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शिक्षा के मंदिर में मर्यादा की उड़ी धज्जियां, सोनभद्र की घटना
ज्ञान के आंगन में फूहड़ता का शोर—सोनभद्र की घटना ने प्रशासन को घेरा, शिक्षा के आंगन में फूहड़ता का तांडव, आखिर कब तक?
विद्या के धाम में मर्यादा का चीरहरण—सोनभद्र की घटना ने उठाए गंभीर सवाल
ब्यूरो रिपोर्ट
प्रदेश के सोनभद्र जनपद से एक ऐसी शर्मनाक तस्वीर सामने आई है, जिसने शिक्षा जगत को स्तब्ध कर दिया है। जहाँ एक ओर हम नई शिक्षा नीति के जरिए चरित्र निर्माण की बात कर रहे हैं, वहीं गुरमा स्थित एक इंटरमीडिएट कॉलेज में मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ दी गईं। विद्या की देवी माँ सरस्वती के पूजनोत्सव और विदाई समारोह (Farewell) के नाम पर जो फूहड़ता परोसी गई, उसने विद्यालय प्रबंधन को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
Read More सीमावर्ती क्षेत्र में अवैध सागवान चिरान पर बड़ी कार्रवाई, एसएसबी व वन विभाग की संयुक्त छापेमारीघटनाक्रम के अनुसार विद्यालय परिसर में विदाई समारोह के दौरान तेज आवाज में डीजे बजाया गया। हैरानी की बात यह है कि शैक्षणिक संस्थान में भक्ति या प्रेरक गीतों के बजाय भोजपुरी के अश्लील गानों पर छात्र-छात्राएं झूमते नजर आए। हद तो तब हो गई जब छात्रों ने सरेआम अपनी शर्ट उतार दी और अर्द्धनग्न होकर अभद्र तरीके से डांस किया। यह कृत्य माँ सरस्वती के अपमान के साथ-साथ शिक्षा की गरिमा पर एक बड़ा कलंक है। इस घटना ने समाज के सामने कई कड़वे सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या प्रधानाचार्य और शिक्षकों की मौजूदगी में यह सब संभव है? क्या विद्यालय प्रशासन ने इस अश्लीलता को रोकने का प्रयास किया या वे खुद इसका हिस्सा थे? क्या विदाई समारोह का अर्थ अब केवल शोर-शराबा और अनुशासनहीनता रह गया है। स्थानीय लोगों का आक्रोश केवल इस डांस तक सीमित नहीं है।
ग्रामीणों का आरोप है कि इस विद्यालय की आड़ में लंबे समय से संदिग्ध गतिविधियां संचालित हो रही हैं। लोगों की मांग है कि इस संस्थान के आंतरिक क्रियाकलापों की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए ताकि शिक्षा के नाम पर चल रहे किसी भी अनैतिक कार्य का पर्दाफाश हो सके। इस घटना को केवल बच्चों की नादानी कहकर दबाया नहीं जा सकता।
इसके लिए ठोस कदम उठाने होंगे। जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) को तुरंत संज्ञान लेते हुए विद्यालय की मान्यता रद्द करने की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए। स्थानीय पुलिस को सार्वजनिक स्थान पर अश्लीलता फैलाने और शोर प्रदूषण के नियमों के उल्लंघन पर FIR दर्ज करनी चाहिए। यदि आज इस पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले समय में अन्य शिक्षण संस्थान भी ऐसी अराजकता को बढ़ावा देंगे।
शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल डिग्रियां बांटना नहीं, बल्कि एक सभ्य नागरिक तैयार करना है। यदि शिक्षण संस्थान ही अपनी मर्यादा खो देंगे, तो हम आने वाली पीढ़ी से शिष्टाचार और नैतिकता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? यह समय है कि समाज और शासन मिलकर ऐसे शिक्षा के व्यापारियों के खिलाफ मोर्चा खोलें और विद्या के मंदिरों की पवित्रता बनाए रखें।

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