अग्नि त्रासदियों का डरावना सच दिल्ली इंदौर से सूरत तक आग की घटनाओं ने सुरक्षा व्यवस्था पर उठाए गंभीर सवाल

यदि सुरक्षा मानकों की अनदेखी की जाए तो घर ही लाक्षागृह बन जाते हैं जहां से निकलना लगभग असंभव हो जाता है।

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देश में तेजी से आधुनिक सुविधाएं बढ़ रही हैं लेकिन इनके साथ सुरक्षा के खतरे भी उतनी ही तेजी से बढ़ रहे हैं। हाल ही में दिल्ली और इंदौर में हुए दो भीषण अग्निकांडों ने पूरे देश को झकझोर दिया। इन हादसों में 5 मासूम बच्चों सहित कुल 17 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई। इन घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि यदि सुरक्षा मानकों की अनदेखी की जाए तो घर ही लाक्षागृह बन जाते हैं जहां से निकलना लगभग असंभव हो जाता है।
 
इंदौर के ग्रेटर बृजेश्वरी इलाके में तड़के करीब चार बजे एक इलेक्ट्रिक कार चार्जिंग के दौरान अचानक शॉर्ट सर्किट हुआ। यह आग इतनी तेजी से फैली कि देखते ही देखते तीन मंजिला मकान उसकी चपेट में आ गया। घर के भीतर सो रहे लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। आग पहले पार्किंग से होते हुए बिजली के तारों और एयर कंडीशनर तक पहुंची और फिर धमाकों का सिलसिला शुरू हो गया। बाद में सिलेंडर विस्फोट ने स्थिति को और भयावह बना दिया।
 
इस घर में मनोज पुगलिया का परिवार रहता था और उस दिन उनके रिश्तेदार भी बिहार से आए हुए थे। परिवार में खुशियों का माहौल था क्योंकि एक महीने पहले ही उनके बेटे सोमिल की शादी हुई थी। गणगौर के अवसर पर बहू अपने मायके गई हुई थी, वरना वह भी इस हादसे की शिकार हो सकती थी। आग की लपटों में मनोज की गर्भवती बहू सिमरन सहित आठ लोगों की जान चली गई। यह हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं बल्कि कई स्तरों पर लापरवाही का परिणाम था।
 
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार सुबह मॉर्निंग वॉक पर निकले एक व्यक्ति ने सबसे पहले आग देखी और लोगों को जगाया। आसपास के लोगों ने बिजली सप्लाई बंद करने की कोशिश की लेकिन तब तक आग फैल चुकी थी। कार और एसी कंप्रेसर में विस्फोट होने लगे जिससे दहशत और बढ़ गई। फायर ब्रिगेड को सूचना दी गई लेकिन लोगों का आरोप है कि वह देर से पहुंची और आग पर काबू पाने में ढाई घंटे लग गए।
 
इस हादसे में एक और गंभीर पहलू सामने आया। घर में लगे इलेक्ट्रिक स्मार्ट लॉक के कारण लोग बाहर नहीं निकल पाए। बिजली बंद होने के बाद लॉक सिस्टम फेल हो गया और दरवाजे नहीं खुल सके। यह आधुनिक सुविधा उस समय जानलेवा साबित हुई जब इसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम तकनीक पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो रहे हैं बिना उसके जोखिम समझे।
 
दूसरी ओर दिल्ली के पालम इलाके में एक बहुमंजिला इमारत में लगी आग ने नौ लोगों की जान ले ली। यहां भी स्थिति बेहद भयावह थी। इमारत के ग्राउंड फ्लोर पर कपड़ों और कॉस्मेटिक्स का शोरूम था जहां से आग शुरू हुई और तेजी से ऊपर की मंजिलों तक फैल गई। संकरी गलियों और अपर्याप्त निकासी मार्ग के कारण लोग फंस गए। धुएं और आग ने बाहर निकलने का रास्ता पूरी तरह बंद कर दिया।
 
हादसे के दौरान लोगों ने अपने बच्चों को बचाने के लिए उन्हें नीचे खड़े लोगों की ओर फेंका। यह दृश्य जितना दर्दनाक था उतना ही भयावह भी। कुछ बच्चों को बचा लिया गया लेकिन कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। यह घटना शहरी इलाकों में बढ़ती अव्यवस्थित निर्माण व्यवस्था और सुरक्षा मानकों की अनदेखी की ओर इशारा करती है।
 
ऐसी घटनाएं अब अपवाद नहीं रहीं बल्कि एक खतरनाक प्रवृत्ति का रूप लेती जा रही हैं। हाल ही में सूरत के टेक्सटाइल मार्केट में भी भीषण आग लगी थी जिसमें करोड़ों का नुकसान हुआ। यह आग भी तेजी से फैली और फायर सिस्टम की सीमाओं को उजागर कर गई। इसके अलावा पिछले कुछ महीनों में मुंबई, अहमदाबाद, कोलकाता और नोएडा जैसे शहरों में भी कई बड़े अग्निकांड सामने आए हैं। कहीं अस्पतालों में आग लगी तो कहीं फैक्ट्रियों और गोदामों में। हर घटना के बाद जांच और मुआवजे की घोषणा होती है लेकिन जमीनी स्तर पर सुधार बहुत धीमा है।
 
इन सभी घटनाओं में एक समानता साफ दिखाई देती है। अधिकतर जगहों पर अग्निशमन उपकरण या तो मौजूद नहीं थे या काम नहीं कर रहे थे। निकासी मार्ग अवरुद्ध थे या अपर्याप्त थे। बिजली के तारों का रखरखाव सही नहीं था और ज्वलनशील सामग्री का अत्यधिक उपयोग किया गया था। इसके अलावा आधुनिक उपकरण जैसे स्मार्ट लॉक और इलेक्ट्रिक चार्जिंग सिस्टम बिना उचित सुरक्षा व्यवस्था के उपयोग किए जा रहे हैं।
 
अगर इन हादसों से पहले की स्थिति को देखें तो हर जगह सामान्य जीवन चल रहा था। इंदौर में परिवार शादी की खुशियों में डूबा हुआ था। दिल्ली में लोग अपने रोजमर्रा के काम में व्यस्त थे। सूरत में व्यापारी अपने कारोबार में लगे थे। किसी ने नहीं सोचा था कि कुछ ही मिनटों में सब कुछ बदल जाएगा। यही इन हादसों की सबसे बड़ी त्रासदी है कि ये अचानक होते हैं और संभलने का मौका नहीं देते।
 
इन घटनाओं से यह स्पष्ट है कि केवल सरकार या प्रशासन को दोष देना पर्याप्त नहीं है। आम नागरिकों को भी जागरूक होना होगा। घरों में फायर सेफ्टी उपकरण जैसे अग्निशामक यंत्र, स्मोक अलार्म और आपातकालीन निकासी योजना होना जरूरी है। इलेक्ट्रिक उपकरणों का नियमित निरीक्षण किया जाना चाहिए। ईवी चार्जिंग के लिए सुरक्षित और मानक व्यवस्था अपनानी चाहिए। स्मार्ट लॉक जैसे उपकरणों में मैनुअल ओपनिंग सिस्टम जरूर होना चाहिए।
 
प्रशासन को भी बिल्डिंग निर्माण के नियमों को सख्ती से लागू करना होगा। फायर सेफ्टी ऑडिट को अनिवार्य और नियमित बनाना होगा। संकरी गलियों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में विशेष व्यवस्था करनी होगी ताकि आपात स्थिति में राहत कार्य तेजी से हो सके। फायर ब्रिगेड की संख्या और संसाधनों में भी वृद्धि जरूरी है।दिल्ली और इंदौर की घटनाएं केवल दो शहरों की कहानी नहीं हैं बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी हैं। अगर अब भी हम नहीं चेते तो ऐसे हादसे बार बार दोहराए जाएंगे और निर्दोष लोग अपनी जान गंवाते रहेंगे। आधुनिकता और सुविधा के साथ सुरक्षा को प्राथमिकता देना अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन चुका है।
 
कांतिलाल मांडोत

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