राजनीति
समान नागरिक संहिता का गुजरात मॉडल: एक देश एक कानून की दिशा में निर्णायक कदम
सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में प्रयास करने का निर्देश देता है।
गुजरात विधानसभा में पारित ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) विधेयक, 2026’ केवल एक कानून नहीं, बल्कि भारतीय समाज की संरचना में एक व्यापक बदलाव का संकेत है। यह विधेयक उस लंबे विमर्श का परिणाम है, जो दशकों से “समान नागरिक कानून” की अवधारणा को लेकर देश में चलता रहा है। अब गुजरात ने इस दिशा में ठोस पहल करते हुए विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और लिव-इन संबंधों जैसे व्यक्तिगत मामलों में एक समान कानूनी ढांचा लागू करने का साहसिक निर्णय लिया है। यह कदम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 की भावना के अनुरूप है, जो राज्य को सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में प्रयास करने का निर्देश देता है।
मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल द्वारा प्रस्तुत इस विधेयक का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कानून के सामने सभी नागरिक समान हों, चाहे उनका धर्म, आस्था या परंपरा कुछ भी हो। लंबे समय से भारत में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू होते रहे हैं, जिनमें विवाह, तलाक और संपत्ति से जुड़े नियम भिन्न-भिन्न रहे हैं। इससे कई बार सामाजिक और कानूनी असमानताएं उत्पन्न होती रही हैं, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के अधिकारों के संदर्भ में। यूसीसी इन असमानताओं को समाप्त करने की दिशा में एक ठोस कदम माना जा रहा है।
इस विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह सार्वजनिक कानून के रूप में सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होगा। इसका मतलब यह है कि अब व्यक्तिगत मामलों में भी राज्य एक समान नियम लागू करेगा, जिससे कानून की व्याख्या और क्रियान्वयन में एकरूपता आएगी। विवाह का अनिवार्य पंजीकरण, तलाक के लिए समान प्रक्रिया, और उत्तराधिकार में पुत्र-पुत्री को समान अधिकार—ये सभी प्रावधान इस बात को स्पष्ट करते हैं कि कानून अब व्यक्ति की धार्मिक पहचान के बजाय उसकी नागरिक पहचान को प्राथमिकता देगा।
विधेयक में लिव-इन संबंधों को भी कानूनी दायरे में लाया गया है, जो आधुनिक समाज की बदलती वास्तविकताओं को स्वीकार करने का संकेत है। ऐसे संबंधों का एक महीने के भीतर पंजीकरण अनिवार्य किया गया है, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी और विवादों की स्थिति में कानूनी संरक्षण उपलब्ध होगा। यह प्रावधान विशेष रूप से महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि अनौपचारिक संबंधों में अक्सर महिलाएं कानूनी सुरक्षा से वंचित रह जाती थीं।
यूसीसी का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाया गया है। अब किसी भी विवाह को तभी वैध माना जाएगा, जब दोनों पक्षों में से किसी का कोई जीवित जीवनसाथी न हो। यह प्रावधान न केवल कानूनी स्पष्टता प्रदान करता है, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। इसके अलावा, विधेयक में यह भी स्पष्ट किया गया है कि कोर्ट के बाहर लिए गए तलाक को मान्यता नहीं दी जाएगी, जिससे मनमाने और एकतरफा निर्णयों पर रोक लगेगी।
हालांकि यह कानून व्यापक रूप से लागू किया गया है, लेकिन अनुसूचित जनजातियों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। यह निर्णय उनकी पारंपरिक जीवनशैली और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से लिया गया है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि सरकार ने समानता और सांस्कृतिक विविधता के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है।
गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी ने विधानसभा में चर्चा के दौरान स्पष्ट किया कि यह विधेयक किसी धर्म या आस्था के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय और समानता को सुनिश्चित करने का प्रयास है। उन्होंने यह भी बताया कि इस विधेयक को तैयार करने से पहले व्यापक जनपरामर्श किया गया, जिसमें लगभग 20 लाख सुझाव प्राप्त हुए। इनमें से अधिकांश सुझाव इस कानून के समर्थन में थे, जो यह दर्शाता है कि समाज में एक समान कानून की आवश्यकता को लेकर व्यापक सहमति बन रही है।
इस विधेयक के निर्माण में रंजना देसाई की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों को आधार बनाया गया है। यह तथ्य इस कानून को और अधिक विश्वसनीय बनाता है, क्योंकि इसमें न्यायिक दृष्टिकोण और विशेषज्ञता का समावेश है। समिति ने विभिन्न पहलुओं का गहन अध्ययन कर यह सुनिश्चित किया कि कानून व्यावहारिक, न्यायसंगत और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप हो।
यूसीसी के तहत नियमों के उल्लंघन पर सख्त दंड का प्रावधान भी किया गया है। पंजीकरण नहीं कराने पर जुर्माना, बहुविवाह या धोखाधड़ी के मामलों में कठोर सजा, और अवैध तलाक पर दंड—ये सभी प्रावधान यह सुनिश्चित करते हैं कि कानून केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि उसका प्रभावी क्रियान्वयन भी हो।
गुजरात का यह कदम राष्ट्रीय स्तर पर भी एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। यह दर्शाता है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक सहमति हो, तो समान नागरिक संहिता जैसे जटिल विषय पर भी ठोस प्रगति की जा सकती है। आने वाले समय में यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है और देशव्यापी यूसीसी लागू करने की दिशा में मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
अंततः, यह कहा जा सकता है कि गुजरात में पारित यूसीसी विधेयक भारतीय लोकतंत्र के विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। यह कानून न केवल समानता और न्याय के सिद्धांतों को मजबूत करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि हर नागरिक को उसकी धार्मिक पहचान से परे एक समान कानूनी अधिकार मिले। यदि इसका प्रभावी क्रियान्वयन होता है, तो यह समाज में समरसता, न्याय और एकता को नई दिशा दे सकता है।
कांतिलाल मांडोत
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