गरीबों के साथ छलावा सोनभद्र के धूमा गांव में एक परिवार की दर्दनाक दास्तान - 3 सदस्य विकलांग, सरकारी योजनाओं से वंचित

समाजसेवियों की टीम ने किया क्षेत्रों का दौरा, पीड़ित परिवारों का जाना हाल

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दुद्धी क्षेत्र के जोरूखाड़ का हाल, घसिया बस्ती के लोग बेहाल

अजित सिंह / राजेश तिवारी ( ब्यूरो रिपोर्ट) 

सोनभद्र(दुद्धी) / उत्तर प्रदेश-

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले का दुद्धी तहसील जो कहने को तो आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है और जहाँ विभिन्न राजनीतिक दल मंचों से गरीबी, बेबसी और लाचारी दूर करने के बड़े-बड़े वादे करते नहीं थकते, वहाँ की जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। यहाँ शोषित, वंचित और पिछड़ा समाज आज भी ठगा हुआ महसूस कर रहा है। ऐसा ही एक मार्मिक मामला ग्राम धूमा में सामने आया है।

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जहाँ एक ही परिवार के तीन सदस्य विकलांगता का दंश झेल रहे हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ उन तक नहीं पहुँच पाया है। धूमा गांव के निवासी कन्हैया लाल का परिवार गरीबी और दुर्भाग्य का जीता-जागता उदाहरण है। उनके तीन पुत्रों में से एक की तो दिव्यांगता के कारण असमय मृत्यु हो गई। वहीं उनके दो अन्य पुत्र - राकेश कुमार (14 वर्ष) और विकास कुमार (12 वर्ष) भी चलने-फिरने में दिव्यांगता के कारण असमर्थ हैं।

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इस परिवार के पास न तो कोई पक्का घर है न बच्चों के लिए दिव्यांग प्रमाण पत्र और न ही आयुष्मान कार्ड जो उन्हें स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान कर सके। शुक्रवार को दिल्ली से आए सामाजिक कार्यकर्ताओं की एक टीम जब इस परिवार के घर पहुंची, तो जमीनी हकीकत देखकर वे हैरान रह गए। टीम ने पाया कि परिवार आर्थिक तंगहाली में जी रहा है। लकवाग्रस्त दादा की दवा का खर्च, कुछ भगवान भरोसे की खेती-किसानी और सुंगिया देवी (कन्हैया लाल की पत्नी) के सहारे किसी तरह जीने का संघर्ष जारी है।

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इसके बावजूद, परिवार में जीने की उम्मीद की आस अब भी बाकी है। आजादी के 78 वर्ष बाद भी सोनभद्र के इस सुदूर ग्रामीण क्षेत्र में सरकार की जनकल्याणकारी योजनाएं कुपोषित नजर आती हैं। कुपोषित बच्चों को भरपेट पौष्टिक भोजन, स्वास्थ्य विभाग द्वारा सीएचओ, आशा, एएनएम द्वारा घर-घर जाकर दवा वितरण, आंगनबाड़ी कार्यकर्त्री द्वारा बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग के तहत पुष्टाहार जैसी बुनियादी सुविधाएं यहाँ दम तोड़ती दिख रही हैं।

शिक्षा, स्वास्थ्य और चिकित्सा की हालात अत्यंत ही खराब हैं। सड़कों की हालत खंडहर जैसी है, जिससे ग्रामीणों का जीवन और भी मुश्किल हो गया है। स्पष्ट है कि जिम्मेदार लोग अपने कर्तव्यों के प्रति घोर लापरवाही बरत रहे हैं। सुंगिया देवी ने मीडिया को बताया कि उनके पास बच्चों की दवा कराने तक के पैसे नहीं हैं। उन्होंने ग्राम प्रधान को भी अपनी समस्या से अवगत कराया था, लेकिन उन्हें कोई आर्थिक मदद नहीं मिली।

प्रधान ने कथित तौर पर यह कहकर टाल दिया कि 18 वर्ष पूर्ण होने पर ही प्रमाण पत्र मिलेगा। इस लाचारी और बेबसी में परिवार अक्सर चुप रह जाता है, क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी बात कोई सुनने वाला नहीं है।दिल्ली से पहुंची समाजसेवियों की टीम में प्रज्ञा उपाध्याय, योगेश कुमार उपाध्याय, शिवेंद्र नाथ पांडे, धनंजय उपाध्याय, सतेन्द्र पाण्डेय के साथ जितेंद्र चंद्रवंशी और राकेश उर्फ बुल्लू केशरी जैसे सदस्य शामिल थे।

इस टीम ने जब जोरुखाड़ घसीया बस्ती का भी दौरा किया, तो वहाँ भी कुपोषित बच्चे, एनीमिया से पीड़ित महिलाएं और टूटे कच्चे घर देखकर जन कल्याणकारी योजनाओं की विफलता और गरीबों की बेबसी की दास्तां स्पष्ट रूप से सामने आ गई। यह घटना एक बार फिर दर्शाती है कि सरकारी योजनाएं निचले स्तर तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देती हैं, और इसका सीधा खामियाजा समाज के सबसे कमजोर तबके को भुगतना पड़ता है।

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