सात साल पुराने पॉक्सो केस में विशेष न्यायालय का सख्त फैसला
अभिषेक वर्मा को कारावास व अर्थदंड, पीड़िता को प्रतिकर देने के आदेश
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लखनऊ। राजधानी की विशेष पॉक्सो अदालत ने नाबालिग से अपहरण और दुष्कर्म के सात वर्ष पुराने मामले में कड़ा और मिसाल कायम करने वाला फैसला सुनाया है। विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) मोहम्मद कमरूज्जमा खान की अदालत ने आरोपी अभिषेक वर्मा को दोषी करार देते हुए 10 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने यह भी स्पष्ट आदेश दिया कि दोषी से वसूली गई अर्थदंड की संपूर्ण राशि पीड़िता को उसके पुनर्वास हेतु प्रदान की जाए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 7 फरवरी 2019 को थाना गाजीपुर में दर्ज मु.अ.सं. 127/2019 से जुड़ा है। पीड़िता के पिता ने थाने में तहरीर देकर बताया था कि उनकी 13 वर्षीय नाबालिग बेटी बाजार गई थी, लेकिन वापस नहीं लौटी। पुलिस द्वारा दर्ज गुमशुदगी की विवेचना के दौरान तथ्य सामने आए कि आरोपी अभिषेक वर्मा नाबालिग को बहला-फुसलाकर पहले बेंगलुरु और फिर सूरत ले गया, जहां उसके साथ यौन शोषण किया गया।
कानूनी कार्यवाही और पक्षकार
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने ठोस साक्ष्य और गवाह प्रस्तुत किए। अभियोजन पक्ष की ओर से विशेष लोक अभियोजक अभिषेक उपाध्याय एवं अरुण कुमार ने प्रभावी पैरवी करते हुए पीड़िता का पक्ष मजबूती से रखा। बचाव पक्ष ने आरोपी के कम शिक्षित होने और पूर्व आपराधिक इतिहास न होने का हवाला देकर सजा में नरमी की मांग की, जिसे अदालत ने अपराध की गंभीरता और पीड़िता की आयु को देखते हुए अस्वीकार कर दिया।
अदालत की टिप्पणी और सजा का विवरण
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि नाबालिग के साथ यौन अपराध समाज की जड़ों को कमजोर करते हैं और ऐसे मामलों में दया का कोई स्थान नहीं है। दोषी को निम्नलिखित सजाएं सुनाई गईं—
धारा 376 (दुष्कर्म): 10 वर्ष का कठोर कारावास एवं ₹10,000 जुर्माना
धारा 366 (अपहरण): 5 वर्ष का कारावास एवं ₹5,000 जुर्माना
धारा 363 (अपहरण): 3 वर्ष का कारावास एवं ₹3,000 जुर्माना
अदालत ने आदेश दिया कि सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी, तथा आरोपी द्वारा जेल में पहले से बिताई गई अवधि को सजा में समायोजित किया जाएगा।
साक्ष्य, गवाह और सह-आरोपी
अभियोजन ने मामले में कुल आठ गवाह प्रस्तुत किए, जिनमें मुख्य विवेचक अशोक कुमार राजभर और चिकित्साधिकारी डॉ. संदीपा श्रीवास्तव प्रमुख रहीं। वहीं, सह-आरोपी विकास कुमार को साक्ष्यों के अभाव में दोषमुक्त कर दिया गया। पीड़िता ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि विकास ने न तो उसे ले जाने में भूमिका निभाई और न ही उसके साथ कोई गलत कृत्य किया।
पीड़िता के पुनर्वास पर जोर
माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत (निपुण सक्सेना बनाम भारत संघ) का अनुपालन करते हुए, अदालत ने निर्णय की प्रति जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA), लखनऊ को भेजने का आदेश दिया है, ताकि पीड़िता को अतिरिक्त क्षतिपूर्ति दिलाने पर विचार किया जा सके। अदालत का यह निर्णय न केवल पीड़िता को न्याय दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि समाज को यह स्पष्ट संदेश भी देता है कि महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराधों पर कानून पूरी सख्ती से कार्रवाई करेगा और दोषियों को किसी भी स्तर पर बख्शा नहीं जाएगा।
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