विवेकानंद राज्य युवा पुरस्कार में चयन के बाद नाम हटाने पर बवाल, प्रशासनिक लापरवाही उजागर , सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने दी प्रोत्साहन राशि

......लिखित सूचना व सत्यापन के बावजूद सम्मान से वंचित हुए राष्ट्रीय युवा पुरस्कार विजेता अवधेश कुमार  ।

विवेकानंद राज्य युवा पुरस्कार में चयन के बाद नाम हटाने पर बवाल, प्रशासनिक लापरवाही उजागर , सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने दी प्रोत्साहन राशि

लखनऊ राजधानी लखनऊ में आयोजित विवेकानंद राज्य युवा पुरस्कार से जुड़े एक मामले ने योगी सरकार के युवा कल्याण एवं प्रांतीय रक्षक दल विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मोहनलालगंज क्षेत्र के ग्राम गनेश खेड़ा निवासी राष्ट्रीय युवा पुरस्कार विजेता एवं युवा सामाजिक कार्यकर्ता अवधेश कुमार को विभाग की ओर से लिखित रूप से यह सूचना दी गई थी कि उन्हें विवेकानंद राज्य युवा पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। इस सूचना को उनके वर्षों से किए जा रहे सामाजिक, शैक्षणिक, युवा-हित एवं महिला सशक्तिकरण के कार्यों की औपचारिक स्वीकृति माना गया।
 
इसके बाद उनका सत्यापन भी पूरा किया गया, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि अंतिम सूची जारी होते समय बिना किसी स्पष्ट कारण और पूर्व सूचना के उनका नाम हटा दिया गया। जब अवधेश कुमार ने इस संबंध में विभागीय अधिकारियों से जानकारी लेने और अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का प्रयास किया, तो आरोप है कि योगी सरकार के जिम्मेदार अधिकारियों ने मामले को टालने और दबाने की कोशिश की। इतना ही नहीं, उन्हें आगे शिकायत करने पर विभागीय नुकसान उठाने के संकेत भी दिए गए। इस प्रशासनिक रवैये से न केवल युवाओं में रोष है, बल्कि चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी प्रश्नचिह्न लग गया है।
 
मामला तब और गंभीर हो गया जब यह विषय इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष अवनीश यादव, विवेकानंद यूथ अवॉर्डी विशाल गुप्ता एवं अन्य समाजसेवियों के माध्यम से समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव तक पहुँचा। अखिलेश यादव ने अवधेश कुमार को बुलाकर उनकी बात सुनी और उन्हें ₹51 हजार की प्रोत्साहन राशि प्रदान की। उन्होंने आश्वासन दिया कि इस प्रकरण में शामिल लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई की मांग की जाएगी। अखिलेश यादव ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में योग्य युवाओं के साथ भेदभाव हो रहा है, जो चिंता का विषय है। विभाग की ओर से अब तक इस पूरे मामले में कोई स्पष्ट और लिखित स्पष्टीकरण न दिया जाना प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है। इस मुद्दे को सामने लाने में समाजसेवी नवीन मिश्रा और संदीप वर्मा का भी सहयोग रहा।

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