भारत आगे बढ़ रहा है, क्या हम साथ चल रहे हैं?
[आज का भारत: नेतृत्व की ओर बढ़ता गणतंत्र] [गणतंत्र दिवस: स्मरण नहीं, आत्मस्वीकार का क्षण]
प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
1950 में संविधान के लागू होने के साथ भारत ने यह दृढ़ संकल्प लिया था कि यह राष्ट्र शक्ति के दबाव या भय के आधार पर नहीं, बल्कि न्याय, समानता और विधि के सिद्धांतों पर चलेगा। डॉ. भीमराव अंबेडकर की चेतावनी आज भी उतनी ही प्रखर है कि संविधान की सार्थकता उसके अनुच्छेदों में नहीं, बल्कि उसे लागू करने वालों की नैतिकता में निहित होती है। सात दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद मूल प्रश्न यह नहीं रह गया है कि हमारे पास अधिकार हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम उन अधिकारों की गरिमा को निभाने वाले उत्तरदायी नागरिक बन पाए हैं।
भारत की प्रगति आज विश्व का ध्यान आकर्षित कर रही है और उसे नए दृष्टिकोण से देखने को विवश कर रही है। विज्ञान, अंतरिक्ष, डिजिटल संरचना और आर्थिक विस्तार ने यह प्रमाणित कर दिया है कि भारत असीम संभावनाओं का राष्ट्र है। वैश्विक मंचों पर भारत की उपस्थिति अब अधिक आत्मविश्वास और प्रभाव के साथ उभर रही है। नवाचार, उद्यमिता और तकनीकी दक्षता ने विकास के नए द्वार खोले हैं। स्वच्छ ऊर्जा, जैव आधारित अर्थव्यवस्था और निर्यात विस्तार ने प्रगति को नई दिशा और स्थायित्व प्रदान किया है। यह सब संकेत देता है कि भारत केवल आगे बढ़ने वाला देश नहीं, बल्कि नेतृत्व करने के लिए स्वयं को तैयार कर रहा है।
विकसित भारत की परिकल्पना अब केवल आकांक्षा नहीं, बल्कि स्पष्ट दिशा और ठोस लक्ष्य में बदल चुकी है। सम्मानजनक जीवन, सशक्त अर्थव्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा की चाह हर नागरिक के मन में गहराई से समाई हुई है। जब विकास की योजनाओं में किसान, श्रमिक, वैज्ञानिक और सामान्य नागरिक समान भागीदारी निभाते हैं, तब प्रगति केवल दिखाई नहीं देती, बल्कि स्थायी रूप से जड़ें जमाती है। यह संकेत देता है कि विकास अब सीमित दायरों से बाहर निकलकर समाज के प्रत्येक स्तर तक पहुँचने का संकल्प कर चुका है।
किन्तु इस प्रगति के उजाले के साथ कुछ गहरी छायाएँ भी स्पष्ट दिखाई देती हैं। युवा बेरोजगारी आज सबसे गंभीर चुनौती बनकर उभरी है। शिक्षित युवा अवसरों की प्रतीक्षा में हताशा और असमंजस का सामना कर रहे हैं। शिक्षा व्यवस्था में कौशल, व्यावहारिक समझ और नैतिक मूल्यों की कमी साफ झलकती है। जब युवाओं को सही दिशा नहीं मिलती, तो उनकी ऊर्जा भटकाव में बदल जाती है। यह स्थिति केवल युवाओं के लिए नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए चेतावनी है।
पर्यावरण संकट अब अनदेखा किया जाने वाला विषय नहीं रह गया है। वायु प्रदूषण, जल संकट और प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित दोहन विकास की नींव को ही चुनौती दे रहा है। नदियों की बिगड़ती दशा और शहरों की विषैली हवा यह स्पष्ट कर देती है कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए बिना प्रगति टिकाऊ नहीं हो सकती। आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल आर्थिक मजबूती नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन भी है। स्वदेशी और हरित तकनीकों को अपनाए बिना भविष्य को सुरक्षित नहीं किया जा सकता।
भ्रष्टाचार आज भी विकास पथ की सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। यह केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकृति का रूप ले चुका है। जब नियमों को तोड़ना सामान्य व्यवहार बन जाता है, तब नैतिकता कमजोर पड़ने लगती है। इसके साथ ही जाति, धर्म और क्षेत्रीयता के नाम पर खींची गई रेखाएँ सामाजिक एकता को क्षति पहुँचाती हैं। विविधता भारत की पहचान है, लेकिन जब वही विभाजन का कारण बन जाए, तो गणतंत्र की नींव डगमगाने लगती है।
गणतंत्र दिवस हमें यह गहरी समझ देता है कि अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सहारे टिके हैं। कर्तव्य के बिना अधिकार अर्थहीन और कमजोर हो जाते हैं। प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि वह ईमानदारी, अनुशासन और सामाजिक सद्भाव को अपने आचरण का आधार बनाए। नफरत और अफवाहों के स्थान पर संवाद, सहिष्णुता और समझ को बढ़ावा देना ही सच्ची देशभक्ति का परिचय है। समस्याओं से मुँह मोड़ने के बजाय समाधान खोजने की सोच विकसित करना समय की माँग है।
महिला सशक्तिकरण, सामाजिक समानता और ग्रामीण विकास राष्ट्र निर्माण की मजबूत नींव हैं। जब तक समाज का हर वर्ग सुरक्षित, सशक्त और सम्मानित नहीं होगा, तब तक प्रगति अधूरी ही रहेगी। पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता आज के युग में राष्ट्रीय दायित्व बन चुके हैं। अनुशासन, परिश्रम और नैतिकता के बिना कोई भी राष्ट्र न तो स्थायी विकास कर सकता है और न ही विश्व को मार्ग दिखा सकता है।
आज इस गणतंत्र दिवस पर हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम केवल आलोचना करने वाले नहीं, बल्कि सक्रिय सहभागी बनेंगे। हम विभाजन की नहीं, एकता और भाईचारे की राह चुनेंगे। हम अधिकारों की माँग के साथ कर्तव्यों के निर्वहन का साहस भी दिखाएँगे। जब भारत अपनी स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष की ओर अग्रसर होगा, तब विश्व उसे केवल समृद्ध ही नहीं, बल्कि नैतिक, संवेदनशील और जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में पहचाने — यही हमारी पीढ़ी की सबसे बड़ी परीक्षा है और यही उसका ऐतिहासिक उत्तरदायित्व।
