चीन,पाकिस्तान और बांग्लादेश की त्रिकोणीय जुगलबंदी, भारत के लिए उभरती सन्निकट चुनौतियाँ

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भारत की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने इस समय में अनेक जटिल चुनौतियाँ खड़ी हैं,इनमें सबसे गंभीर चुनौती पड़ोसी देशों के साथ बिगड़ते समीकरण और क्षेत्रीय अस्थिरता से जुड़ी है। भारत देश का पुराना अनुभव रहा है कि परंपरागत रूप से चीन और पाकिस्तान भारत विरोध की धुरी रहे हैं, और अब जिस प्रकार बांग्लादेश के कुछ घटनाक्रम इस धुरी से जुड़ते प्रतीत हो रहे हैं उसने भारत की सामरिक, कूटनीतिक और मानवीय चिंताओं को और गहरा कर दिया है। यह स्थिति केवल सीमा विवाद या कूटनीतिक तनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध क्षेत्रीय शांति, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक स्थिरता से  भी गहरे जुड़ा है।

चीन की विस्तारवादी नीति के कारण भारत की सीमा पर  हमेशा दबाव महसूस किया जाता रहा है।
चीन के साथ भारत के संबंध पिछले कुछ वर्षों से लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी सेना की गतिविधियाँ, बुनियादी ढांचे का आक्रामक विस्तार और बार-बार होने वाले सैन्य आमने-सामने के घटनाक्रम इस बात के संकेत हैं कि चीन भारत के प्रति पारंपरिक “शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व” के सिद्धांत से हटकर व्यवहार कर रहा है। पूर्वी लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक, चीन की रणनीति धीरे-धीरे यथास्थिति बदलने की रही है।

चीन की यह नीति केवल भूभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि वह भारत को सामरिक रूप से घेरने की कोशिश भी कर रहा है। नेपाल, श्रीलंका, मालदीव और म्यांमार जैसे देशों में चीनी प्रभाव का बढ़ना इसी रणनीति का हिस्सा माना जाता है। ऐसे में चीन पर आवश्यकता से अधिक भरोसा करना भारत के लिए दीर्घकालिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है।

पाकिस्तान में भारी अस्थिरता के बीच भी भारत का विरोध बदस्तूर जारी है
पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति चाहे जितनी भी कमजोर क्यों न हो, भारत विरोध उसकी विदेश नीति का स्थायी स्तम्भ बना हुआ है। आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद पाकिस्तान का सैन्य प्रतिष्ठान भारत के खिलाफ छद्म युद्ध और आतंकवाद को रणनीतिक औज़ार के रूप में इस्तेमाल करता रहा है।

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हाल के वर्षों में पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं और सिखों के खिलाफ हिंसा, जबरन धर्मांतरण और हत्याओं की घटनाएँ भारत के लिए गंभीर मानवीय चिंता का विषय हैं। यह केवल मानवाधिकार का प्रश्न नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय अस्थिरता का भी संकेत है, जिसका प्रभाव अंततः भारत पर ही पड़ता है,चाहे वह शरणार्थी संकट हो या सीमा पार तनाव।

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बांग्लादेश के बदलते संकेत ने भारत के लिए नई आशंकाएँ बाधा दी हैं भारत और बांग्लादेश के संबंध लंबे समय तक सौहार्दपूर्ण और सहयोगपूर्ण रहे हैं। 1971 के मुक्ति संग्राम से लेकर आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग तक, दोनों देशों के बीच एक मजबूत आधार रहा है। किंतु हाल के समय में बांग्लादेश के भीतर कुछ घटनाक्रम विशेषकर हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, मंदिरों पर हमले और सामाजिक असुरक्षा भारत के लिए चिंता का कारण बने हैं।

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इन घटनाओं के पीछे कट्टरपंथी ताकतों का उभार और बाहरी प्रभावों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि बांग्लादेश में भारत विरोधी या कट्टरपंथी शक्तियाँ मजबूत होती हैं और उन्हें चीन या पाकिस्तान का अप्रत्यक्ष समर्थन मिलता है, तो यह भारत के पूर्वी सीमांत के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर सकता है।

त्रिकोणीय दबाव की रणनीति
चीन,पाकिस्तान की मित्रता कोई नई बात नहीं है। चीन,पाकिस्तान आर्थिक गलियारा इस गठजोड़ का ठोस उदाहरण है, जो भारत की संप्रभुता से जुड़े क्षेत्रों से होकर गुजरता है। यदि इस समीकरण में बांग्लादेश का किसी भी रूप में सामरिक या वैचारिक झुकाव जुड़ता है, तो भारत के लिए यह स्थिति और जटिल हो सकती है।
यह त्रिकोणीय दबाव केवल सैन्य नहीं, बल्कि कूटनीतिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक भी हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को घेरने की कोशिश, क्षेत्रीय संगठनों में संतुलन बदलने का प्रयास और आंतरिक अस्थिरता को हवा देना, भारत के लिए ये सभी संभावित रणनीतियों के खिलाफ एक नया समीकरण तैयार करने की आवश्यकता होगी।

इन परिस्थितियों में भारत को अत्यंत सतर्क, संतुलित और दीर्घदर्शी नीति अपनाने की आवश्यकता है। एक ओर जहां सीमाओं की सुरक्षा और सैन्य तैयारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक संवाद के रास्ते खुले रखना भी आवश्यक है। भारत को बांग्लादेश के साथ अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों को और मजबूत करना चाहिए, ताकि कट्टरपंथी ताकतों के लिए जगह न बचे। पाकिस्तान के संदर्भ में सख्ती और स्पष्टता आवश्यक है, जबकि चीन के मामले में रणनीतिक धैर्य के साथ राष्ट्रीय हितों की दृढ़ रक्षा करनी होगी।

निष्कर्ष
चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बदलते समीकरण भारत के लिए केवल एक तात्कालिक चुनौती नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीतिक परीक्षा भी हैं। इतिहास साक्षी है कि भारत ने हर कठिन परिस्थिति में संयम, साहस और विवेक का परिचय दिया है। वर्तमान समय में भी आवश्यकता इसी बात की है कि भारत अपनी आंतरिक एकता, कूटनीतिक समझदारी और सामरिक क्षमता के बल पर इन चुनौतियों का सामना करे।
यदि समय रहते सही निर्णय लिए गए, तो यह त्रिकोणीय दबाव भारत को कमजोर करने के बजाय और अधिक मजबूत, सतर्क और आत्मनिर्भर बना सकता है।

संजीव ठाकुर

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