जनसंख्या और उपलब्ध संसाधनों के समुचित संतुलन की अग्नि परीक्षा
जनसंख्या के चतुराई से उपयोग की दरकार
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भारत अनुमानित तौर पर एक सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश बन गया है और सबसे ज्यादा युवा जनसंख्या वाला भी देश होगा ।अब समय आ गया है जब देश की सरकार और समूचे जनसंख्या प्रबंधन की इकाइयों को सक्रिय होकर बढ़ती जनसंख्या और उपलब्ध संसाधनों के बीच सामयिक संतुलन बनाकर बड़ी जनसंख्या को बोझ न मानकर एक शक्ति के रूप में स्थापित कर इसका सर्वाधिक दोहन राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए निहित करे।
अब इस विशाल जनसंख्या का सीमित संसाधन पर कितना दबाव होगा, आप ये कल्पना कर सकते हैं। बहुत अधिक जनसंख्या देश में अनेक सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक समस्याओं को जन्म भी देती है। वर्तमान में भारत 142करोड़ जनसंख्या (अनुमानित) के साथ विश्व में अनुमानित तौर पर दूसरे नंबर पर है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1989 से 11 जुलाई को हर वर्ष जनसंख्या दिवस के रूप में मनाता है पर जनसंख्या नियंत्रण या जनसंख्या नियोजन पर भारत जैसे देश में कोई भी योजना नहीं बनती है।
यही जनसंख्या बढ़ चुकी है और भारत में युवा जनसंख्या 55% से ज्यादा है तो इसका सकारात्मक उपयोग ही किया जाना युक्ति युक्त होगा। व्यापारिक दृष्टिकोण से भारत की जनसंख्या बाजार की ताकत है पर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से जनसंख्या विकास के लिए बड़ी बाधक भी है।
अधिक जनसंख्या के दबाव में सीमित संसाधन छिन्न-भिन्न हो जाते हैं आम जनता को उनकी मूल जरूरतों की आवश्यक वस्तुएं नहीं मिल पाती और यदि मिलती भी है तो बहुत ऊंची दरों में या बहुत महंगाई के बाद।ऐसे में देश में अनेक समस्याएं पैदा होती है, और सबसे ज्यादा जनसंख्या के दबाव से विकास के लिए संकट खड़ा हो जाता है। विकास धीरे-धीरे मध्यम का अवरुद्ध हो जाता है। देश का आर्थिक नियोजन चरमराने लगता है।
वर्ष 1951 से 81 के दशक को भारत की जनसंख्या की विस्फोटक अवधि के रूप में जाना जाता है। यह देश में मृत्यु दर के तीव्र स्खलन और जनसंख्या की उच्च प्रजनन दर के कारण हुआ है। वर्ष 1921 तक की अवधि में भारत की जनसंख्या की वृद्धि स्थिर अवस्था में रही क्योंकि इस अवधि में जनसंख्या वृद्धि की दर काफी निम्न थी। 1981 से लगातार अभी तक जनसंख्या की दर बढ़ती जा रही है।
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा बढ़ती जनसंख्या के मुद्दों के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य इस वर्ष विश्व जनसंख्या दिवस स्लोगन 'परिवार नियोजन मानव का अधिकार' रखा गया है, ताकि बढ़ती जनसंख्या से उत्पन्न समस्याओं के प्रति जागरूक होकर लोगों द्वारा परिवार नियोजन पर उत्साहजनक जोर दिया जाए। यह स्लोगन यह संकेत करता है कि सुरक्षित एवं शैक्षिक परिवार नियोजन एक जिम्मेदार नागरिक का अधिकार है और यह सभी लोगों को सशक्त बनाएगा और देश में विकास की गति को तेज करने में सहायक भी होगा। भारत की जनसंख्या बढ़ने का प्रमुख कारण बढ़ती जन्म दर और कम मृत्यु दर भी है।
जनसंख्या वृद्धि के कारण देश मैं बेरोजगारी गरीबी पर्यावरण प्रदूषण जैसी समस्याएं चुनौती बनकर सामने आई जो समाज व्यक्ति और राष्ट्र सभी के विकास को अवरुद्ध करती है। हमारे पास उपलब्ध संसाधन इतनी बड़ी आबादी के लिए कतई पर्याप्त नहीं है। विकास और देश की समृद्धि के लिए जनसंख्या नियंत्रण एक आवश्यक अंग हो सकता है।
कई यूरोपीय देशों ने अपनी बढ़ती जनसंख्या एवं संसाधनों में उचित तालमेल हेतु परिवार नियंत्रण प्रणाली को का निर्णय लिया किंतु एक समय बाद वहां कार्यशील जनसंख्या की अपेक्षा वृद्धों की संख्या में वृद्धि हुई जिससे मानव संसाधन की समस्याएं उनके सामने आने लगी हैं। चीन में पहले जनसंख्या नियंत्रण किया गया था। सरकार ने वैधानिक रूप से एक या दो बच्चे पैदा करने की शर्तें लागू की थी, पर वहां बुजुर्गों, वृद्धों की संख्या में भारी वृद्धि होने के पश्चात चीन की सरकार ने ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपनी जनता से अपील की है।
जापान एक छोटा सा देश होने के बावजूद अपने सीमित संसाधनों के चलते अपने नवाचार तथा तकनीकी शक्ति के बल पर विकासशील देशों के समकक्ष खड़ा है। भारत जैसे विशाल देश में जहां बहुत बड़ी जनसंख्या भी है और विकास के लिए आवश्यक संसाधन भी हैं, विकास करने के लिए केवल विशाल जनसंख्या के साथ सामंजस्य बिठाने की आवश्यकता होगी। भारत में जनसंख्या नियंत्रण के साथ-साथ उसके अनुपात में संसाधनों का संतुलन बना कर विकास की नई दिशा दी जा सकती है। संसाधनों की उचित दोहन हेतु सही और सटीक नीति तथा उसके क्रियान्वयन की आवश्यकता होगी। इसके अलावा नवाचार एवं उचित तकनीक प्रौद्योगिकी को भी अमल में लाना होगा।
भारत विश्व का प्रथम देश है जिसने 1952 में परिवार नियोजन कार्यक्रम राष्ट्रीय स्तर पर शुरू किया इसका परिणाम भी अच्छा हुआ था कि पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या की वृद्धि में संतोषजनक गिरावट आई है। यह तो विदित है कि किसी भी राष्ट्र की संतुलित विकास की धारा तभी संभव है जब वहां के विकास में सहायक संसाधनों का संतुलन बना रहे। किसी एक घटक का संतुलन यदि गड़बड़ होता है तो विकास के लिए गंभीर समस्याएं जन्म लेना शुरू करती हैं।
भारत की जनसंख्या इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो दिन दूर नहीं जब संसाधनों की कमी से भारत को जूझना होगा फिर विकास की बात बेमानी हो जाएगी। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जनसंख्या दिवस मनाने का उद्देश्य है कि व्यक्ति समाज सरकार और योजना कानों के मन में इस विषय से संबंधित समस्याओं के प्रति चेतना संवेदना जगाना ही है ताकि लोगों में बढ़ती जनसंख्या से जुड़ी समस्याएं एवं अवरोधों के बारे में जागरूकता ज्यादा से ज्यादा विस्तारित हो।
भारत के पास विकास के सभी मापदंड होते हुए भी देश पिछड़ा हुआ है, भारत में तकनीकी का कम विकास, कमजोर शिक्षा ,परंपरागत स्रोत, कृषि का निम्न स्तर, आर्थिक असमानता जैसी अनेक समस्याएं हैं जो विकास मैं बाधक बनती रही है। वर्तमान में देश के पास प्राकृतिक एवं मानव संसाधन इतना है कि बढ़ती जनसंख्या की समस्याओं से आसानी से निपटा जा सके पर इस बात की अत्यंत आवश्यकता है कि संसाधनों का उचित दोहन तथा उसका सही उपयोग विकास की दिशा में भ्रष्टाचार से बचाकर किया जाए।
यह अत्यंत उल्लेखनीय है कि जनसंख्या की समस्या से निपटने तथा विकास की दर को बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल शासन प्रशासन की ही नहीं है इसके लिए आम नागरिक भी जिम्मेदार है क्योंकि समस्याएं खड़ी करने में आमजन का एक बड़ा वर्ग भी है, इसीलिए हम सबको जनसंख्या नियंत्रण और विकास की धारा को सही दिशा प्रदान करने के लिए सक्रिय सहयोग देना होगा तब ही देश एक सशक्त राष्ट्र बन पाएगा।
संजीव ठाकुर
संजीव ठाकुर
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