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पराधीनता के विरुद्ध मंगल पांडेय का क्रांतिकारी उद्घोष
उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद के नगवा गाँव में एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में हुआ था
महेन्द्र तिवारी
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर जब भी स्वाभिमान और बलिदान की बात होती है, तो मंगल पांडेय का नाम सबसे अग्रिम पंक्ति में उभरकर आता है। वे उस प्रचंड ज्वाला के प्रथम उद्घोष थे, जिसने दो शताब्दियों से चली आ रही दासता की बेड़ियों को पिघलाने का कार्य प्रारंभ किया था। मंगल पांडेय केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार थे, जिसने सोए हुए राष्ट्र को उसकी अपनी शक्ति और अस्मिता का बोध कराया। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद के नगवा गाँव में एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
धार्मिक संस्कारों और मर्यादाओं के बीच पले-बढ़े मंगल के भीतर राष्ट्रवाद की भावना कूट-कूट कर भरी थी, किंतु परिस्थितियों के वश उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में प्रवेश किया। वे बंगाल की चौंतीसवीं वाहिनी के पैदल सैनिक के रूप में भर्ती हुए। प्रारंभ में उन्होंने अपनी सेवाएँ पूरी निष्ठा के साथ अर्पित कीं, किंतु जैसे-जैसे समय बीतता गया, उन्हें यह आभास होने लगा कि विदेशी शासकों का उद्देश्य केवल शासन करना नहीं, बल्कि भारतीयों की धार्मिक और सांस्कृतिक जड़ों पर प्रहार करना भी है।
उन्नीसवीं शताब्दी का वह कालखंड भारतीय समाज के लिए अत्यंत संवेदनशील था। आंग्ल शासक अपनी सत्ता के मद में चूर होकर भारतीय जनमानस की भावनाओं की निरंतर अनदेखी कर रहे थे। इसी बीच सेना में एक नई बंदूक का आगमन हुआ, जिसे भरने की प्रक्रिया ने विद्रोह की आधारशिला रख दी। उस समय यह समाचार तीव्र गति से फैला कि बंदूक के नए कारतूसों को चिकना बनाने के लिए गाय और सुअर की चर्बी का मिश्रण प्रयोग किया गया है।
हिंदू धर्म में गाय को माता माना जाता है और वह परम पूज्य है, जबकि इस्लाम में सुअर को वर्जित माना गया है। ऐसे में यह केवल एक सैन्य परिवर्तन नहीं था, बल्कि प्रत्यक्ष रूप से सैनिकों के धर्म को भ्रष्ट करने का एक सोची-समझी षड्यंत्र प्रतीत होता था। मंगल पांडेय जैसे धर्मनिष्ठ सैनिक के लिए यह असहनीय था। उन्होंने इसे अपनी आस्था और पूर्वजों की मर्यादा पर एक भीषण प्रहार माना। सैनिकों के भीतर असंतोष की अग्नि सुलग रही थी, किंतु मंगल पांडेय ने उस अग्नि को मार्ग दिखाने का निर्णय लिया।
मार्च के अंतिम दिनों में बैरकपुर की छावनी में वातावरण अत्यंत तनावपूर्ण हो गया था। 26 मार्च 1857 का वह दिन भारत के भाग्य को बदलने वाला सिद्ध हुआ। मंगल पांडेय ने अपनी वर्दी पहनी, अपनी बंदूक उठाई और परेड के मैदान में पहुँच गए। उनका मुख मंडल क्रोध और संकल्प से दीप्तिमान था। उन्होंने अपने साथियों का आह्वान किया और चिल्लाकर कहा कि 'फिरंगियों' के सामने झुकना बंद करो।
उन्होंने अपने सहकर्मियों से अपनी धर्म-रक्षा के लिए शस्त्र उठाने को कहा। जब उनके वरिष्ठ अधिकारी मेजर ह्यूसन ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, तो मंगल की बंदूक से निकली पहली गोली ने उस अधिकारी को धूल चटा दी। यह केवल एक गोली नहीं थी, बल्कि यह विदेशी साम्राज्य के अंत की घोषणा थी। इसके पश्चात लेफ्टिनेंट बॉघ भी उन्हें पकड़ने के लिए आगे बढ़े, किंतु मंगल के साहस के सामने वे भी टिक न सके। मंगल पांडेय ने अदम्य वीरता का परिचय देते हुए अकेले ही ब्रिटिश अधिकारियों का सामना किया।
छावनी के अन्य सैनिक इस दृश्य को देख रहे थे, किंतु उनमें से अधिकांश ने अपने ही साथी के विरुद्ध शस्त्र उठाने से इनकार कर दिया। यह इस बात का प्रमाण था कि मंगल की आवाज़ ने उनके भीतर सोए हुए राष्ट्रवाद को जगा दिया था। जब अंग्रेजी सेना के घेरे ने मंगल को चारों ओर से घेर लिया और उन्हें लगा कि वे अब शत्रुओं के चंगुल में फँस जाएंगे, तो उन्होंने आत्मसमर्पण करने के स्थान पर स्वयं के प्राणों की आहुति देने का निर्णय लिया। उन्होंने अपनी ही बंदूक से अपनी छाती पर गोली चला दी, ताकि वे जीवित रहते हुए अंग्रेजों के दास न बन सकें।
यद्यपि वे इस प्रयास में केवल घायल हुए और उन्हें उपचार के बाद बंदी बना लिया गया, किंतु उनका यह कृत्य भारतीय इतिहास की एक युगांतकारी घटना बन गया। अस्पताल में रहने के दौरान और उसके बाद के परीक्षणों के समय भी मंगल पांडेय अडिग रहे। उनसे उन लोगों के नाम पूछे गए जो इस विद्रोह में उनके साथ थे, किंतु उन्होंने किसी भी साथी का नाम उजागर नहीं किया और सारा उत्तरदायित्व स्वयं पर ले लिया।
उन पर त्वरित सैन्य न्यायालय में अभियोग चलाया गया और उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई गई। फांसी की तिथि 18 अप्रैल नियत की गई थी, किंतु ब्रिटिश शासन उनके प्रभाव से इतना भयभीत था कि उन्हें डर था कि कहीं पूरी सेना विद्रोह न कर दे। इसी आशंका और भय के कारण, निर्धारित तिथि से 10 दिन पूर्व ही 8 अप्रैल 1857 को मंगल पांडेय को बैरकपुर में फांसी दे दी गई।
यह उल्लेख करना भी महत्वपूर्ण है कि बैरकपुर के जल्लादों ने मंगल पांडेय को फांसी देने से मना कर दिया था, जिसके कारण बाहर से जल्लाद बुलाए गए। फांसी के फंदे को चूमते समय उनके मुख पर कोई ग्लानि नहीं थी, बल्कि एक असीम शांति थी कि उन्होंने अपने धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।
मंगल पांडेय के बलिदान ने संपूर्ण भारत में एक ऐसी लहर पैदा की, जिसकी कल्पना आंग्ल शासकों ने कभी नहीं की थी। कुछ ही हफ्तों के भीतर, मेरठ, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ और झांसी जैसे क्षेत्रों में विद्रोह की ज्वाला फैल गई। 1857 का महान विप्लव, जिसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है, वास्तव में मंगल पांडेय की उसी एक गोली का विस्तार था।
उन्हें अक्सर एक विद्रोही सैनिक के रूप में चित्रित किया जाता रहा, किंतु भारतीय दृष्टिकोण से वे एक राष्ट्रनायक और क्रांति के अग्रदूत थे। उनके द्वारा जलाई गई ज्योति ने आगामी नौ दशकों तक भारतीय स्वाधीनता सेनानियों का मार्ग प्रशस्त किया। सुभाष चंद्र बोस से लेकर भगत सिंह तक, प्रत्येक क्रांतिकारी ने मंगल पांडेय के बलिदान से प्रेरणा प्राप्त की।
इतिहासकारों का एक वर्ग यह तर्क देता है कि 1857 का विद्रोह केवल धार्मिक कारणों से हुआ था, किंतु मंगल पांडेय का कृत्य यह स्पष्ट करता है कि यह आत्म-सम्मान की लड़ाई थी। वे जानते थे कि एक शक्तिशाली साम्राज्य के विरुद्ध अकेले खड़ा होना मृत्यु को निमंत्रण देना है, फिर भी वे पीछे नहीं हटे।
उनका यह साहस यह संदेश देता है कि जब बात धर्म, संस्कृति और राष्ट्र के गौरव की हो, तो संख्या बल कोई महत्व नहीं रखता। मंगल पांडेय ने भारतीय सैनिकों के मन से अंग्रेजों के अजेय होने का भ्रम तोड़ दिया था। उन्होंने सिद्ध कर दिया था कि शौर्य और संकल्प के बल पर किसी भी सत्ता को चुनौती दी जा सकती है।
आज भी मंगल पांडेय का नाम प्रत्येक भारतीय के हृदय में देशभक्ति का संचार करता है। वे केवल एक ऐतिहासिक पात्र नहीं हैं, बल्कि वे अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध के प्रतीक हैं। भारत की स्वतंत्रता के पश्चात, उन्हें वह सम्मान प्राप्त हुआ जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे। उनकी स्मृति में स्मारक बनाए गए और उनके जीवन गाथा को विद्यालयों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया गया ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि आजादी की यह नींव किन पत्थरों पर टिकी है। मंगल पांडेय का जीवन हमें सिखाता है कि व्यक्ति नश्वर है, किंतु राष्ट्र के लिए दिया गया उसका बलिदान अमर होता है।
उन्होंने जिस चिंगारी को जन्म दिया था, उसी ने अंततः 1947 में उस विशाल साम्राज्य को भस्म कर दिया जिसका सूर्य कभी अस्त नहीं होता था। भारत के इतिहास में मंगल पांडेय सदैव उस प्रथम सेनानी के रूप में पूजे जाएंगे, जिसने भारतीयता के गौरव को सर्वोपरि रखा और हंसते-हंसते मृत्यु का वरण किया। उनका वह गर्जन आज भी बैरकपुर की हवाओं में सुनाई देता है, जो हमें निरंतर स्मरण कराता रहता है कि स्वतंत्रता का मूल्य क्या है और इसे अक्षुण्ण रखने के लिए किस स्तर के त्याग की आवश्यकता होती है।
निष्कर्षतः, मंगल पांडेय ने 1857 में जो साहस दिखाया, वह किसी चमत्कार से कम नहीं था। एक ऐसे समय में जब संपूर्ण आर्यावर्त विदेशी शासन के नीचे दबा हुआ था, उन्होंने अकेले खड़े होकर उस व्यवस्था को झकझोर दिया। उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया; इसने देश की चेतना को ऐसा जगाया कि फिर भारत कभी चैन से नहीं बैठा जब तक कि अंतिम अंग्रेज यहाँ से चला नहीं गया। मंगल पांडेय मात्र एक नाम नहीं, अपितु भारतीय शौर्य की वह पराकाष्ठा है जिसे युगों-युगों तक विस्मृत नहीं किया जा सकता। वे सदैव हमारे वंदनीय रहेंगे।


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