आधा-अधूरा बचपन

कविता

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संजीव-नी।

आधा-अधूरा बचपन।

ईश्वर, आज स्कूल की घंटी से पहले
एक बच्चे ने
रोटी की आवाज़ सुनी,
पर थाली तक
आवाज़ नहीं पहुँची।

उसकी जेब में
कंचे नहीं,
था खालीपन ,
और पेट में
इतनी जगह
कि सपना भी
पूरे का पूरा
समा जाए।

माँ ने कहा
“आज थोड़ा सब्र कर लेना,”
सब्र ने कहा
मैं रोज़ नहीं आता।
बचपन
इन दोनों के बीच
चुपचाप बैठा रहा।

ईश्वर,
किताबें तो मिलीं,
पर अक्षर
भूख में
धुँधले हो गए,
अ आ इ ई
सब
रोटी की कतार में
खड़े दिखे।

आँगनबाड़ी के दरवाज़े पर
धूप बैठी थी,
बच्चा खड़ा था,
और भोजन
किसी काग़ज़ में
देर से आने का
बहाना बन गया।

ईश्वर,
खेलने की उम्र में
उसने
पानी पीकर
पेट भरना सीख लिया,
और खिलौनों की जगह
चुप रहना
इकट्ठा किया।

कहो न,
बचपन का कसूर क्या ?
कि उसे
पूरा भोजन नहीं,
पूरी नींद नहीं,
पूरा भविष्य नहीं मिलता।

अगर तुम कहीं सुनते हो,
तो इतना ही कर देना
किसी बच्चे की थाली में
आज
रोटी पूरी रख देना,
ताकि
उसका भरोसा
अधुरा न रह जाए।

संजीव ठाकु

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