बस्तर में माओवादी हिंसा के अंत की ओर बढ़ते कदम, सुकमा से समर्पण की गूंज और 2026 का निर्णायक मोड़

बस्तर में माओवादी हिंसा के अंत की ओर बढ़ते कदम, सुकमा से समर्पण की गूंज और 2026 का निर्णायक मोड़

 
छत्तीसगढ़ का बस्तर अंचल, जो दशकों तक माओवादी हिंसा, डर और असुरक्षा का पर्याय रहा, अब धीरे-धीरे शांति और विकास की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। इसी कड़ी में बुधवार को सुकमा जिले में एक अहम घटनाक्रम सामने आया, जब बस्तर क्षेत्र में सक्रिय 29 माओवादियों ने पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचकर आत्मसमर्पण कर दिया। इन समर्पित माओवादियों में दो लाख रुपये का इनामी कुख्यात माओवादी पोड़ियामी बुधरा भी शामिल है। यह समर्पण न केवल सुरक्षा बलों की रणनीतिक सफलता को दर्शाता है, बल्कि उस बदलते माहौल का भी संकेत है, जिसमें अब हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने की राह माओवादियों को ज्यादा सुरक्षित और सार्थक लगने लगी है।
 
हाल ही में कोंटा एरिया कमेटी सचिव मंगडू की सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में हुई मौत ने माओवादी संगठन की कमर तोड़ दी है। संगठन के भीतर भय, असमंजस और नेतृत्व संकट की स्थिति पैदा हो गई है। इसका सीधा असर यह हुआ कि जो माओवादी अब तक जंगलों को अपना सुरक्षित ठिकाना मानते थे, वे भी आत्मसमर्पण को एक व्यावहारिक विकल्प के रूप में देखने लगे हैं। सुकमा में हुआ यह सामूहिक समर्पण इसी मनोवैज्ञानिक दबाव और लगातार बढ़ती प्रशासनिक मौजूदगी का परिणाम माना जा रहा है।
 
सुकमा के पुलिस अधीक्षक किरण चव्हाण ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जिला तेजी से माओवादी हिंसा मुक्त होने की ओर अग्रसर है। उन्होंने शेष माओवादियों से अपील की कि वे भी हिंसा का रास्ता छोड़कर शासन की पुनर्वास नीति का लाभ उठाएं और सामान्य जीवन की ओर लौटें। एसपी के अनुसार, सुरक्षा बलों के प्रभावी ऑपरेशन और समानांतर रूप से चल रहे विकास कार्यों ने माओवादी संगठन पर चौतरफा दबाव बना दिया है। अब उनके पास न तो पहले जैसी सुरक्षित पनाहगाहें बची हैं और न ही स्थानीय समर्थन।
 
यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि आज छत्तीसगढ़ में बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर जैसे कुछ ही जिले माओवादी प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाए हैं। शेष जिलों में सुरक्षा बलों की निरंतर कार्रवाई, प्रशासनिक पकड़ और विकास योजनाओं के प्रभाव से माओवादी गतिविधियां लगभग समाप्ति की कगार पर हैं। सुकमा जिले का गोगुंड़ा गांव इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। यह गांव लंबे समय तक माओवादियों के लिए सुरक्षित गढ़ माना जाता था। यहां तक पहुंचने के लिए सुरक्षा बलों को करीब आठ किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। घने जंगल, दुर्गम रास्ते और ऊंची पहाड़ियां माओवादियों को प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करती थीं।
 
लेकिन करीब दो महीने पहले हालात में निर्णायक बदलाव आया, जब पुलिस ने वहां नया कैंप स्थापित किया और सड़क निर्माण का कार्य शुरू कराया। सड़क बनने से न केवल प्रशासन की नियमित पहुंच सुनिश्चित हुई, बल्कि गांव के लोगों का भरोसा भी सरकार की ओर बढ़ा। सुरक्षा बलों की स्थायी मौजूदगी ने माओवादियों की गतिविधियों को सीमित कर दिया और धीरे-धीरे उनका नेटवर्क कमजोर पड़ने लगा। जिस गांव में कभी माओवादी फरमान चलते थे, वहां अब विकास योजनाओं की चर्चा होने लगी है।
 
माओवादियों के इस समर्पण के पीछे शासन की पुनर्वास नीति की भी अहम भूमिका है। आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को न केवल सहयोग राशि दी जा रही है, बल्कि उन्हें आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार से जुड़ी विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ भी मिल रहा है। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि जो लोग हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं, उनके लिए दरवाजे खुले हैं। यही वजह है कि वर्ष 2025 में अब तक 2,500 से अधिक माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।
 
सुरक्षा बलों की कार्रवाई भी उतनी ही निर्णायक रही है। वर्ष 2025 के दौरान हुई मुठभेड़ों में करीब 550 माओवादी मारे गए हैं। इन ऑपरेशनों में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, कोबरा बटालियन, जिला रिजर्व गार्ड और राज्य पुलिस की समन्वित भूमिका रही है। खुफिया जानकारी के आधार पर सटीक कार्रवाई, आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल और स्थानीय स्तर पर मजबूत नेटवर्क ने माओवादी संगठन को रणनीतिक रूप से कमजोर कर दिया है।
 
केंद्र और राज्य सरकार दोनों ही इस दिशा में पूरी तरह प्रतिबद्ध नजर आ रही हैं। केंद्र सरकार ने मार्च 2026 तक देश को माओवादी हिंसा से पूरी तरह मुक्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सुरक्षा, विकास और संवाद तीनों मोर्चों पर एक साथ काम किया जा रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का स्पष्ट और सख्त रुख माओवादियों के लिए सबसे बड़ा झटका साबित हुआ है। उन्होंने 2026 तक माओवाद के पूर्ण उन्मूलन का अल्टीमेटम देकर यह संदेश दे दिया है कि अब इस समस्या को और लंबा खींचने की कोई गुंजाइश नहीं है।
 
अमित शाह के इस अल्टीमेटम ने माओवादी संगठनों की नींद उड़ा दी है। जंगलों में छिपे कैडर अब खुद को चारों ओर से घिरा हुआ महसूस कर रहे हैं। लगातार बढ़ती सुरक्षा कार्रवाई, घटता जनसमर्थन और सरकार की स्पष्ट नीति ने उनके भीतर बेचैनी और फड़फड़ाहट बढ़ा दी है। यही कारण है कि हाल के महीनों में आत्मसमर्पण की घटनाओं में तेजी आई है।
बस्तर में विकास कार्यों की रफ्तार भी अब साफ नजर आने लगी है। सड़कें, पुल, मोबाइल नेटवर्क, बिजली, स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र जैसे बुनियादी ढांचे का विस्तार हो रहा है। जिन इलाकों में पहले सरकारी कर्मचारी जाने से डरते थे, वहां अब नियमित प्रशासनिक गतिविधियां हो रही हैं। इससे स्थानीय आदिवासी आबादी को यह भरोसा मिला है कि सरकार केवल सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए भी प्रतिबद्ध है।
 
सुकमा में 29 माओवादियों का आत्मसमर्पण इसी बदलते परिदृश्य का प्रतीक है। यह घटना बताती है कि बंदूक की भाषा अब अपनी प्रासंगिकता खो रही है और संवाद, विकास तथा पुनर्वास की नीति ज्यादा प्रभावी साबित हो रही है। हालांकि अभी चुनौती पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, लेकिन दिशा स्पष्ट है। अगर इसी तरह सुरक्षा बलों की कार्रवाई, प्रशासन की सक्रियता और सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति बनी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब बस्तर का नाम माओवादी हिंसा नहीं, बल्कि शांति और विकास के उदाहरण के रूप में लिया जाएगा।
 
सुकमा का माओवादी हिंसा मुक्त होने की ओर बढ़ना न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि पूरे देश के लिए एक सकारात्मक संदेश है। यह दिखाता है कि लंबे समय से चली आ रही आंतरिक सुरक्षा की समस्या का समाधान संभव है, बशर्ते नीति स्पष्ट हो, इरादे मजबूत हों और जमीन पर काम लगातार होता रहे। 2026 का लक्ष्य अब केवल एक घोषणा नहीं, बल्कि साकार होता हुआ सपना प्रतीत होने लगा है।
      कांतिलाल मांडोत

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