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शिक्षा का 'बाजार' या 'संस्कार'—दोषी कौन? व्यवस्था, समाज या मानसिकता?
यदि स्कूल प्रबंधन आर्थिक संतुलन नहीं बनाएगा, तो गुणवत्ता का गिरना तय है
बृजभूषण तिवारी
उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ी है, जहाँ हर पक्ष के पास अपने तर्क हैं और हर दिल में एक शिकायत। गोंडा से शुरू हुआ निजी स्कूलों के विरुद्ध आक्रोश आज पूरे प्रदेश की एक सामूहिक आवाज बन चुका है। लेकिन इस बहस के शोर में क्या हम उस बुनियादी सच को देख पा रहे हैं जो हमारी आँखों के सामने है? यह संपादकीय किसी का पक्ष लेने के लिए नहीं, बल्कि समाज और सरकार के सामने उस आईने को रखने के लिए है जिसमें हम सभी का चेहरा साफ दिखाई दे।

निजी स्कूलों की 'मजबूरी' बनाम 'मनमानी'
हमें धरातल की सच्चाई स्वीकार करनी होगी कि निजी स्कूल बिना किसी 'सरकारी ग्रांट' के चलते हैं। एक संस्थान को चलाने के लिए बिजली के भारी व्यावसायिक बिल, सुरक्षा मानक, आधुनिक लैब और सैकड़ों कर्मचारियों का वेतन—यह सब एक विशाल आर्थिक बोझ है। यदि स्कूल प्रबंधन आर्थिक संतुलन नहीं बनाएगा, तो गुणवत्ता का गिरना तय है।
किन्तु, प्रश्न तब उठता है जब यह 'प्रबंधन' एक 'सिंडिकेट' का रूप ले लेता है। किताबों के नाम पर कमीशनखोरी, हर साल यूनिफॉर्म का बदल जाना और अभिभावकों को विशेष दुकानों का बंधक बनाना—यह 'मजबूरी' नहीं, बल्कि 'नैतिक पतन' है। निजी संस्थानों को समझना होगा कि वे समाज का निर्माण कर रहे हैं, किसी वस्तु का उत्पादन नहीं। मुनाफे की भूख जब शिक्षा की शुचिता को निगलने लगे, तो समाज का आक्रोश स्वाभाविक है।
समाज का विरोधाभास: विरोध की हुंकार, पर निजी का ही प्यार?
संपादकीय का सबसे तीखा सवाल उन अभिभावकों से है जो निजी स्कूलों की फीस पर तो सवाल उठाते हैं, लेकिन अपने ही क्षेत्र के सरकारी प्राथमिक, जूनियर और एडेड विद्यालयों की ओर कदम बढ़ाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। सरकार ने करोड़ों खर्च कर 'ऑपरेशन कायाकल्प' के जरिए स्कूलों को संवारा है। वहां TET/CTET उत्तीर्ण उच्च शिक्षित शिक्षक तैनात हैं, जो योग्यता में किसी भी निजी स्कूल के शिक्षक से कहीं आगे हैं।
फिर भी, एक चपरासी से लेकर बड़े अधिकारी तक का बच्चा निजी कॉन्वेंट की कतार में खड़ा है। जब तक समाज सरकारी व्यवस्था पर विश्वास नहीं जताएगा और वहां अपने बच्चों को नहीं भेजेगा, तब तक निजी स्कूलों का एकाधिकार (Monopoly) खत्म नहीं होगा। हम विरोध तो करते हैं, लेकिन विकल्प के तौर पर अपनी ही सरकारी व्यवस्था को अपनाने का साहस नहीं जुटा पाते।
सरकार की जवाबदेही: नीति बनाम नीयत
सरकार के पास नियम तो कड़े हैं, पर उनका 'धरातल' पर उतरना अभी बाकी है। समय आ गया है कि उत्तर प्रदेश में एक ऐसा साहसी कानून बने कि "समस्त सरकारी सेवकों, जनप्रतिनिधियों और शिक्षकों के बच्चे अनिवार्य रूप से सरकारी स्कूलों में ही पढ़ेंगे।" सोचिए, जिस दिन जिलाधिकारी, बीएसए और पुलिस कप्तान का बच्चा टाट-पट्टी पर बैठकर सरकारी स्कूल में पढ़ेगा, उस दिन वहां की शिक्षा, पंखे, मिड-डे मील और ब्लैकबोर्ड की गुणवत्ता रातों-रात बदल जाएगी। जब व्यवस्था चलाने वालों का निजी हित व्यवस्था से जुड़ेगा, तभी वास्तविक क्रांति आएगी। बिना जवाबदेही के सरकारी स्कूल केवल 'गरीबों का ठिकाना' बनकर रह जाएंगे।
आईना हमारे सामने है
आज शिक्षा का स्तर बच्चे के 'पिता की जेब' तय कर रही है, जो एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। यदि हमें उत्तर प्रदेश के भविष्य को संवारना है, तो तीन स्तरों पर काम करना होगा:स्कूलों को: लाभ की सीमा तय करनी होगी और अनैतिक कमीशनखोरी बंद करनी होगी।समाज को: सरकारी स्कूलों पर भरोसा करना होगा और वहां के प्रबंधन से सवाल पूछने की हिम्मत जुटानी होगी।सरकार को: केवल निर्देश नहीं, बल्कि 'समान शिक्षा संहिता' लागू करनी होगी जहाँ अमीर और गरीब का बच्चा एक ही छत के नीचे पढ़े। शिक्षा कोई व्यापार नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है। यदि आज हमने इस आईने में अपनी कमियों को नहीं देखा, तो आने वाला कल हमें कभी माफ नहीं करेगा।
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