भरण-पोषण के उद्देश्य से की जाने वाली शादियाँ” : कानून के दुरुपयोग की एक चिंताजनक प्रवृत्ति
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भारत में भरण-पोषण से संबंधित प्रावधान मुख्य रूप से हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 तथा विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अंतर्गत आते हैं। इन कानूनों का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर जीवनसाथी को संरक्षण प्रदान करना है, किंतु कुछ मामलों में इनका दुरुपयोग समाज के लिए गंभीर समस्या बनता जा रहा है।
कानूनी प्रावधानों की संक्षिप्त जानकारी
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 के अंतर्गत वाद लंबित रहने की अवधि में आर्थिक रूप से कमजोर पक्ष को अंतरिम भरण-पोषण (Maintenance pendente lite) देने का प्रावधान है। इसी प्रकार विशेष विवाह अधिनियम, 1954 की धारा 37 में भी समान व्यवस्था की गई है।वहीं, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 न्यायालय को यह अधिकार प्रदान करती है कि वह विवाह विच्छेद के पश्चात स्थायी भरण-पोषण (Permanent Alimony) प्रदान कर सके।
कानून का दुरुपयोग और उसके दुष्परिणाम
कुछ मामलों में यह देखा गया है कि कुछ महिलाएँ विवाह को एक स्थायी सामाजिक संस्था के रूप में न देखकर, केवल आर्थिक लाभ के साधन के रूप में उपयोग कर रही हैं। ऐसे मामलों में विवाह कुछ ही दिनों, हफ्तों अथवा महीनों में समाप्त कर, पति एवं उसके परिवार से भारी भरकम भरण-पोषण की मांग की जाती है।इस प्रकार के मामलों में न केवल वर पक्ष को आर्थिक क्षति होती है, बल्कि उन्हें सामाजिक अपमान, झूठे आरोपों, कानूनी लड़ाई और मानसिक तनाव का भी सामना करना पड़ता है। कई बार पूरे परिवार की प्रतिष्ठा और भविष्य दांव पर लग जाता है।
न्यायालय का दृष्टिकोण
दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा रिता राज बनाम पवित्रा रॉय चौधरी प्रकरण में यह स्पष्ट किया गया कि भरण-पोषण का उद्देश्य जीवनसाथी को आत्मनिर्भर बनने में सहायता देना है, न कि उसे विलासितापूर्ण जीवन शैली प्रदान करना।
इस मामले में याचिकाकर्ता रेलवे में ग्रुप ‘A’ अधिकारी थीं, इसलिए न्यायालय ने भरण-पोषण देने से इनकार करते हुए कानून के वास्तविक उद्देश्य को रेखांकित किया।
आगे की राह --
आज आवश्यकता इस बात की है कि न्यायालयों द्वारा ऐसे मामलों में गहन जांच की जाए, ताकि वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिल सके और कानून का दुरुपयोग करने वालों पर अंकुश लगाया जा सके।
कुछ विशेषज्ञ वैवाहिक परामर्श और पारिवारिक सुलह को प्राथमिकता देने की बात करते हैं, वहीं अन्य लोग भरण-पोषण कानूनों में और अधिक स्पष्टता एवं सख्ती की मांग कर रहे हैं।
निष्कर्ष
यह आवश्यक है कि कानून और समाज के बीच संतुलन बनाया जाए। एक ओर जहां वास्तविक पीड़ित जीवनसाथियों की सुरक्षा सुनिश्चित हो, वहीं दूसरी ओर कानून को आर्थिक लाभ का साधन बनने से रोका जाए।
कानून का उद्देश्य न्याय है, न कि किसी एक पक्ष के लिए अनुचित लाभ का माध्यम।
प्रिया सिंह-अध्यापिका
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