सनातन हिन्दू धर्म में अंतिम यात्रा के महत्व को भूलती आधुनिक पीढ़ी
हिन्दू धर्म परंपरा के अनुसार मनुष्य के जीवन में गर्भाधान से लेकर मृत्यु तक षोडश संस्कार, अर्थात प्रकार के सोलह संस्कार, किए जाते हैं। भारतीय हिन्दू धर्मग्रंथों में इन सभी संस्कारों का विधि-विधान विस्तार से वर्णित है। इन सोलह संस्कारों में सबसे अंतिम और अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार होता है अन्त्येष्टि संस्कार, जिसे मृत्यु कर्म संस्कार भी कहा जाता है। जब जीवात्मा अपने कर्मभोग के अनुसार मानव रूप में निर्धारित आयु पूर्ण कर शरीर का परित्याग करती है, उसी क्षण मृत्यु घटित होती है और उसी के साथ हिन्दू धर्म के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया आरंभ होती है ।
आज के आधुनिक, स्मार्ट टेक्नोलॉजी युक्त युग में अधिकांश लोग शास्त्र सम्मत बातों को या तो नजरअंदाज कर देते हैं या उन पर विश्वास ही नहीं करते। विज्ञान पर बढ़ते भरोसे के कारण भारतीय धर्मग्रंथों की बातों को लोग महत्व नहीं देते, जबकि विज्ञान आज भी मृत्यु और उसके रहस्य को समझने में असमर्थ है । पूर्व के पंद्रह संस्कारों की तरह अंतिम संस्कार में भी मृतक के परिजन, रिश्तेदार और परिचित एकत्र होकर मृतक को श्मशान तक ले जाते हैं और तब तक वहां से वापस नहीं लौटते, जब तक कि देह अग्नि को पूर्ण रूप से समर्पित न कर दी जाए।
यह परंपरा आज भी हिन्दू समाज में प्रचलित है। समय के साथ रीति-रिवाजों के निर्वहन के तरीकों में परिवर्तन अवश्य आया है, परंतु संस्कारों की मूल प्रक्रिया आज भी प्राचीन परंपराओं के अनुसार ही की जाती है। शास्त्रों के अनुसार यदि संस्कार विधि-विधान से किए जाएँ तो जीवात्मा को परलोक में कम कष्ट भोगना पड़ता है । वर्तमान समय में लोग कार्य व्यस्तता का हवाला देकर धार्मिक, सामाजिक, पारिवारिक और शोक कार्यक्रमों से दूरी बनाने लगे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि भारत में इंटरनेट और स्मार्टफोन का सर्वाधिक उपयोग होता है और एक व्यक्ति प्रतिदिन चार से पाँच घंटे मोबाइल पर व्यतीत करता है। ऐसे में यह कहना कि अंतिम यात्रा में शामिल होने का समय नहीं है, तो गहन आत्ममंथन का विषय है।
आज की विडंबना यह है कि शिक्षित और आधुनिक कहलाने वाले लोग अपने ही परिचित की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं होते हे या केवल औपचारिकता निभाकर बीच में ही लौट आते हैं। हिन्दू धर्म में दाह संस्कार के मध्य श्मशान से लौटना वर्जित माना गया है । कपाल क्रिया से पूर्व लौटना अशुभ माना जाता है और पितरों की नाराज़गी की मान्यता भी इससे जुड़ी है । नियमों के अनुसार उठावने की तिथि का समय दाह संस्कार पूर्ण होने के बाद मृतक के घर से तय किया जाना चाहिए, किंतु आज समयाभाव के कारण लोग श्मशान में ही इसकी घोषणा कर देते है, जो परंपरा के विरुद्ध है।
Read More भरण-पोषण के उद्देश्य से की जाने वाली शादियाँ” : कानून के दुरुपयोग की एक चिंताजनक प्रवृत्तिजहाँ एक ओर बुजुर्ग आज भी परंपराओं का पालन कर रहे हैं, वहीं आधुनिक शिक्षित वर्ग सुविधानुसार नियमों में परिवर्तन कर रहा है। तेरह दिन का शोक, जो हिन्दू धर्म में अनिवार्य माना गया हे किन्तु वर्तमान में कई समाज के लोगो द्वारा अपने व्यापार और व्यस्तता के कारण तीसरे दिन ही मृतक के सारे कर्म पूरे करने का चलन समाज मे बड़ी तेजी से चल रहा हे जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है ।
शास्त्र अनुसार देव पूजा या अन्य संस्कारों में त्रुटि होने पर क्षमा का विधान है, किंतु अंतिम संस्कार में त्रुटियों के लिए क्षमा का कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए यह संस्कार शुद्धता, शालीनता और पूर्ण श्रद्धा से संपन्न किया जाना चाहिए। आज आधुनिक युग में व्यक्ति धन से संपन्न और भौतिक सुख सुविधा से संपन्न होने के बाद भी दुखी और बीमार ही नजर आता हे ! विलासिता और सुख सुविधाओं के हजारों संसाधनों के बावजूद प्राय: अधिकांश घरों में घरेलू कलह का वातावरण बना रहना, घरों में ही अपनों से दुखी होते लोग या किसी न किसी प्रकार से घर परिवार में बीमारी का वातावरण निर्मित रहना यह सब क्यों होता हे इस पर कभी आधुनिक आदमी ने चिंतन नहीं किया हे !
बेशक ऐश्वर्य कि सब कुछ सुविधाएं घरों में होने के बाद भी यदि शांति और प्रेम नहीं हे तो यह पितरों के नाराजगी का ही परिणाम माना जाएगा ! व्यक्ति कितनी भी तरक्की कर ले यदि उसके पितरु नाराज हे तो वह मानसिक रूप से सदैव दुखी ही नजर आएगा ! यह मान्यता है कि जब तक पितरों की आत्मा को शांति नहीं मिलती तब तक परिवार में कलह, रोग और अशांति बनी रहती है, जिसे पितृदोष कहा जाता है। चाहे हम कितने भी आधुनिक हो जाएँ, मृत्यु एक शाश्वत सत्य है—अटल है। इससे कोई नहीं बच सकता। अतः यदि जीवन को सुखमय और निरामय बनाना है, तो अपने परिवार, समाज और संबंधियों के अंतिम संस्कार को विधि-विधान से संपन्न करना होगा तभी पितरों की प्रसन्नता और आशीर्वाद परिवार पर बना रहेगा।
अरविंद रावल

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