क्षण है जब एक साधारण नागरिक मतदान केंद्र पर खड़ा होता है। वहाँ न धन बोलता है, न पद, न पहचान। वहाँ केवल विवेक बोलता है। एक बटन दबाते समय वह व्यक्ति इतिहास की धारा को मोड़ने की क्षमता रखता है। उस एक क्षण में सत्ता उसके हाथों में होती है। यही वह जादू है जो गणतंत्र रचता है, जहाँ सबसे शांत दिखने वाला नागरिक भी सबसे बड़ा निर्णायक बन जाता है और सत्ता को दिशा देने का अधिकार पाता है।
हमारा संविधान इस गणतंत्र की आत्मा है। यह कोई मोटी किताब भर नहीं, बल्कि करोड़ों आशाओं का लिखित संकल्प है। इसमें अधिकार हैं ताकि कोई कुचला न जाए और कर्तव्य हैं ताकि कोई स्वेच्छाचारी न बने। संविधान हमें बोलने की स्वतंत्रता देता है, पर सुनने की जिम्मेदारी भी सिखाता है। यह हमें चुनने का अधिकार देता है, पर सोचने की अपेक्षा भी रखता है। 1950 में लिया गया यह संकल्प आज भी जीवित है, क्योंकि हर पीढ़ी इसे अपने कर्मों से नया अर्थ देती है।
गणतंत्र का सौंदर्य उसकी सहनशीलता में छिपा है। यहाँ असहमति अपराध नहीं, बल्कि विकास का साधन है। सवाल पूछना विद्रोह नहीं, बल्कि जागरूकता का संकेत है। जब नागरिक प्रश्न करते हैं, तब व्यवस्था सजग होती है। यही कारण है कि यह देश कठिन दौर से गुजरकर भी टूटता नहीं। गरीबी, विपत्तियाँ, संकट और संघर्ष आते रहे, पर हर बार गणतंत्र ने लोगों को यह भरोसा दिया कि हार अंतिम सत्य नहीं। उठना, सीखना और आगे बढ़ना ही इसकी असली पहचान है।
इस देश का हर नागरिक अपने क्षेत्र में राजा है। किसान खेत में फैसले लेता है, शिक्षक कक्षा में भविष्य गढ़ता है, मजदूर ईंट पर ईंट रखकर सपनों की इमारत खड़ी करता है। महिलाएँ सीमाएँ तोड़कर नेतृत्व करती हैं और युवा नए रास्ते खोजते हैं। यहाँ राजत्व किसी सिंहासन से नहीं, बल्कि श्रम और समर्पण से मिलता है। जब हर व्यक्ति अपने दायित्व को ईमानदारी से निभाता है, तब गणतंत्र केवल शासन पद्धति नहीं रहता, वह जीवन शैली बन जाता है।
आज का गणतंत्र केवल अधिकारों का उत्सव नहीं, बल्कि उत्तरदायित्वों की परीक्षा भी है। अगर हम राजा हैं, तो हमें न्यायप्रिय भी होना होगा। अगर हमारी आवाज़ की कीमत है, तो दूसरों की चुप्पी का सम्मान भी जरूरी है। सड़क पर नियम मानना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और कमजोर के पक्ष में खड़ा होना भी राजधर्म ही है। गणतंत्र तब खोखला हो जाता है जब हम अधिकार तो माँगते हैं, पर कर्तव्य से मुँह मोड़ लेते हैं। सच्चा राजा वही है जो अनुशासन को सम्मान समझे।
तिरंगे को सलामी देते समय हमें यह भी याद रखना चाहिए कि यह ध्वज केवल गर्व का प्रतीक नहीं, बल्कि भरोसे की कसौटी है। इसमें उन बच्चों के सपने हैं जो शिक्षा से भविष्य बदलना चाहते हैं और उन बुज़ुर्गों का विश्वास है जिन्होंने संघर्ष में जीवन बिताया। यह झंडा हमें जोड़ता है, बाँटता नहीं। गणतंत्र की सफलता इसी में है कि विविधता के बीच भी एकता बनी रहे। जब हर रंग अपनी पहचान के साथ साथ दूसरे रंग का सम्मान करता है, तभी तिरंगा पूर्ण दिखता है।
आज की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम गणतंत्र को केवल पर्व न बनने दें। इसे रोज़मर्रा के व्यवहार में उतारें। सवाल पूछें, पर समाधान भी सुझाएँ। आलोचना करें, पर निर्माण की भावना से। जब नागरिक सजग होते हैं, तब शासन पारदर्शी होता है। तब कोई प्रजा नहीं बचती, क्योंकि सब सहभागी बन जाते हैं। यही वह अवस्था है जहाँ सत्ता ऊपर से नीचे नहीं, बल्कि भीतर से बाहर बहती है और देश को मजबूती देती है।
गणतंत्र का संदेश सरल और स्पष्ट है। यहाँ कोई स्थायी राजा नहीं और कोई स्थायी प्रजा नहीं। यहाँ हर व्यक्ति अपने निर्णयों से राजा बनता है और अपने कर्तव्यों से व्यवस्था को जीवित रखता है। जब सब मिलकर जिम्मेदारी उठाते हैं, तब राष्ट्र आगे बढ़ता है। यही गणतंत्र की जीत है, यही भारत की ताकत है। इस विचार को केवल शब्दों में नहीं, कर्म में जिएँ। क्योंकि जब हर नागरिक राजा होता है, तब देश केवल बड़ा नहीं, महान बनता है।
