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प्रत्येक धर्म का अपना एक निजी दर्शन होता है
कई चिन्तक और मनीषी अनादिकाल से सांसारिक व्यथाओं से मुक्ति हेतु अपने विचार देते आ रहे हैं
विश्व का कोई भी धर्म या दर्शन हो, उसके कुछ अपने सिद्धान्त होते हैं। इस कार्यभूमि भारत में जितने दर्शनों का प्रादुर्भाव हुआ है, वैसा अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। कई चिन्तक और मनीषी अनादिकाल से सांसारिक व्यथाओं से मुक्ति हेतु अपने विचार देते आ रहे हैं। प्रत्येक धर्म का अपना एक निजी दर्शन होता है। उसके कुछ आधारभूत सिद्धान्त ही उसके तत्त्व कहलाते हैं। दूध में से यदि मक्खन बाहर निकाल दिया जाये और फिर बेचा जाए तो लेने वाला यही कहेगा-अरे, इसका तत्त्वत्-तत्त्व तो तुमने पहले ही निकाल लिया, अब इसका क्या महत्त्व है? महत्त्व तत्त्व या वस्तु के सार का होता है।
ऋषि-मुनियों ने जिस ढंग से जीवन का चिन्तन-मनन किया, आत्मा के सम्बन्ध में सोचा और परमात्मा की महत्ता का प्रतिपादन किया, वह उनकी अपनी विचारधारा है। उन विचारधाराओं पर ही उनके दर्शनों को मान्यता मिली है। तत्त्वहीन दर्शन कभी भी मान्य नहीं हो सकते। वर्तमान युग में जितने भी धर्म मान्य हैं, उसके पीछे उनके अनुयायियों की भावना उनके दर्शन के कारण स्थिर है। ऋषि-परम्परा के इस देश में जितने दर्शन बने हैं, उनके पीछे अनेक चिन्तकों का वर्षों का चिन्तन छिपा है।
वैदिक धर्म की आधारभूमि पर ही सांख्य, मीमांसा, द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि कई दर्शन जन्मे हैं। बौद्ध एवं जैन धर्म का अपना अलग दर्शन है। जहाँ बौद्ध और वैदिक ज्ञान प्रधान है वहीं जैन धर्म क्रिया व ज्ञान प्रधान है। बुद्ध और वेद शब्द का अभिप्राय है ज्ञान और जानना। जहाँ बुद्ध ने अपने चिन्तन से ज्ञान प्राप्त किया है, वहीं वैदिक ऋषियों ने अपने चिन्तन-मनन व ध्यान से संसार के बारे में जानकारी ग्रहण की और अपने विचार दिये। उन्होंने जाना उसे फिर दुनियाँ को बताया।
जैन धर्म आचार-प्रधान धर्म है। जैन शब्द की व्युत्पत्ति "जयत्तीति जिनः" से हुई है। अर्थात् जो जीतता है, उसे जिन कहते हैं। इसी कारण जैन धर्म को विजेताओं का धर्म माना जाता है। विजय प्राप्त करने के लिए कर्मों से युद्ध करना पड़ता है।जो अपने आप में महत्त्वपूर्ण क्रिया है। केवल मात्र ज्ञान से आत्मा का कल्याण नहीं हो सकता, उसके लिए क्रिया की आवश्यकता, चारित्र की आवश्यकता है। दोनों का सम्यक् योग हो और उन पर सम्यग्दृष्टि का प्रभाव हो तो मुक्ति का पथ प्रशस्त हो सकता है।
सभी दर्शनों का लक्ष्य एक
सभी दर्शन मानव को सुखी बनाने का मार्ग बताते हैं। आत्मा दर्शन का केन्द्र बिंदु रहा है। उपनिषद्कारों ने चिन्तन-मनन के बाद अपने विचारों को मूर्त रूप दिया है। सांख्य दर्शनकार ने आत्मा के लिए कहा है।आत्मा अरूपी और चेतनायुक्त है, कर्मफल भोगने वाली, नित्य, सर्वव्यापी, क्रिया-शून्य, अकर्ता, निर्गुण और सूक्ष्म है। गीता में भी श्रीकृष्ण ने आत्मा की शाश्वतता के लिए अर्जुन को कहा- यह आत्मा न कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है, क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है।श्वेताश्वतर उपनिषद् में लिखा है-यह आत्मा न स्त्री है, न पुरुष और न यह नपुंसक है। आत्मा जो-जो शरीर धारण करती है, यह उस-उस नाम से युक्त हो जाती है।
दशवैकालिक निर्युक्ति-भाष्य में आत्मा को नित्य, अविनाशी एवं शाश्वत माना गया है।
मानव-जीवन आत्म-तत्त्व पर चिन्तन करने लगे तो उसे अपना जीवन अल्प लगेगा। हमारे समक्ष तो सत्य उद्घाटित हो चुका है। व्यर्थ वाद-विवाद में पड़कर महत्त्वपूर्ण जीवन को खोना नहीं है। विवाद और तर्क हमें दलदल में उलझा देते हैं। आप अपने आपको जैनी मानते हैं तो धर्म के प्रति श्रद्धा रखकर तत्त्वों को ग्रहण करें। जो वस्तु को जिस ढंग से देखता है, वह उसी रूप से उसको अभिव्यक्त करता है। जलती हुई अग्नि को देखकर तीन व्यक्ति अलग-अलग बातें बताते हैं।
एक कहता है यह दाहक है, दूसरा कहता है यह तो आतप है, तीसरा उसे प्रकाशक कहता है। यह अब आपके सोचने की बात है कि आपकी दृष्टि उस प्रज्वलित अग्नि के लिए क्या है? आप चाहें तो एक रूप से देखें और चाहें तो समग्र रूप से देखें। सत्य को वास्तविक रूप से जानने के लिए उसका समग्र ज्ञान आवश्यक है। अमरीका-प्रवास के समय स्वामी विवेकानंद भारत की गौरवमयी सांस्कृतिक विरासत पर अपने विचार प्रकट कर रहे थे। उस समय एक अमरीकी ने व्यंग्य की भाषा में कहा - स्वामी जी ! भारतीय संस्कृति के प्रणेताओं की प्रशंसा कहाँ तक की जाए, जिन्होंने लक्ष्मी का वाहन तो उल्लू को बनाया है और सरस्वती का हंस। क्या यही आपका सांस्कृतिक गौरव है?
यह सुनकर विवेकानन्द ने कहा- "बस, यही तो आपका दृष्टि-भेद है। हमारी व आपकी संस्कृति में यही अन्तर है। हमारा दर्शन कहता है कि धन आदमी को अंधा बना देता है, उल्लू की तरह। इसलिए लक्ष्मी का वाहन उल्लू चुना गया है। सरस्वती विद्या की प्रतीक है जो हमारे विवेक को जगाने वाली है। अतः उनका वाहन हंस रखा गया है, जो नीर-क्षीर-न्याय का प्रतीक है। विवेकानन्द की बात सुनकर बेचारा अमरीकी अपना-सा मुँह लेकर चुपचाप बैठ गया।हर व्यक्ति अपने-अपने ढंग से वस्तु को देखते हैं। कुछ रूप को देखते हैं, कुछ गुण को देखते हैं। कुछ दोनों ही देखते हैं।
एक व्यक्ति अपने बीमार बेटे को लेकर डॉक्टर के घर गया तो डॉक्टर की पत्नी ने कहा- डॉक्टर साहब तो अस्पताल गये हैं। वह व्यक्ति अस्पताल पहुँचा तो पता चला कि वे अभी तक घर से अस्पताल नहीं आये हैं। अब सत्य क्या है ? तत्त्वज्ञान में यही बात सोचने व विचारने की है। उसमें हठवाद या दुराग्रह को कहीं भी स्थान नहीं है।जैन धर्म पदार्थ के अनन्त धर्म को स्वीकारता है। किसी वस्तु या पदार्थ में एक ही गुण नहीं होता। भगवान महावीर ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा, पहचाना, अनुभव किया तब उसे प्रकट किया है।
जैन धर्मज्ञों को सही मायने में जैन बनने का प्रयत्न करना चाहिए। सर्वज्ञ की वाणी का चिन्तन-मनन करना चाहिए। उन्होंने अपरिग्रहवाद का चिन्तन दिया है। जीवन-निर्वाह हेतु धन का अर्जन बुरा नहीं है लेकिन धन कुबेर बनने का विचार भी गलत है। अधिक धनार्जन की भूख व्यक्ति को धर्म-पथ से विचलित कर देती है। दूसरे के धन को धूल समझना चाहिए। क्या अपने आपको धर्मज्ञ समझने वाले सभी यह सोचते हैं?
हिंसा मोक्ष मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। कोई भी धर्म हिंसामय नहीं हो सकता। सन्त और गृहस्थ दोनों को हिंसा के मार्ग से बचना चाहिए। गृहस्थ पूर्ण रूप से हिंसा से नहीं बच सकता, लेकिन जान-बूझकर की जाने वाली हिंसा से स्वयं को बचा सकता है। त्याग-भावना से हिंसा कमजोर पड़ती है। अतः तप, त्याग, दान से अनजाने में हुई हिंसा के दबाव को कम किया जा सकता है। मन, वचन और कर्म से जान-बूझकर किसी के मन को चोट पहुँचाना हिंसा है। अतः इससे बचने का प्रयास करें। कभी-कभी दया भी हिंसा का रूप ले लेती है। अतः प्रत्येक कार्य विचारपूर्वक करना चाहिए।
एक सन्त तालाब के किनारे बैठे हुए चिन्तन कर रहे थे। उन्होंने किनारे पर खड़े कुछ बगुलों को देखा, जो अपने शिकार की खोज में खड़े थे। एक सज्जन कुछ आटे की गोलियाँ बनाकर लाये, उन्होंने तालाब के जल में बिखेर दीं। आटे की सुगन्ध से आकर्षित होकर अनेक मछलियाँ जो अब तक गहरे पानी में थीं, किनारे की ओर चल पड़ीं। बगुले उन मछलियों को अपना आहार बना गये। सन्त का हृदय करुणा से मर गया। उन्होंने आटे की गोलियाँ डालने वाले से कहा- "भाई ! देखो बगुले क्या कर रहे हैं?" वह बोला- "मछलियाँ खा रहे हैं।" "तुमने आटा डालकर मछलियों को जीवन दिया है या मृत्यु ? तुम्हारे आटा डालने से ये इधर आईं और मृत्यु के मुख में चली गईं। तुम्हारी दया हिंसा में बदल गई है।" उस व्यक्ति को अपनी भूल पर पश्चात्ताप हुआ, लेकिन अब क्या हो सकता था।
सेवा-भाव का भी जैन धर्म में महत्त्वपूर्ण स्थान है। विना किसी चाह के दूसरों को देना, सहयोग करना, सहायता करना सेवा है। पशु-पक्षियों को बाँधकर उन्हें खिलाना-पिलाना सेवा नहीं कहलाती है। बन्धन कोई नहीं चाहता, तो उन्हें जंजीर से बाँधना, पिंजरे में रखना उचित नहीं है।महाराजा रणजीतसिंह एक दिन सवेरे सवेरे घूमने के लिए जा रहे थे। अचानक उनके सिर पर पत्थर लगा। वे सिर थामकर वहीं बैठ गये। कुछ ही क्षणों में उनके पीछे-पीछे चलने वाले राज्य कर्मचारी एक वृद्धा को पकड़ लाये। महाराज को देखकर वृद्धा घबरा गई और अपने किये पर क्षमा माँगने लगी।
रणजीतसिंह ने कहा- माँ ! तुम पत्थर क्यों फेंक रही थीं?
महाराज ! मेरे हाथ वृक्ष तक पहुँच नहीं सकते, घर में और कोई है नहीं, इन आमों को ऐसे ही तोड़कर बेचती हूँ और अपना गुजारा करती हूँ।रणजीतसिंह ने कहा- वृक्ष को पत्थर मारने पर वह फल देता है और मैं सजा देने की सोच रहा था। नहीं, यह ठीक नहीं है। मैं इंसान हूँ। मुझे कुछ ऊँची बात सोचनी चाहिए। उन्होंने उसी समय मंत्री को आदेश दिया कि इस वृद्धा माँ का सारा खर्चा राजकोष से प्रदान किया जाये। राज्य में जिन वृद्ध पुरुषों या स्त्रियों के सन्तान नहीं हों और वे स्वयं मेहनत करते हों, उन्हें भी सहायता देने की व्यवस्था की जाये।यह है सच्ची सेवा। धर्म के पथ पर चलने वालों को धर्म के तत्त्वों का ज्ञान आवश्यक है और वही उनके जीवन को कल्याणमय बना सकते हैं।
कांतिलाल मांडोत

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