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“गीता-प्रसार का दिव्य संकल्प, आत्मबोध से लोककल्याण तक” प्रत्युश गुप्ता
यह केवल एक विचार नहीं था, बल्कि संस्कार और साधना का प्रारंभ था
“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते” श्रीमद्भगवद्गीता का यह दिव्य वचन केवल श्लोक नहीं, बल्कि जीवन का सार है।
जब किसी साधारण मन में असाधारण संकल्प जन्म लेता है, तब वह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं रह जाता वह लोकमंगल की दिशा में एक यज्ञ बन जाता है। ऐसा ही एक प्रेरणादायी उदाहरण है सुकीर्ति गुप्ता का, जिन्होंने आत्मज्ञान और भक्ति की ज्योति को जन-जन तक पहुँचाने का अद्भुत प्रयास किया। वर्ष 2022 में उनके अंतर्मन में एक विचार अंकुरित हुआ “क्यों न धर्म और ज्ञान के इस अमृत स्रोत को अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाया जाए?” यह केवल एक विचार नहीं था, बल्कि संस्कार और साधना का प्रारंभ था।
श्रीमद्भगवद्गीता के वितरण का यह संकल्प धीरे-धीरे एक आध्यात्मिक यात्रा में परिवर्तित हो गया। ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद के उपदेशों से प्रेरित होकर उन्होंने समझा कि गीता का मूल उद्देश्य केवल शास्त्र पढ़ना नहीं, बल्कि स्वधर्म को पहचानते हुए कर्मयोग के मार्ग पर चलना है। प्रभुपाद जी का यह संदेश “भगवान को अपने हृदय के केंद्र में स्थापित कर, निष्काम भाव से सेवा करना” उनके इस अभियान का मूल मंत्र बन गया। वर्ष 2023 से उन्होंने एक-एक कर इस दिव्य ग्रंथ को मित्रों, परिजनों, सहकर्मियों और यहाँ तक कि अनजान व्यक्तियों तक भी पहुँचाना प्रारंभ किया। यह केवल पुस्तकों का वितरण नहीं था, बल्कि चेतना का संचार था। जब यह ज्ञान समाज के विभिन्न वर्गों प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर जनसामान्य तक पहुँचा, तब यह प्रयास एक सामाजिक साधना का रूप लेने लगा।
विशेष रूप से बच्चों के बीच गीता के श्लोक और कृष्ण–अर्जुन संवाद को सरल भाषा में प्रस्तुत करना उनके प्रयास का सबसे सुंदर पक्ष रहा। बालमन में जिज्ञासा और श्रद्धा का यह संगम भविष्य के एक सशक्त और संस्कारित समाज की नींव रखता है। लगभग दो वर्षों की निष्ठा , तप और समर्पण के पश्चात 2025 के अंत और 2026 के प्रारंभ तक 101 गीता ग्रंथों का वितरण पूर्ण हुआ। यह संख्या भले ही सीमित लगे, परंतु इसके पीछे छिपी भावना असीम है क्योंकि यह एक “कृष्ण चेतना शतक” है, जो केवल गणना नहीं, बल्कि अनुग्रह का प्रतीक है।
इस यात्रा का सार यही है कि जब कोई व्यक्ति निष्काम कर्म और भक्ति योग के पथ पर अग्रसर होता है, तब स्वयं श्रीकृष्ण उसकी हर बाधा को सरल बना देते हैं। “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” इस सिद्धांत को जीवन में उतारते हुए सुकीर्ति गुप्ता ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्ची सेवा वही है, जिसमें अपेक्षा नहीं, केवल समर्पण होता है। अंततः, यह प्रयास हमें भी प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में सत्य , धर्म और प्रेम को अपनाएँ तथा इस दिव्य ज्ञान को आगे बढ़ाएँ। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ... यही महामंत्र न केवल आत्मा को शुद्ध करता है, बल्कि जीवन को परम शांति की ओर अग्रसर करता है।


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