कुष्ठ रोग के खिलाफ सरकार की निर्णायक लड़ाई, जागरूकता, इलाज और सम्मान की ओर भारत

यह बीमारी केवल स्वास्थ्य की नहीं बल्कि सामाजिक सोच की भी बड़ी चुनौती बनी हुई है

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कुष्ठ रोग जिसे हैनसेन रोग भी कहा जाता है, मानव इतिहास की सबसे पुरानी बीमारियों में से एक है, लेकिन दुर्भाग्यवश आज भी यह बीमारी केवल स्वास्थ्य की नहीं बल्कि सामाजिक सोच की भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। कुष्ठ रोग से पीड़ित व्यक्ति को बीमारी से ज्यादा उस भेदभाव, उपेक्षा और सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ता है, जो अज्ञानता और भय से जन्म लेता है। इसी सोच को बदलने और समाज को यह संदेश देने के लिए कि कुष्ठ रोग पूरी तरह इलाज योग्य है, भारत में हर वर्ष 30 जनवरी को राष्ट्रीय कुष्ठ रोग दिवस मनाया जाता है। यह दिन महात्मा गांधी की पुण्यतिथि से जुड़ा है, जिन्होंने अपने जीवन में कुष्ठ रोगियों के साथ न केवल सहानुभूति दिखाई बल्कि उनके सम्मान और पुनर्वास के लिए भी लगातार काम किया।
 
विश्व स्तर पर कुष्ठ रोग जागरूकता दिवस जनवरी के अंतिम रविवार को मनाया जाता है, जिसकी शुरुआत वर्ष 1954 में फ्रांसीसी मानवतावादी राउल फोलेरो ने की थी। भारत में इसे 30 जनवरी को मनाने का उद्देश्य गांधीजी के मानवीय मूल्यों और कुष्ठ रोगियों के प्रति उनके समर्पण को स्मरण करना है। यह दिवस केवल एक प्रतीकात्मक आयोजन नहीं है, बल्कि सरकार और समाज दोनों के लिए यह आत्ममंथन का अवसर है कि क्या हम वास्तव में कुष्ठ रोग से जुड़े सामाजिक कलंक को समाप्त कर पा रहे हैं या नहीं।
 
आज के भारत की बात करें तो कुष्ठ रोग की स्थिति पहले की तुलना में काफी बेहतर हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में इस समय लगभग 80 से 90 हजार सक्रिय कुष्ठ रोगी उपचाराधीन हैं। हर वर्ष करीब एक लाख से थोड़ा अधिक नए मामले सामने आते हैं, जो कुल वैश्विक मामलों का लगभग आधे से ज्यादा हिस्सा है। हालांकि यह आंकड़ा सुनने में बड़ा लग सकता है, लेकिन जनसंख्या के अनुपात में देखें तो भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर कुष्ठ रोग उन्मूलन की स्थिति हासिल कर ली है। इसका अर्थ यह है कि देश में प्रति दस हजार की आबादी पर एक से कम सक्रिय मामला है। फिर भी सरकार मानती है कि जब तक एक भी व्यक्ति इस बीमारी से पीड़ित है और सामाजिक भेदभाव का शिकार है, तब तक लक्ष्य पूरा नहीं हुआ माना जा सकता।
 
भारत सरकार पिछले कई दशकों से कुष्ठ रोग के खिलाफ सुनियोजित और निरंतर प्रयास कर रही है। राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम के तहत सरकार का मुख्य जोर रोग की शीघ्र पहचान, समय पर मुफ्त इलाज और विकलांगता की रोकथाम पर है। कुष्ठ रोग का इलाज मल्टी ड्रग थेरेपी के माध्यम से किया जाता है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहयोग से देशभर में पूरी तरह निःशुल्क उपलब्ध है। यह इलाज न केवल रोग को ठीक करता है बल्कि संक्रमण को आगे फैलने से भी रोकता है। सरकार का यह स्पष्ट संदेश है कि कुष्ठ रोग कोई अभिशाप नहीं बल्कि एक सामान्य बैक्टीरियल संक्रमण है, जिसका समय पर इलाज होने पर व्यक्ति पूरी तरह स्वस्थ जीवन जी सकता है।
 
बीते कुछ वर्षों में सरकार ने कुष्ठ रोग की पहचान को और मजबूत करने के लिए कई नए कदम उठाए हैं। घर-घर जाकर सर्वेक्षण करना, उच्च जोखिम वाले इलाकों में विशेष खोज अभियान चलाना और संपर्क में आए लोगों की जांच करना इन प्रयासों का हिस्सा है। स्वास्थ्य विभाग के साथ-साथ आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, पंचायत प्रतिनिधि और शिक्षक भी इस अभियान से जोड़े गए हैं, ताकि कोई भी संदिग्ध मामला छूट न जाए। सरकार का मानना है कि शुरुआती चरण में रोग की पहचान हो जाने से न केवल इलाज आसान होता है बल्कि स्थायी विकलांगता की संभावना भी लगभग समाप्त हो जाती है।
 
केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकारें भी कुष्ठ रोग के खिलाफ अपनी भूमिका निभा रही हैं। कई राज्यों ने कुष्ठ रोग को अधिसूचित बीमारी घोषित किया है, जिससे हर मामले की रिपोर्टिंग अनिवार्य हो गई है। इससे आंकड़ों की पारदर्शिता बढ़ी है और इलाज की पहुंच बेहतर हुई है। स्वास्थ्य सेवाओं को आयुष्मान भारत और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से जोड़कर यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों को भी समय पर इलाज मिल सके। विशेष रूप से आदिवासी और पिछड़े क्षेत्रों पर सरकार का अतिरिक्त फोकस है, जहां आज भी जागरूकता की कमी के कारण रोग देर से पकड़ में आता है।
 
सरकार की नीति केवल इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक पुनर्वास और सम्मानजनक जीवन भी इसका अहम हिस्सा है। कुष्ठ रोग से ठीक हो चुके लोगों के लिए कौशल विकास, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। सरकार का यह प्रयास है कि रोग से मुक्त होने के बाद व्यक्ति को समाज में दोबारा स्वीकार किया जाए और उसे किसी भी प्रकार के भेदभाव का सामना न करना पड़े। इसी दिशा में भेदभावपूर्ण कानूनों को हटाने और सामाजिक जागरूकता बढ़ाने के लिए भी काम किया जा रहा है।
 
कुष्ठ रोग निवारण में जागरूकता की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है। इसी उद्देश्य से हर वर्ष 30 जनवरी से 13 फरवरी तक स्पर्श कुष्ठ रोग जागरूकता अभियान चलाया जाता है। इस दौरान देशभर में जनसभाएं, स्वास्थ्य शिविर, स्कूलों में कार्यक्रम और मीडिया के माध्यम से लोगों को यह बताया जाता है कि त्वचा पर सफेद या लाल चकत्ते, सुन्नपन या नसों में कमजोरी जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र से संपर्क करें। नूंह जिले में इस वर्ष भी जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग मिलकर इस अभियान को घर-घर तक पहुंचाने की तैयारी कर रहा है, ताकि एक भी मरीज इलाज से वंचित न रहे।
 
सरकार की प्रासंगिकता आज इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि सामाजिक सोच बदलने का काम केवल कानून या योजनाओं से नहीं होता। इसके लिए निरंतर संवाद, शिक्षा और संवेदनशीलता की जरूरत होती है। सरकार का प्रयास है कि कुष्ठ रोग को लेकर फैली भ्रांतियों को खत्म किया जाए और यह समझ विकसित की जाए कि रोगी नहीं बल्कि बीमारी से लड़ना है। जब समाज रोगियों को अपनाता है, तभी सरकार की योजनाएं भी पूरी तरह सफल हो पाती हैं।
 
आज जब हम राष्ट्रीय कुष्ठ रोग दिवस मना रहे हैं, तब यह जरूरी है कि हम केवल आंकड़ों और योजनाओं तक सीमित न रहें। हमें यह समझना होगा कि कुष्ठ रोग के खिलाफ लड़ाई केवल स्वास्थ्य विभाग की नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है। सरकार ने अपनी भूमिका निभाते हुए मुफ्त इलाज, जागरूकता अभियान और पुनर्वास की मजबूत व्यवस्था खड़ी की है। अब समाज की बारी है कि वह भेदभाव को त्यागे और कुष्ठ रोग से प्रभावित हर व्यक्ति को सम्मान और समानता का अधिकार दे। यही इस दिवस का असली संदेश है और यही एक स्वस्थ, संवेदनशील और समावेशी भारत की पहचान भी।
 
कांतिलाल मांडोत

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