अवैध जब्ती और जल्दबाज़ी में नीलामी पर राज्य सरकार को झटका

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कम-से-कम 2 लाख मुआवज़े का आदेश दिया

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ब्यूरो प्रयागराज। इलाहाबाद हाRकोर्ट ने कथित गौ-तस्करी के अप्रमाणित आरोप में वाहन जब्त कर जल्दबाज़ी में नीलाम करने पर उत्तर प्रदेश सरकार को फटकार लगाते हुए वाहन स्वामी को कम-से-कम 2 लाख रुपये मुआवज़ा देने का आदेश दिया।

अदालत ने जब्ती और ज़ब्ती से जुड़े आदेश रद्द करते हुए कहा कि राज्य की कार्रवाई मनमानी, अवैध और कानून के विपरीत थी। जस्टिस संदीप जैन ने कहा कि यदि राज्य सरकार वाहन वापस नहीं कर सकती तो उसे वाहन स्वामी को अतिरिक्त 4 लाख रुपये वाहन मूल्य के रूप में देने होंगे।

मामले के अनुसार 8 सितंबर 2024 को चंदौली जिले में पुलिस ने याचिकाकर्ता चंद्रभान कुमार के व्यावसायिक वाहन को कथित गौ-तस्करी की सूचना पर रोका था। वाहन से 10 जीवित गोवंश बरामद होने का दावा करते हुए पुलिस ने उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 तथा पशु क्रूरता निवारण कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी।

जिलाधिकारी ने यह कहते हुए वाहन जब्त कर लिया कि गोवंश को वध के लिए बिहार ले जाया जा रहा था, जबकि वाहन बिहार सीमा के निकट पकड़ा गया। बाद में आयुक्त ने भी जब्ती आदेश बरकरार रखा।

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इसी दौरान, अपील लंबित रहते हुए प्रशासन ने वाहन की नीलामी मात्र 85 हजार रुपये में कर दी जबकि याचिकाकर्ता के अनुसार वाहन का बाजार मूल्य 7 लाख रुपये से अधिक था।

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हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश के भीतर गोवंश के परिवहन के लिए किसी परमिट की आवश्यकता नहीं है और केवल बिहार सीमा के निकट वाहन पकड़े जाने से यह मान लेना कि पशुओं को वध हेतु बाहर ले जाया जा रहा था उचित नहीं है।

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अदालत ने टिप्पणी की, “संदेह चाहे कितना भी प्रबल हो, वह कानूनी प्रमाण का स्थान नहीं ले सकता।” अदालत ने यह भी कहा कि कार्यवाही लंबित रहते वाहन की नीलामी करना और वह भी इतनी कम कीमत पर प्रशासन की स्पष्ट मनमानी को दर्शाता है।

हाईकोर्ट ने माना कि इससे याचिकाकर्ता को गंभीर आर्थिक नुकसान हुआ, क्योंकि वाहन उसकी आजीविका का मुख्य साधन है। पशुओं के प्रति क्रूरता के आरोपों पर भी अदालत ने कहा कि अधिकारियों ने ऐसा कोई ठोस निष्कर्ष दर्ज नहीं किया, जिससे यह साबित हो कि पशुओं को ऐसी शारीरिक चोट पहुंची थी, जिससे उनके जीवन को खतरा है।

हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि राज्य सरकार जब्ती की तारीख से वाहन वापसी तक 15 हजार रुपये प्रतिमाह आर्थिक क्षति के रूप में और 20 हजार रुपये मानसिक पीड़ा व उत्पीड़न के लिए अदा करे।

यदि वाहन वापस नहीं किया जाता है तो सरकार को 4 लाख रुपये वाहन मूल्य के अतिरिक्त अधिकतम 12 माह की अवधि तक मासिक क्षतिपूर्ति भी देनी होगी। अदालत ने राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता भी दी कि वह यह राशि उन अधिकारियों से वसूल सकती है, जिन्होंने मनमानी कार्रवाई को मंजूरी दी थी।

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