संस्थागत साख और सत्ता का खेल

Swatantra Prabhat UP Picture
Published On

महेन्द्र तिवारी


एक समय था जब राजनीति को महज विचारधाराओं का टकराव माना जाता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जो हमने देखा है, वह किसी साधारण राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से कहीं अधिक गहरा और भयावह है। इसे केवल एक व्यवस्था की विफलता नहीं कहा जा सकता, बल्कि यह एक सुनियोजित ढांचे का हिस्सा प्रतीत होता है, जहां सत्ता के गलियारों में बैठकर यह तय किया गया कि लोकतंत्र के उन खंभों को कैसे कमजोर किया जाए, जो जनता और शासन के बीच संतुलन का काम करते हैं।

हममें से बहुत से लोग जो उस समय इन घटनाओं को देख रहे थे, उन्हें यह महसूस हो सकता है कि हम एक प्रकार के सामूहिक सम्मोहन का शिकार थे, लेकिन अब, फरवरी 2026 के इस मोड़ पर खड़े होकर, जब धुंध छंट रही है और अदालतों के फैसले हमारे सामने हैं, तो यह स्पष्ट हो गया है कि वह अंधभक्ति नहीं थी, बल्कि एक ऐसा जाल था जिसे बहुत बारीकी से बुना गया था। इस जाल की सबसे बड़ी ताकत वह प्रचार तंत्र था, जिसने सच को झूठ और झूठ को राष्ट्रभक्ति का चोला पहनाकर परोसा।

असंयम कुप्रबंधन लापरवाही के चलते जान गंवाते श्रद्धालु!  Read More असंयम कुप्रबंधन लापरवाही के चलते जान गंवाते श्रद्धालु! 

दिल्ली की आबकारी नीति का मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरा है। जब 2021-22 में नई आबकारी नीति लाई गई, तो इसका घोषित उद्देश्य राजस्व में वृद्धि और शराब कारोबार में पारदर्शिता लाना था। यह नीति तकनीकी रूप से एक प्रशासनिक सुधार की तरह थी, लेकिन इसे रातों-रात एक ऐसे 'महाघोटाले' के रूप में चित्रित किया गया, जिसने पूरे देश के मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जैसे नेताओं को कटघरे में खड़ा करना महज एक जांच नहीं थी, बल्कि यह विपक्ष की छवि को कलंकित करने की एक सोची-समझी कोशिश थी।

राष्ट्रीय कार्यक्रमों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में महिला मास्टर ट्रेनरों की सहभागिता क्यों नहीं ? Read More राष्ट्रीय कार्यक्रमों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में महिला मास्टर ट्रेनरों की सहभागिता क्यों नहीं ?

जिस तरह से सीबीआई और ईडी जैसी संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल किया गया, उसने नागरिकों के मन में एक गहरा अविश्वास पैदा कर दिया। वर्षों तक चले मीडिया ट्रायल के दौरान, आम आदमी को यह बताया गया कि सबूतों का अंबार लगा है, लेकिन जब फरवरी 2026 में दिल्ली की विशेष अदालत ने इन सभी को बरी किया और यह कहा कि न केवल साक्ष्यों का अभाव है, बल्कि यह पूरा मामला ही साजिश के तहत गढ़ा गया था, तो उस दिन उस पूरे प्रचार तंत्र का नकाब उतर गया।

विकराल ज्वालामुखी बन सकता है मजदूर आंदोलन की चिंगारी  Read More विकराल ज्वालामुखी बन सकता है मजदूर आंदोलन की चिंगारी 

यह फैसला केवल एक जीत नहीं थी, बल्कि यह आईना था उस व्यवस्था के लिए जिसने टीवी डिबेट्स के जरिए अदालत से पहले ही अपना फैसला सुना दिया था। जब हम उन दिनों को याद करते हैं, तो दुख होता है कि कैसे एक राज्य के उपमुख्यमंत्री को जेल की सलाखों के पीछे रहने पर मजबूर किया गया, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे सत्ता के लिए एक चुनौती बन रहे थे।

शिक्षा का क्षेत्र, जिसे समाज को प्रबुद्ध बनाने का केंद्र होना चाहिए था, वह भी इस साजिश से अछूता नहीं रहा। जनवरी 2026 में यूजीसी द्वारा जारी 'प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस' को जिस तरह से पेश किया गया, वह शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि समाज के ताने-बाने को तोड़ने की एक कोशिश थी। जाति-आधारित भेदभाव को खत्म करने के नाम पर, जिस तरह से एक नया 'अगड़े-पिछड़े' का विभाजन पैदा किया गया, वह संविधान की भावना के खिलाफ था।

विश्वविद्यालयों के परिसरों में जिस तरह का असंतोष देखा गया, वह इस बात का सबूत था कि समाज अब इसे सुधार के रूप में नहीं, बल्कि एक दमनकारी उपकरण के रूप में देख रहा था। यह एक खतरनाक खेल थाहिंदू समाज की एकता के दावे करने वालों द्वारा ही उसी समाज को टुकड़ों में बांटना ताकि वे कभी एकजुट होकर सत्ता से सवाल न पूछ सकें। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन नियमों पर रोक लगाना इस बात का संकेत था कि न्यायपालिका अभी भी लोकतंत्र के उन मूल्यों की रक्षा करने के लिए खड़ी है, जिन्हें सरकार शायद नजरअंदाज करना चाहती थी।

इसी तरह, शिक्षा की किताबों के साथ किया गया खिलवाड़ एक लंबी अवधि की साजिश का हिस्सा था। एनसीईआरटी की कक्षा 8 की किताब में न्यायपालिका को भ्रष्ट दिखाने वाला अध्याय जोड़ना यह दर्शाता है कि सत्ता का ध्यान बच्चों के कोमल मन में संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करने पर था। यह सोची-समझी रणनीति थी ताकि भविष्य की पीढ़ी यह मान ले कि लोकतंत्र के स्तंभ खुद ही भ्रष्ट हैं और इसलिए एक मजबूत 'अधिनायकवादी' नेतृत्व की आवश्यकता है। जब चीफ जस्टिस ने इस पर कड़ा रुख अपनाया और उस सामग्री को हटाने का आदेश दिया, तो यह केवल एक किताब पर बैन नहीं था, बल्कि यह उस विचारधारा के प्रति एक सख्त संदेश था जो लोकतंत्र के आधारभूत ढांचे को ही खोखला करना चाहती थी। यह कोई संयोग नहीं था कि एक तरफ अदालतों को बरी करने पर मजबूर किया जा रहा था, तो दूसरी तरफ किताबों के जरिए उन्हीं अदालतों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जा रहे थे।

संवैधानिक गरिमा के साथ जो खिलवाड़ हुआ, वह लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी त्रासदी रही है। मई 2023 में नए संसद भवन के उद्घाटन के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को निमंत्रण न देना केवल एक शिष्टाचार की चूक नहीं थी, बल्कि यह सत्ता के अहंकार का प्रदर्शन था। एक आदिवासी महिला, जो देश की सर्वोच्च संवैधानिक प्रमुख हैं, उन्हें दरकिनार कर देना यह बताने के लिए काफी था कि सत्ता की नजर में संवैधानिक पदों की क्या अहमियत है। और फिर, जुलाई 2025 में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का इस्तीफा एक ऐसे घटनाक्रम की परिणति था, जिसे शायद ही कभी सार्वजनिक रूप से पूरी तरह समझा जा सके। एक जज के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर महाभियोग के प्रस्ताव को स्वीकार करना, उनके लिए काल बन गया। यह स्पष्ट था कि जो व्यक्ति सत्ता की लाइन से बाहर जाकर काम करने की हिम्मत करेगा, उसे रास्ते से हटा दिया जाएगा।

इन सारी घटनाओं को अगर एक साथ रखकर देखें, तो एक स्पष्ट पैटर्न उभरता है। यह कोई बिखरी हुई घटनाएं नहीं हैं, बल्कि यह एक बड़े 'ब्लूप्रिंट' का हिस्सा हैं। विपक्ष को फंसाकर राजनीति से बाहर करना, शिक्षा को बांटने का हथियार बनाना, संस्थाओं को बदनाम करना और संवैधानिक पदों को रबर स्टैंप की तरह इस्तेमाल करनायह सब लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करने का प्रयास है। हममें से कई लोगों ने इसे तब नहीं देखा, क्योंकि हमारा ध्यान उन कहानियों पर था जो टीवी स्क्रीन पर सुनाई जा रही थीं। लेकिन आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि जिसे हमने राष्ट्रवाद का हिस्सा समझा, वह दरअसल लोकतंत्र के खिलाफ एक युद्ध था।

आज के समय में जागरूकता का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। 2026 का यह दौर हमें सिखाता है कि लोकतंत्र में 'सवाल पूछना' सबसे बड़ा कर्तव्य है। यदि हम सवाल पूछना बंद कर देंगे, तो हम फिर से उस जाल में फंस जाएंगे जो अदृश्य रहकर भी बहुत गहरा है। सच भले ही देर से सामने आए, लेकिन अदालती फैसलों ने यह साबित कर दिया है कि सच्चाई को पूरी तरह दबाना नामुमकिन है। यह समय है एकजुट होने का, न केवल किसी राजनीतिक दल के समर्थन में, बल्कि उन संस्थाओं की रक्षा के लिए जिन्होंने हमारे लोकतंत्र को जीवित रखा है।

हमें उन सभी षड्यंत्रों का पर्दाफाश करना होगा जो छद्म वेष में लोकतंत्र के मंदिर को कमजोर कर रहे हैं। भविष्य की राह अब हमारे ही हाथों में है, और यह राह केवल तथ्यों के आधार पर ही तय की जा सकती है, न कि प्रचार तंत्र के शोरगुल से। लोकतंत्र की असली शक्ति किसी एक नेता या दल में नहीं, बल्कि उन जागरूक नागरिकों में है जो अन्याय के सामने झुकने से इनकार कर देते हैं। आइए, हम सब मिलकर इस जागरूकता को अपनी नई पहचान बनाएं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक ऐसा समाज छोड़ें जो न तो अंधभक्ति का शिकार हो और न ही सत्ता के किसी अनैतिक खेल का मोहरा। यही सच्ची राष्ट्रभक्ति है और यही वह एकमात्र रास्ता है जिससे हम अपने देश की आत्मा को बचा सकते हैं।

About The Author

Post Comments

Comments