बदलते परिवेश में स्वास्थ्य चुनौतियां
इसी वैज्ञानिक दृष्टिकोण को वैश्विक सहयोग के साथ जोड़ने की एक सशक्त पुकार है
महेन्द्र तिवारी
विश्व स्वास्थ्य दिवस प्रत्येक वर्ष 7 अप्रैल को मनाया जाता है, जो न केवल स्वास्थ्य के प्रति चेतना जगाने का कार्य करता है, बल्कि एक स्वस्थ समाज के निर्माण की दिशा में सामूहिक प्रयासों को भी प्रेरित करता है। इस विशेष दिन की नींव 7 अप्रैल 1948 को विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्थापना के साथ रखी गई थी, और इसे आधिकारिक रूप से पहली बार 1950 में मनाया गया। वर्ष 2026 में, जब दुनिया तकनीकी और वैज्ञानिक प्रगति के एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है, विश्व स्वास्थ्य दिवस की थीम “Together for health. Stand with science” यानी "स्वास्थ्य के लिए एकजुट। विज्ञान के साथ खड़े रहें" निर्धारित की गई है।
यह थीम एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ पर हमारे सामने आई है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य संबंधी सूचनाओं, मिथकों और वैज्ञानिक तथ्यों के बीच एक निरंतर संघर्ष देखा गया है। यह विषय हमें इस बात के लिए प्रोत्साहित करता है कि हम अपने जीवन और स्वास्थ्य के प्रति निर्णय लेते समय भावनाओं या अफवाहों के बजाय साक्ष्य-आधारित विज्ञान को आधार बनाएं। विज्ञान ही वह प्रकाश है जिसने मानवता को सबसे अंधेरे समय में रास्ता दिखाया है, और 2026 का यह अभियान इसी वैज्ञानिक दृष्टिकोण को वैश्विक सहयोग के साथ जोड़ने की एक सशक्त पुकार है।
इतिहास देखें तो वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग की यात्रा 19वीं शताब्दी के मध्य में शुरू हुई थी। वर्ष 1851 में पेरिस में आयोजित पहला अंतरराष्ट्रीय स्वच्छता सम्मेलन इस दिशा में पहला बड़ा कदम था, जिसका उद्देश्य हैजा जैसी संक्रामक बीमारियों के प्रसार को रोकना था। इसके बाद 1902 में पैन-अमेरिकन सैनिटरी ब्यूरो और 1907 में ऑफिस इंटरनेशनल डी'हाइजीन पब्लिक जैसे संगठनों ने अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य सहयोग की नींव को और मजबूत किया। द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के बाद जब संयुक्त राष्ट्र का गठन हुआ, तब यह महसूस किया गया कि एक ऐसी वैश्विक संस्था की आवश्यकता है जो बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के पूरी मानवता के स्वास्थ्य की रक्षा कर सके। परिणामस्वरूप, 1946 में न्यूयॉर्क में आयोजित अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य सम्मेलन में विश्व स्वास्थ्य संगठन के संविधान पर 61 देशों ने हस्ताक्षर किए और अंततः 7 अप्रैल 1948 को यह संगठन अस्तित्व में आया।
वर्तमान में विश्व स्वास्थ्य संगठन के 194 सदस्य देश हैं, जो दुनिया भर में "Health for All" के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की सबसे बड़ी सफलता 1980 में चेचक (Smallpox) का वैश्विक उन्मूलन रही है, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि यदि दुनिया विज्ञान के साथ एकजुट होकर खड़ी हो, तो किसी भी असाध्य बीमारी को जड़ से मिटाया जा सकता है। इसके अलावा, पोलियो के मामलों में 99 प्रतिशत से अधिक की कमी, एचआईवी/एड्स के उपचार में प्रगति और हाल के वर्षों में मलेरिया के पहले टीके (RTS,S/AS01) की मंजूरी विज्ञान की ही गौरवशाली उपलब्धियां हैं।
वर्ष 2026 की थीम "Stand with science" केवल एक नारा नहीं है, बल्कि यह वर्तमान समय की अनिवार्य आवश्यकता है। आधुनिक युग में डिजिटल मीडिया के विस्तार के साथ स्वास्थ्य संबंधी गलत सूचनाएं (Infodemic) एक नई महामारी की तरह उभरी हैं। टीकाकरण से लेकर कैंसर के उपचार तक, लोग अक्सर वैज्ञानिक प्रमाणों के स्थान पर अवैज्ञानिक दावों की ओर आकर्षित हो जाते हैं। ऐसे में यह थीम दुनिया को याद दिलाती है कि विज्ञान ने ही हमें टीके, एंटीबायोटिक्स, उन्नत सर्जिकल तकनीक और जीवन रक्षक दवाएं दी हैं। वैज्ञानिक अनुसंधान के प्रति सम्मान और शोध में निवेश ही वह मार्ग है जिससे भविष्य की महामारियों को रोका जा सकता है।
इसके साथ ही, 2026 का अभियान "One Health" दृष्टिकोण पर बहुत अधिक जोर देता है। विज्ञान हमें बताता है कि मनुष्यों का स्वास्थ्य अकेले नहीं सुधारा जा सकता, क्योंकि यह पशुओं और हमारे साझा पर्यावरण के स्वास्थ्य से गहराई से जुड़ा हुआ है। डेटा बताते हैं कि मनुष्यों में होने वाली लगभग 75 प्रतिशत नई उभरती संक्रामक बीमारियां 'ज़ूनोटिक' होती हैं, यानी वे जानवरों से मनुष्यों में फैलती हैं। इसलिए, जब हम विज्ञान के साथ खड़े होने की बात करते हैं, तो इसमें पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण, जैव-विविधता की रक्षा और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझना भी शामिल है।
आज वैश्विक स्वास्थ्य के सामने चुनौतियां पहले से कहीं अधिक जटिल हैं। गैर-संचारी रोग जैसे हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर और श्वसन संबंधी बीमारियां वर्तमान में दुनिया भर में होने वाली कुल मौतों का लगभग 74 प्रतिशत हिस्सा हैं। डेटा के अनुसार, प्रत्येक वर्ष लगभग 41 मिलियन लोग इन बीमारियों के कारण अपनी जान गंवाते हैं, जिनमें से 17 मिलियन मौतें 70 वर्ष की आयु से पहले ही हो जाती हैं। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि हमारी जीवनशैली और वैज्ञानिक परामर्श की अनदेखी हमें किस ओर ले जा रही है। विशेष रूप से मधुमेह की समस्या एक वैश्विक संकट बन चुकी है, जिससे दुनिया भर में 530 मिलियन से अधिक लोग प्रभावित हैं और यह संख्या 2045 तक बढ़कर 780 मिलियन होने का अनुमान है।
मानसिक स्वास्थ्य भी एक ऐसा क्षेत्र है जिस पर 2026 के इस अभियान में विशेष ध्यान दिया जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 8 में से 1 व्यक्ति किसी न किसी मानसिक विकार के साथ जी रहा है। डिप्रेशन और चिंता न केवल व्यक्ति के जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी हर साल खरबों डॉलर का नुकसान पहुंचाते हैं। "Stand with science" का संदेश हमें यह समझने के लिए प्रेरित करता है कि मानसिक रोग भी शारीरिक रोगों की तरह ही वैज्ञानिक उपचार और सामाजिक समर्थन के पात्र हैं।
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए विश्व स्वास्थ्य दिवस का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। भारत ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है, जैसे 2014 में पोलियो मुक्त घोषित होना और हाल के वर्षों में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में महत्वपूर्ण गिरावट दर्ज करना। हालांकि, चुनौतियां अभी भी शेष हैं। भारत की एक बड़ी आबादी अभी भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है जहां गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच एक संघर्ष है। डेटा बताते हैं कि भारत में गैर-संचारी रोगों का बोझ तेजी से बढ़ रहा है और यह कुल मौतों के 60 प्रतिशत से अधिक के लिए जिम्मेदार है।
आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं स्वास्थ्य सेवा को लोकतांत्रिक बनाने का प्रयास कर रही हैं, लेकिन वैज्ञानिक जागरूकता की कमी अभी भी एक बाधा है। 2026 की थीम भारतीय संदर्भ में इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हमें स्वच्छता, पोषण और संक्रामक रोगों के नियंत्रण के लिए वैज्ञानिक सोच को जमीनी स्तर तक ले जाने की आवश्यकता है। स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन जैसे कार्यक्रम सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं, क्योंकि अशुद्ध पानी और स्वच्छता की कमी के कारण होने वाली बीमारियां अभी भी विकासशील देशों में मृत्यु का एक बड़ा कारण हैं।
पर्यावरण और स्वास्थ्य के अंतर्संबंधों को वैज्ञानिक रूप से समझना अब और भी जरूरी हो गया है। वायु प्रदूषण को ही लें, जो प्रतिवर्ष वैश्विक स्तर पर लगभग 7 मिलियन अकाल मौतों के लिए जिम्मेदार है। यह न केवल फेफड़ों की बीमारियों बल्कि हृदय रोग और स्ट्रोक का भी एक प्रमुख कारक है। जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में वृद्धि हो रही है, जिससे मलेरिया और डेंगू जैसे मच्छरों से फैलने वाले रोगों का भौगोलिक विस्तार हो रहा है।
विज्ञान हमें चेतावनी दे रहा है कि यदि हमने पर्यावरण के प्रति अपनी नीतियों में बदलाव नहीं किया, तो आने वाले दशकों में स्वास्थ्य प्रणालियां ढह सकती हैं। 2026 का अभियान सरकारों और अंतरराष्ट्रीय निकायों को इस बात के लिए प्रेरित करता है कि वे स्वास्थ्य नीतियों को जलवायु क्रिया के साथ जोड़ें। यदि हमें सतत विकास लक्ष्यों, विशेषकर तीसरे लक्ष्य 'स्वस्थ जीवन और खुशहाली' को साकार करना है, तो वैज्ञानिक नवाचार और वैश्विक समन्वय का मार्ग अपनाना आज की अनिवार्य आवश्यकता है।
विश्व स्वास्थ्य दिवस का आयोजन केवल बड़े भाषणों या सम्मेलनों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे एक जन आंदोलन का रूप लेना चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में जब विद्यार्थियों को वैज्ञानिक सिद्धांतों और स्वास्थ्य के महत्व के बारे में सिखाया जाता है, तो वे आने वाली पीढ़ी के लिए एक मजबूत नींव रखते हैं। स्वास्थ्य शिविरों, टीकाकरण अभियानों और मुफ्त जांच कार्यक्रमों के माध्यम से इस दिन की सार्थकता को जमीन पर उतारा जाता है।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य की जिम्मेदारी स्वयं लेनी होगी। संतुलित आहार, नियमित शारीरिक व्यायाम, पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन जैसी छोटी-छोटी चीजें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तरीके हैं जिनसे हम एक लंबी और स्वस्थ आयु प्राप्त कर सकते हैं। हमें यह समझना होगा कि आधुनिक तकनीक और दवाएं केवल बीमारी के उपचार में मदद करती हैं, जबकि स्वस्थ जीवनशैली बीमारी को रोकने का सबसे प्रभावी वैज्ञानिक तरीका है।
अंततः, विश्व स्वास्थ्य दिवस हमें याद दिलाता है कि एक स्वस्थ शरीर में ही एक स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है और एक स्वस्थ समाज ही प्रगतिशील राष्ट्र का निर्माण कर सकता है। हमें इस दिन यह संकल्प लेना चाहिए कि हम विज्ञान के प्रति अपनी आस्था बनाए रखेंगे, भ्रामक सूचनाओं से बचेंगे और स्वास्थ्य को अपने जीवन की सर्वोच्च प्राथमिकता बनाएंगे। स्वास्थ्य ही वह आधार है जिस पर हमारे सभी सपने और सफलताएं टिकी हैं। यदि हम विज्ञान और सहयोग के हाथ थामकर आगे बढ़ेंगे, तो निश्चित रूप से हम एक ऐसी दुनिया का निर्माण कर पाएंगे जहां "Health for All" केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक वास्तविकता होगी। यह दिवस हमें निरंतर यह प्रेरणा देता रहे कि स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक धरोहर है जिसे हमें वैज्ञानिक सोच और एकजुटता के साथ सुरक्षित रखना है।


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