जीवन में अधिक प्रदूषण तो निरर्थक प्रवृतियों का है
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व्यक्ति दो तरह से प्रवृत होता है सार्थक और निरर्थक । यदि व्यक्ति अपनी सारी प्रवृतियों का सूक्ष्म निरीक्षण करे तो उसे यह समझ में आ जाएगा कि उसकी प्रवृतियों में निरर्थक प्रवृतियों का जमघट भी कम नहीं है। अनावश्यक बोलना, अनावश्यक व्यर्थ कार्य करना, व्यर्थ समय खोना, अनावश्यक विषयों में सोचते रहना केवल मनोरंजन के नाम पर अनेक अनावश्यक अश्लील हंसी मजाक करना, हानि कारक और व्यर्थ की प्रथाओं परिपाटियों का पालन करना, व्याधि ग्रस्त होजाने जैसे दुर्व्यसनों का सेवन करना, तास पत्ती और अंकों के खेल खेलकर धन नष्ट करना आदि अनेक ऐसी प्रवृतियां है जो न केवल निरर्थक है किन्तु वे अनेक आपदाओं को भी जन्म दे देती है।
ऐसी प्रवृतियां लोक जीवन में घर किये हुए हैं लाखों करोड़ों व्यक्ति आंख मूंद कर ऐसे अनावश्यक कार्यों में अपना तन मन और धन नष्ट कर रहे हैं। अनेक संघर्ष और तनाव जो मानव जीवन में व्याप्त है। उनमें से अधिकांश तो ऐसी निरर्थक बातों के कारण ही है। व्यक्ति अपने तनाव और चिन्ता से मुक्त होने के अनेक उपाय करता है। किन्तु अन्य कोई उपाय करने के पहले उसे अपने जीवन में से उन निरर्थक कार्यो को अलविदा कहना चाहिये जो उसके जीवन में व्यर्थ ही डेरा डाले हुए है और उसके तन मन को प्रदुषित कर रहे हैं।
यदि जीवन में प्रवृतियों का निरर्थक अंश समाप्त हो जाता है और जीवन में सार स्वरुप आवश्यक कार्य विधियां ही शेष रहती है तो व्यक्ति के अधिकांश तनाव प्रकरण तो ऐसे ही समाप्त हो जाएंगे ।भगवान महावीर प्रभु ने मानव मात्र के लिये एक महत्व पूर्ण व्रत दिया है "अनर्थ दण्ड विरमणव्रत" इस व्रत का विधान है जीवन में निरर्थक प्रवृतियों का त्याग करना ।
यदि राह राई से अपने जीवन की समीक्षा करें तो इस व्रत की अप्रतिम विशेषता स्पष्ट परि लक्षित हो जाएगी क्योंकि जीवन निरर्थक प्रवृतियों से इस हद तक छाया हुआ है कि सार्थक और उपयोगी प्रवृतियों के लिये व्यक्ति अपना समय ही नहीं दे सकता, कोई यह कहे कि व्यक्ति जो करता है उचित समझ करही करता है फिर वह निरर्थक कैसे ?
इस प्रश्न के उत्तर के लिये फिर जीवन व्यवहार की गहराइयों में जाना होगा। उचित, आवश्यक समझकर जो किया वह बहुत कुछ निरर्थक ही सिद्ध हुआ इसलिये यह स्वीकार करना होगा कि अपना सोच ही सही नहीं है अतः वह निरर्थक प्रवृतियों को जन्म देता है। सोच की दिशा यथार्थवादी और तात्विक होनी चाहिये । शुद्ध यथार्थवादी चिन्तन निरर्थक प्रवृतियों को निराकृत करके सार्थक उपयोगितावाद को रुपायित करेगा। एक प्रगतिशील जीवन के लिये सार्थक चिन्तन होना ही चाहिये ।करुणा, मानवता और सह जीवन की आधार शिला है।
करुणा मानवीय हृदय का सुकोमल भाव है। यह मानवता का सर्जक और सह जीवन का मुख्य कारक भाव है। करुणा का भाव व्यक्ति को पीड़ित प्राणी के अन्त करण से जोड़ देता है। करुणा मानव हृदय की अनमोल संपदा है सर्वोच्च विचार धारा और आत्मा का अमृत है। यह जब मानव हृदय से समाप्त होजाता है तो मानव मन मात्र पत्थर के रुप में परिणत हो जाता है।किसी पीड़ित प्राणी को देखकर अपने हृदय में एक हलचल खड़ी होना, एक स्पन्दन खड़ा होना, मन को कम्पन आना यह करुणा का जागरण है। करुणा प्रेरित व्यक्ति पीड़ित व्यक्ति को कष्ट मुक्त कर के अत्मिक आनन्द का अनुभव करता है।
अमरीका के राष्ट्र पति अब्राहम लिकन के जीवन की घटना इस तथ्य को अधिक स्पष्टकर देगी । एकवार वे मित्रों के साथ कहीं जा रहे थे, उन्होंने गटर के नाले में एक सूअर के बच्चे को करुण रुदन करते सुना। वे तत्काल उस गटर में उतर गये और सूअर के बच्चे को बाहर लेआये। कपड़े सब खराब होगये थे। मित्रों ने कहा आपने यह क्या कर दिया सारे कपड़े गन्दे करदिये। लिंकन ने कहा ये तो अभी धुल जायेंगे यदि मैं इस सूअर के बच्चे को तड़पता छोड़ चला जाता तो रात भर मैं चैन से सो भी नहीं सकता।
इसे बचाकर मैने अपना चैन ही बचाया है। अब मै आराम से नींद ले सकूंगा। उक्त उदाहरण से स्पष्ट होता है कि करुणा प्रेरित व्यक्ति जो सेवा करता है वह किसी पर उपकार करने के लिये नहीं किन्तु अपने आत्मिक आनन्द के लिये वह ऐसा करता है। पांडु पत्नि राज माता कुन्ती देवी ने तो एक ब्राह्मण के बच्चे को बचाने को अपने पुत्र को मृत्यु के साक्षात अवतार बक राक्षस से भिड़ने को भेज दिया, मेघरथ और शिवि जैसे आदर्श हमारे इतिहास के अनमोल आदर्श है। अपने तन का बलिदान देकर भी एक कबूतर को बचा लेना उनका परम धर्म बन गया था।
करुणा सह जीवन की प्रबल आधार शिला है। परिवार और समाज तभी आदर्श और श्रेष्ठ सिद्ध होता है जब उन में प्रत्येक व्यक्ति परस्पर करुणा भाव से अनुप्राणित होते हैं। सेवा का उच्चतम आदर्श करुणा से ही चरितार्थ होता है। आज जन जीवन की मानसिकता में करुणा का स्रोत सूखता चला जा रहा है। फलत मानव राक्षस जैसी प्रवृतियां करने लगा है। हत्याएं लूट पाट अत्याचार देश में बढ़ रहे है। सभी चिन्तित है किन्तु उसका उपाय करुणा भाव है। देश में इस भाव के जागरण का प्रयास करना चाहिये ।
कांतिलाल मांडोत
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